आलूदम की छोटी पतीली में एक किलो गरम मसाला

मुझे पता है कि मैं जो लिखने जा रहा हूँ, वह मुझे नहीं लिखना चाहिए. बहुत बुरी बात है. पर क्या करूँ, आदत से मजबूर हूँ. जिन्दगी बिता दी है बर्रे के छत्तों में हाथ डालते डालते.

अब इस लेख के बाद बहुत सारे लोग पुरातनपंथी, खूसट, दक़ियानूसी, स्त्रीविरोधी, पुरुषसत्तावादी आदि का आरोप लगाते हुए मुझ पर पिल पड़ेंगे. यदि वे ऐसा करेंगे/ करेंगी तो सही करेंगे/करेंगी. ये सारे आरोप सच्चे हैं. सच कहता हूँ मैं बैलेंस बनाने की बहुत कोशिश करता हूँ पर हमेशा फेल हो जाता हूँ.

बात यह है कि मुझे समझ में नहीं आता कि स्त्रियाँ आजकल इतना भयंकर रंग रोगन क्यों करती ही चली जा रही हैं? यह रोग किधर से आया और क्यों कर इस बुरी तरह फैला? मैं खूसट हूँ पर श्रृंगार के विरुद्ध नहीं हूँ. स्त्रियाँ सदा से श्रृंगार करती आई हैं.

पर श्रृंगार सौंन्दर्यवर्धन के लिए है न कि अच्छी भली आदमी की शक्ल को बंदर की शक्ल में तब्दील करने के लिए. कभी कभी लगता है कि जैसे गुलाब के ताजा खिले कमनीय सुंदर लाल फूल पर गाढ़ा नीला पेंट छींट दिया गया हो.

आलू की सब्ज़ी में हल्का सा मसाला डालो तो कितना स्वादिष्ट आलूदम बनता है पर एक किलो मसाला पतीले में झोंको तो मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है. चेहरे को परत दर परत पेंट कर कर के और लाल पीले हरे नीले रंगों से रंग रंग कर अच्छे खासे थोबड़े को बदसूरत बनाना महान सौंदर्यबोध है?

कई बार किसी युवा स्त्री को रामलीला मंडली जैसी शक्ल बनाए देखता हूँ तो मन करता है कि उसके पास जाकर कान में फूँकूँ : ओ बेवक़ूफ़ लड़की, तुमने अपनी इतनी सुन्दर सूरत का क्या हाल बना रखा है? जा, बाथरूम में जाकर ठंडे पानी से मुँह धोकर आ.

शादी ब्याह में दुल्हनों की तस्वीरें देखिए. सारी दुल्हनें एक सी देखती हैं. लाल लाल पीली पीली चमकती हुई. जैसे कि ताजा ताजा सास बहू और साजिश की सॉसेज फैक्टरी सी निकली उत्पाद हों जिनमें अभी चाभी घुमाओ तो घर्र घर्र कर घूमने लगेंगी.

कौन सी बीमारी ने जकड़ लिया है हमारे सौन्दर्यबोध को? हमने गाँवों, शहरों, नदियों, पहाडों, वनों का सौन्दर्य नष्ट किया. अब हम मनुष्यों का नैसर्गिक सौंदर्य भी कुचल देंगे?

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