स्वप्न गाथा : ऊपर की यात्रा

स्वप्न सुरंग बड़ी बेरंग हो गयी थी जब गुरु को कुष्ट रोग से पीड़ित देखा… लगा मेरी भौतिक दुनिया का रोग उन्होंने अपने ऊपर ले लिया और उनका वजूद इस रोग से गल रहा है…

मैं आत्मग्लानि से भर उठी और दुनियावी इश्क और उसकी पीड़ा को हटा कर वहां भर दिए रोज़ के कामों की लम्बी फेहरिस्त…

लेकिन उसी स्वप्न के अंत में मैंने उन्हें एक राकेट नुमा विमान से उतरता देखा था, जिस पर एक बहुत ही विशाल सर्प अपनी कुण्डली खोल ऊपर आसमान की ओर बढ़ता है… तो गुरु कहते हैं …. इसको कब उठाना है और कब उड़ना है यह मैं तय करूंगा…

मुझे अपनी सीमा समझ आई… प्रार्थना करना भी बंद कर दिया… प्रार्थनाएं आपको मुमुक्षु से कभी कभी भिक्षु बना देती है… यही तो कहती आई थी मैं अब तक.. प्रेम की भिक्षा मांगे भिखारन, लाज हमारी रखियो साजन…

गुरु का संकेत जो मैंने अपनी सीमित बुद्धि से जो समझा वो बस इतना ही था… कि सारी पीडाएं, परीक्षाएं तुम्हें ऊपर उठाने की है, इतना भी मत झुको कि कुण्डलिनी की यात्रा बाधित होने लगे…

दुनियावी जगत में लौट आई पीठ को पूरी ताकत लगाकर सीधा किया तो भौतिक जगत में भी लोगों का आशीर्वाद भरा हाथ पीठ पर मिला… वजूद में मजबूती आई… तो मूलाधार में हो रही हलचल पर मूलबंध लगाकर ध्यान लगाना शुरू किया…

कुछ दो चार दिन ही हुए थे… स्वप्न की दुनिया में फिर से प्रवेश की अनुमति मिली… सांसारिक घटनाओं के साथ दिखाई दिए तीन शब्द और उस पर लिखे संकेत… पहले खण्ड में लिखा था “शि” और वहां एक पुरुष की तस्वीर दिखाई दी जिसके माथे पर किसी चोट की वजह से पट्टी बंधी थी…..

दूसरे खण्ड में दिखाई दिया शब्द “म” जहां एक माँ अपने पुत्र को गोद में लिए बैठी थी…

तीसरे अंतिम खण्ड में दिखाई दिया शब्द “लो” जिसका अर्थ वहां लिखा था अंग्रेज़ी में WISDOM…

तीनों के अपने अपने अर्थ हैं … चोट की पीड़ा से मातृत्व और मातृत्व से ज्ञान की जाने के संकेत दिए जा रहे थे…

मैं खुश थी… बहुत खुश… इतनी कि मेरे साथ प्रकृति भी नाच उठी… आसमान से तेज़ बारिश होने लगती है, और मैं सफ़ेद परिधान पहने सोलह वर्ष की युवती हो गयी हूँ… मेरे साथ कई अन्य लोग भी नृत्य करने लगते हैं… जिनमें से कुछ हिन्दू हैं कुछ मुस्लिम… लोग कह रहे हैं इस बार ईद और होली एक ही दिन आई है और भरी बरसात में हिन्दू मुस्लिम एक दूसरे को रंग लगा रहे हैं…

मुसलमान, इस्लाम, ईद, मज़ार, मस्जिद… यह सब अक्सर स्वप्न में देखती हूँ इसलिए इस बात पर यकीन पुख्ता हो रहा है कि या तो किसी जन्म में इस मज़हब के रास्ते से गुज़रना हुआ है या आगे इस मज़हब को साथ लेकर चलना है…

नृत्य बहुत ही धीमा, सुन्दर और आनंददायी है…. और किसी प्रतिमा की परिक्रमा करते हुए ऐसे नृत्य कर रही हूँ जैसे हम गुजराती लोग अपनी पारंपरिक तरीके से गरबा करते हैं… नृत्य परिक्रमा करते करते संगीत तेज़ हो जाता है और मैं अपने ही स्थान पर गोल गोल घूमने लगती हूँ जैसे सूफी लोग घूमते हैं…

घूमना इतना तेज़ हो जाता है कि अचानक मैं खुद को ज़मीन से ऊपर उठता हुआ देख पाती हूँ…. ये अनुभव इतना अद्भुत था कि इसे शब्दों में पिरोना नामुमकिन सा है… ऊपर से जब मैं नीचे ज़मीन की ओर देखती हूँ तो और अचंभित हो जाती हूँ.. मेरी देह अब भी ज़मीन पर गोल गोल घूमती हुई दिखा रही है लेकिन चेतना कहीं हवा में ऊपर उठ चुकी है…

बस यह दृश्य देखते से ही यह भान हो जाता कि मेरे साथ क्या हो रहा है… और अपनी इस आनंददायी और अद्भुत यात्रा के लिए मन ही मन बाबाजी को धन्यवाद देने लगती हूँ… जैसे ही यह ख़याल आता है कि मेरी साधना को उच्च स्तर पर पहुँचाने के लिए स्वप्न की माया रची गयी है… मेरी नींद टूट जाती है… लेकिन मैं अनुभव कर रही थी कि नींद टूटने के बाद भी मैं हवा में ही हूँ… मैं आँखें नहीं खोलती… मुझे पता है मैं आँखें खोलूँगी और वापस ज़मीन पर लौटना होगा…

लेकिन जागृत अवस्था में इस स्थिति में अधिक देर तक नहीं रहा जा सकता… जैसे जैसे अचेतन से चेतन में प्रवेश होता है कुछ क्षण बाद खुद को नीचे उतरकर वापस देह में प्रवेश होता देख पाती हूँ… आँखें खुलती है… खुद को बिस्तर पर चित्त लेटा पाती हूँ…

आँखों में कृतज्ञता के आंसू है… एक तरफ स्वामी ध्यान विनय दूसरी तरफ बड़े सुपुत्र ज्योतिर्मय सोये हैं.. लगता है जैसे मैं ही वो बीच वाला खण्ड हूँ जहाँ माँ अपने बच्चे को गोद में लिए बैठी है… मातृत्व से बड़ा कदाचित मेरे लिए और कोई भाव बना ही नहीं…

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