राजनीति में कभी भी चार नहीं होता, दो और दो का जोड़

कांग्रेस से राजनीति की शुरुआत करने वाले नरेश अग्रवाल ने बसपा-भाजपा गठबंधन से मायावती का समर्थन वापस लेते ही अपनी पार्टी के डेढ़ दर्जन विधायकों के साथ भाजपा को समर्थन देकर कल्याण सिंह की सरकार बचायी.

फिर राजनाथ ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण भाजपा से निकाल बाहर किया तो समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थाम लिया.

सपा में मुलायम सिंह की नाव डूबने लगी तो मायावती के साथ हो लिये. फिर मायावती की सरकार जाने लगी तो अखिलेश यादव के साथ होकर दोबारा सपाई बन गये.

आज जब अखिलेश यादव भी मझधार में गोते लगा रहे हैं तो उन्होंने फिर से भाजपा में वापसी कर ली.

कुल मिलाकर घाट-घाट का पानी पी चुके नरेश अग्रवाल खुद को राजनीति का मौसम विज्ञानी बताते हैं. उनके राजनैतिक सफर को देखा जाय तो उनकी यह बात सच भी नजर आती है.

भाजपा में लौटने पर उनके हर बयान को याद करके ज़रूर उन्हें कोसा जा सकता है, लेकिन राजनीति का माहिर खिलाड़ी कहने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिये.

बाकी जिस पार्टी में भी रहे, विरोधियों की नाक में दम करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. फिर तो सपा और बसपा में रहकर भाजपा को जितना बुरा-भला कहा है उसकी भरपाई भाजपा में आकर उन्हें फिर से गरियाकर कर सकते हैं.

लिहाज़ा अपना थूका खुद से चाटकर साफ करने के लिये भाजपा में आकर विरोधियों के लिये उन्हें फिर से वही तेवर दिखाने पड़ेंगे.

बहरहाल, कुछ विशेष मुद्दों की तरह राजनीति भी गरम दूध होता है. जल्दीबाजी में पीने पर मुंह जलने का खतरा बना रहता है.

विश्लेषक भी कहते हैं कि राजनीति के गणित में दो और दो चार कभी नहीं होता. इस के मद्देनज़र नरेश अग्रवाल का भाजपा में आना भी 2019 के लिहाज से दूरगामी संदेश देने वाला है.

बाकी अभी इंतज़ार कीजिये, क्योंकि अगले कुछ महीने इस प्रकार की राजनीति के लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण रहने वाले हैं. क्योंकि नरेश अग्रवाल की ओर ध्यान केंद्रित करने से पहले हमें सपा-बसपा और कांग्रेस की राजनीति को भी ध्यान से देखना पड़ेगा.

मतलब जब दो दशक से विरोध के ध्रुव बने दो दल आपस में चिपक सकते हैं तो नरेश अग्रवाल तो अभी महज एक व्यक्ति भर हैं.

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