किसी को पढ़ने या सुनने में हिचकना क्यूं नहीं चाहिए?

बहुत गहरी प्यास है लोगों में सत्य को जानने की, लेकिन अपने ही ज्ञान के मकड़जाल में इतने गहरे उलझ गए, कि चाहते हैं तो भी अहंकार टूटता नहीं. जब टूटता है तो जानने की प्यास कितनी गहरी है उसका एहसास होता है.

हमारे देश में अध्यात्म की घुट्टी इतनी छोटी उम्र से पिला दी जाती है कि पीने वाले बहुत पहले ही ज्ञानी हो जाते हैं और इस पहले से जमा ज्ञान (कचरे) की वजह से अनुसंधान की क्षमता को खो देते हैं.

बुद्ध, महावीर, ईसा या किसी भी महामानव ने जो कुछ पाया इसी अनुसंधान से पाया लेकिन आज अनुसंधान की कोई आवश्यकता हम भीतर की खोज में महसूस नहीं करते.

वजह है जानकारियों को ज्ञान मान लेने का भ्रम.

हमने ये किताब पढ़ी है, हमने इतना नाम कमाया है, हमने इतना पैसा कमाया है और न जाने ऐसे कितने ही भ्रम हमें अनुसंधान की असली प्रयोगशाला यानि स्वयं से बहुत दूर ले गए हैं.

जगदीशप्रसाद झाबरमल टिबरेवाल यूनिवर्सिटी (JJTU) ने मुझे लोगों की इस जरूरत का एहसास करवाया. मैं गया तो था अपने पीएचडी छात्रों की क्लासेस के लिए लेकिन दो चार दिनों में अपने ज्ञान देते रहने की आदत के चलते कई लोग चपेट में आ गए.

यहां आने वाले छात्र भी आम नहीं हैं, ज्यादातर तो खुद ही लेक्चरर एवं अन्य अहम पदों पर देश के अलग अलग हिस्सों में कार्यरत हैं. एकेडमिक रूप से खुद को और बेहतर करने के लिए यूनिवर्सिटी से अपने पीएचडी या अन्य कोर्सेस को कर रहे हैं.

यहां कन्वोकेशन के बाद सभी वरिष्ठ लोगों के लिए मस्ती भरे कैम्प फायर का आयोजन किया गया था. संस्थान के चासंलर से लेकर अन्य सभी वरिष्ठ लोग यहां मौजूद थे.

गलती से किसी ने मुझसे कह दिया कि पहले बारी आपकी, आप गाना गाएं या अपनी किसी प्रतिभा को सामने रखें.

बस यहीं बेचारे सब फंस गए. मैंने चेतावनी भी दी कि देखिए गलत आदमी को गलत जगह पर मौका दे रहे हैं. आप पछताएंगे तो नहीं, लेकिन जिस के मन में भी अपनी कला का प्रदर्शन करने का सपना होगा वो ध्वस्त हो जाएगा.

जैसा होता है, चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया और यहीं से शुरू हुआ अपने गुरु से प्राप्त ज्ञान के आवंटन का सिलसिला. हालांकि अर्जन के पहले विसर्जन होना नहीं चाहिए और दादाजी कहते भी हैं कि ज्ञानी होना भी अहंकार ही लाता है.

फिर भी जैसे शादी पार्टी में कभी कभी काबू खोना कई लोगों को अच्छा लगता है, ऐसा ही माहौल हमारे जैसे लोगों के श्रोताओं का समूह मिलना होता है.

खैर बातचीत का सिलसिला इस बात से शुरू हुआ कि मैं आप सभी को कुछ अर्थों में मनोरोगी सिद्ध कर दूं तो बुरा मत मानिएगा.

फिर तो कैम्प फायर का पूरा माहौल एक प्रवचन में तब्दील हो गया. यहीं कुछ फायर ब्रांड सवाल भी हुए.

जैसा मैंने वादा किया था, सभी इस बात पर सहमत भी हुए कि हम स्वस्थ चित्त के साथ जीवन नहीं जी रहे हैं.

अभी जिन के मन में जिज्ञासा है कि ऐसी क्या बातें हो गई होंगी, वो मेरे वीडियोज पर थोड़ा ध्यान दें. थोड़ा अहंकार हिलता है कि हमसे कम उम्र या अनुभव का व्यक्ति हमें क्या ज्ञान दे देगा.

बात सच भी है. ज्ञान तो कोई किसी को आज तक दे नहीं पाया, अलबत्ता आपके अपने ज्ञान को समर्थन मिल जाए तो आप बात को सही मानते ही हैं.

जिनका विवेक थोड़ा भी जागृत हैं, और जो थोड़े भी होश में होते हैं, वो काम की बात को धीरे धीरे तमाम पुरानी धारणाओं को तोड़ते हुए धारण कर ही लेते हैं.

बातों से प्रभावित हुए या कोई और बात, सभी गणमान्यों ने कैम्प फायर की बातचीत के बाद मुझसे एक ऑफिशियल लेक्चर का अनुरोध किया, और मेरे लिए तो अंधा क्या चाहे दो आंखे वाली बात हो गई.

सुधि श्रोता थे जिनका अपना जीवन बहुत कुछ देख चुका है. अगले दिन संवाद के विषय से बात शुरू हुई और मुख्य बिंदु ये था कि आखिर आपको, मुझे सुनने या पढ़ने की जरूरत ही क्यूं हैं?

मुझे नहीं पढ़ेंगे या सुनेंगे तो किसी और को (जिसकी मार्केटिंग बढ़िया हो गई होगी) को सुनेंगे. दरअसल सुनने और पढ़ने की गरज पैदा होती है उस दिशा में वैसे नहीं सोच पाने से जैसा सुनते वक्त सोचने लगते हैं. सही विचार खुद ब खुद आपको ऊर्जा से भरना शुरू कर देता है.

अब स्वतः विचार प्रक्रिया में तो आप उन्हीं दो चार क्षुद्र बातों के इर्द गिर्द घूमते रहते हैं जिन्होंने आपके जीवन में कोहराम मचा रखा होता है. जब कोई सही दिशा में विचार करते हुए आपको अपने साथ वैसा ही विचार करने पर मजबूर कर देता है तो आप उसी की तरह सोचने लगते हैं.

जैसे ही मन को अच्छी लगने वाली कोई भी बात, कोई किताब, कोई प्रवचन या लेक्चर या कोई संगीत खत्म होता है, आप कुछ देर उसकी खुमारी में रहते हैं, फिर ढाक के तीन पात का मामला हो जाता है. आप सोचेंगे तो वैसे ही जैसे आप सोचते हैं.

आप ऐसे किसी भी समय पर अपने भीतर चलने वाले विचारों की उस कमी पर गौर कर सकते हैं और स्थायी समाधान के तौर पर ठीक वैसा ही सोचने का अभ्यास शुरू कर सकते हैं जो आपको वो सहजता देता है जो किसी को सुनने या पढ़ने में आपको मिलती है.

जब ये अभ्यास पूर्ण होता है तो आपके भीतर से ज्ञान खुद ब खुद निकलने लगता है. ये पहले तो आपको शांत करता है फिर वाई फाई की तरह इर्द गिर्द भी फैलने लगता है.

जिनके उपकरण बंद हैं यानि जो अहंकार वश अपनी ग्राह्यता को खो चुके हैं वो कभी स्वयं के ज्ञान की ओर नहीं जा पाएंगे. इसीलिए सुनना पढ़ना पहली सीढ़ी है और जो इस पर पहला कदम रखता है वो जरूर आगे का सफर तय कर लेता है.

उपरोक्त ज्ञान का सार इतना कि किसी को सुनने पढ़ने में झिझके ना, आपके भीतर कोई बात आनंद या सहजता पैदा करे उसे तुरंत नोट कर लें. स्वतः उसका अभ्यास करें और बाह्य जरूरतों से मुक्त होते जाएं. आप स्वयं को जानने की तरफ बढ़ने लगेंगे.

शेष फिर कभी… धन्यवाद.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY