गन्धर्व – 1

जब धौलाधार बर्फ से भर गई, तब…

जब बर्फ में चांदनी चमकने लगी, तब…

जब चांदनी में दरख्तों के साए दिखने लगे, तब…

तब वह उतरता है पहाड़ से, धीरे… धीरे… धीरे…. सफेद कपड़े पहने. लम्बा ऊनी चोला, घुटनों से नीचे तक झूलता. कमर में कस कर कई लपेटे डाले उभरा हुआ काला ऊनी डोरा.

बांसुरी, कभी डोरे के बीच खोंसी हुई, कभी हाथ में. जब चलता है, बांसुरी के एक सिरे से झूलती रंग बिरंगी डोरियां हिलती हैं बार बार. तब लगता है, बांसुरी की मधुर और मादक तान पहाड़ी दर पहाड़ी तैर रही है, लहरों की तरह, घाटियों को भरती हुई.

जैसे बर्फ गिरती है एकदम चुपचाप, निःशब्द; वैसे ही यह तान हौले हौले लिपटती सी महसूस होती है, सुनाई नहीं पड़ती. मौन स्वर का एहसास होता है. जैसे ठण्ड बरसती है बेआवाज. जैसे साज पड़े रहते हैं बेजान… ढोल, नगाड़े, खड़ताल…. उन में आवाज होने का एहसास बना रहता है बराबर.

आधा देव, आधा दानव, आधा पशु, आधा मानव है वह…

ऊनी चोला लहराता है. नंगी टांगें एक सिरहन पैदा करती है. वह बर्फ में नंगे पांव चलता है. ठण्ड का उस पर कोई असर नहीं होता. जहां पैर पड़ता है, बर्फ लाजवंती की तरह पिघल जाती है.

ऊंचे पहाड़ों में बर्फ गिरने पर सभी जानवर, पक्षी नीचे तलहटी में उतर आते हैं. लम्बी पूछों वाले रंग बिरंगे पक्षी, रीछ भालू. वैसे ही उतरता है वह, सफेद बाघ की तरह दबे पांव……

रात के धुंधलके में कभी उसका मुंह घोड़े सा दिखता है. कभी वह बहुत लम्बा दिखता है, कभी आदमकद…. नौजवान, तगड़ा गबरू गद्दी जिसकी भूरी मूंछें अभी निकली ही हैं. उसके चोले में नवजात मेमना होता है, हाथ में छोटा नरेलू जिससे कभी कभी तम्बाकू का कश खींच मुंह से ऐसा सुगन्धित धुआं छोड़ता है कि पूरे वातावरण में कस्तूरी सी गन्ध बिखर जाती है.

पहाड़िया कहते हैं उसे, कहीं नारसिंघ. पहाड़िया नवविवाहित दुल्हनों को ‘लग’ जाता है. नवयुवतियों और विशेषकर नवविवाहितों को उससे बचा कर रखना होता है. गद्दी लोग विवाह से पहले पहाड़िए को मनाते हैं. धूप टिक्का करते हैं कि मेहर रखना मालका, हमारी इज्जत अब आपके हाथ है. एक बार वह लग जाए तो हटता नहीं चाहे पुजारी चेलों से लाख तन्त्र मन्त्र करवाओ.

फिर भी देवता के पुजारी चेलों से डरता है पहाड़िया. पहुंचे हुए संत महात्माओं से घबराता है. स्वर्गाश्रम जैसी पवित्र और सुच्ची जगहों में आने से भी कतराता है.

जहां पहाड़ियां धीरे नीचे उतरती हैं वहां बीच में कहीं न कहीं एक प्लेटफार्म सा बन जाता है. ऐसी समतल जगहों में जनबस्तियां बसती हैं.

धौलाधार के प्रागण में, ऐसी ही एक समतल तलहटी में उगा है स्वर्गाश्रम. ढलान के बीच उड़नतश्तरी सा टिका हुआ. रात को एक अलौकिक प्रकाश उगता है यहां. तब सच में ही यह आकाश में टिका स्वर्ग लगता है.

आश्रम से धौलाधार की बर्फीली चोटियां ठीक सामने दिखती हैं, ऐसी कि हाथ फैलाने पर छू लो. आश्रम के एक सिरे पर विशालकाय शिवलिंग स्थापित है जो सीधा पहाड़ से बातें करता है. लम्बी सीढ़ी लगाओ तो यहां से सीधे पहाड़ पर पहुंच जाओ. लिंग का रंग भी पहाड़ जैसा है. कभी लगता है पहाड़ ही शिवलिंग है और लिंग ही पहाड़. कभी लगता है पहाड़ का एक हिस्सा ही लिंग रूप में स्थापित हो गया है. इतना बड़ा शिवलिंग दूर दूर तक नहीं.

जब गुनगुनी धूप की अदृश्य चादर बिछती तो स्वामी मुक्तानंद आंगन में दीवान पर आ विराजते. बात तब की है जब यहां झूला नहीं लगा था, प्रवचन के लिए माईक भी नहीं था. भक्तजन नीचे बिछी दरियों पर बैठ जाते. नया नया आश्रम बना था, भक्तजन भी कम थे. वे बिना माईक ही प्रवचन देते. उनकी आवाज पर्वर्तों से टकराती. कण्ठ में माधुर्य और गाम्भीर्य था.

‘‘जीवन क्या है….. एक सपना. तुम रात को सोए. सपने में महल देखे, चैबारे देखे, राजपाट देखा. नगर ग्राम देखे, जंगल पहाड़ देखे. कभी तुम हंसे, कभी रोए. जब जागे तो कुछ न था…… ऐसा ही है जीवन. तुम जो कुछ देखते हो, भोगते हो. वास्तव में कुछ नहीं है… वास्तविकता कुछ और ही है…..’’

मीठी धूप में मादक आवाज का ऐसा असर होता कि आधे श्रोता सच में ही सो जाते. वे तभी जागते जब लंगर से हलुवे की सौंधी सौंधी वास नथूनों में घुसती.

‘‘इस पहाड़ के पीछे देखा है किसी ने, क्या है!’’ जब वे पूछते तो लोग चौंकते.

‘‘यही तो जिज्ञासा है,‘‘ वे कह उठते, ‘‘व्यक्ति को जिज्ञासु होना चाहिए.’’

बचपन में पहाड़ के बीच बने वी के आकार के एक संकरे रास्ते को दिखा बापू कहते, ये धरमदुआरी है, इसी द्वार से जीव धर्मराज के पास जाता है. दस जमात तक गांव के स्कूल में पढ़ते हुए बदामो ने आश्रम में आ कर गुनना सीखा, जिज्ञासु होने का अर्थ भी जाना.

जब आश्रम में कोई न रहता, बदामो नित्यप्रति आश्रम के अंदर बाहर झाड़ू लगाती, साफ सफाई करती, पौधों को पानी देती. पूरा आश्रम बापू के जिम्मे रहता. यह सब मेरा ही है… वह सोचने लगी थी…..

तुम्हारी पुत्री बहुत नेकदिल और गुणवती है रामसरन! इसके विवाह में जल्दबाजी न करना, देखभाल कर ही करना, अरे! तुम लोग बड़ी छोटी उम्र में कन्याओं को ब्याह देते हो, यह अच्छी बात नहीं; समझाते स्वामीजी.

उसका रंग बादामी था. मां उसे ‘बदामो’ नाम से पुकारने लगी. पहाड़ी लड़कियों की काया टहनी सी होती है जो बचपने में ही झाड़ बुहार से ले कर हवा और छाया तक देती है. ऐसे ही बदामो छुटपन से ही स्वामी मुक्तानंद की टहल सेवा में जुट गई और अनायास ही आश्रम की अंदरूनी स्थायी सदस्य बन गई.

‘‘यह नाम तो सांसारिक है,’ कहते हुए स्वामी मुक्तानंद ने उसे नाम दिया ‘‘सुकन्या’’. छोटी थी तो सभी उसे बुलाते… कन्या! इधर आओ, कन्या! पानी लाओ, कन्या! यहां गोबर से लीप दो, कन्या! कन्या पुष्प लाओ, गंगाजल लाओ!….. धूप लाओ, दीप लाओ.

‘‘नाम वह अच्छा, जो अर्थपूर्ण हो, जिसके उच्चारण में कठिनाई न आए. हमारे पुराणों में नाम का बड़ा महत्व है. जैसा व्यक्ति, वैसा नाम. वेदव्यास, वशिष्ठ से ले कर भीष्म, युधिष्ठिर, कर्ण, विकर्ण, दुर्योधन; सब नाम सार्थक.’’ स्वामीजी कहते.

सुकन्या की वय के साथ आश्रम फलने फूलने लगा. एक समय था, जब सर्दियों में आश्रम सूना हो जाता. वह कमरों, बरामदे, आंगन में झाड़ू लगाती. एक कोठीनुमा घर ही आश्रम था उस समय. स्वामीजी गर्मियों में आते तो दो तीन चेले साथ होते. बीच बीच में मैदानों से भक्तगण स्वामीजी की सुध लेने के लिए आते रहते.

पहले पहल यह आश्रम गर्मियों में कुछ दिन ठहरने के लिए ही बनाया था. मुख्य आश्रम तो राजस्थान में था. जब स्वामीजी आते तो कुछ भक्त भी आते रहते. किसी समय इसे इतना विकसित करना पड़ेगा, यह शायद स्वामीजी ने भी नहीं सोचा था.

धीरे धीरे जब भक्तों की संख्या बढ़ने लगी, आश्रम का विस्तार होता गया. आसपास के ग्रामीणों से, फिर सरकार से और जमीन ली. बडा सा लंगर हॉल बना. लेक्चर हॉल, साधना कक्ष और छोटे छोटे आश्रमनुमा कॉटेज व्यास, वशिष्ठ, गौतम, कपिल आदि ऋषि मुनियों के नाम से कुटीर नाम दिया गया.

बीच में आम, अमरूद, अनार, कचनार और नींबू, लुकाठ लगाए. हरसिंगार के पेड़ों के साथ नीलकांटा लगाया गया जिसे हर साल काट कर मनचाहा आकार दिया जाता. पेड़ों के बीच रास्ता, रास्ते के साथ फूलों की क्यारियां, जहां गेंदे के साथ कई तरह के मैदानी फूल. हर कुटीर की दीवारों का सहारा लिए फैलती चमेली, रातरानी और रंगीन कागजी फूल.

सर्दियों में लम्बी पूंछों वाले बड़े बड़े पक्षी पहाड़ से नीचे आ जाते तो गर्मियों में कई तरह की चिडि़याएं, पहाड़ी मैना, तोतों के झुण्ड. बरसात में ऊंचे पत्थर पर बैठ तीतर बोलते तो आम्रमंजरियों की गन्ध दूर दूर तक फैलती. घाटी के नीचे बहती नदी की सायं सायं और पक्षियों के कलरव से आश्रम में एक दिव्य संगीत गूंजता.

गर्मियों में गैरिक वस्त्र धारण किए संन्यासी विचरण करते तो लगता धौलाधार की वादी में यह कोई दिव्य स्थान है. सच में यहां ऋषि मुनि, देवता स्वर्ग से उतर आए हैं. जहां कभी ढोर डंगर चरा करते थे, भेड़ बकरियां मिमियाती थीं, लोग अन्धेरा होने पर इस ओर नहीं आते थे वहां मधुर घण्टियों और मन्त्रोच्चारण की ध्वनियों से वातावरण गूंजने लगा. स्वामी मुक्तानंद कहतेः

‘‘धरती का अपना भाग्य होता है. कहीं वन बने, कहीं उपवन बने. कहीं खेत बने, खलिहान बने. कहीं सर तो कहीं ऊसर. कहीं डगर तो कहीं नगर बने. कहीं नहर बने, कहीं महल बने. कहीं वैश्यालय बने, कहीं शिवालय बने. कहीं शस्त्रागार बने, कहीं कारागार बने. कहीं बियावान बने, कहीं श्मशान बने.’’

लोग कहते स्वामी मुक्तानंद की उम्र डेढ़ सौ बरस से अधिक है, कोई कहता दो सौ बरस. स्वामीजी का चेहरा अभी भी लाल लाल था. शरीर भारी होने से चलने फिरने में तकलीफ होती थी. जब वे आसन पर विराजमान रहते, चेहरे से आयु का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था. भगवा चोले का कोई अंत नहीं पा सका….. लोग कहते. भक्तों को वे बादाम, गरी और दाख बांटते थे. उनके चोले का लम्बा खीसा कभी भी खाली नहीं होता.

आश्रम के चारों ओर ऊंची दीवार लगा दी. केवल एक बड़ा सा मुख्य द्वार रखा जहां से बिना आज्ञा प्रवेश निषेध. दीवार के साथ केले के पेड़ लगाए जो साल भर में ही दीवारों से बाहर झांकने लगे.

संयोग ऐसा हुआ कि महीने में चार दिन जब सुकन्या का आश्रम में प्रवेश निषेध हुआ तभी मुख्यद्वार में पट्टिका लग गई ‘‘बिना आज्ञा प्रवेश वर्जित है.’’

खुले प्रांगण में अतिरिक्त प्रवचन के लिए भीतर एक बड़ा हॉल बन गया जिसमें हजार से ऊपर भक्त आराम से बैठ सकते थे. ऊंचे मंच पर गाव तकियों के आगे बहुत ही बारीक दो माईक हमेशा लगे रहते जिनकी आवाज छोटे छोटे गुप्त स्पीकरों से गूंजती. स्वामी जी की आवाज तो वैसे भी गहन और गम्भीर थी. माईक से गुजरने पर और भी लरजती सी फैलतीः

‘‘साधना के लिए घर छोड़ना जरूरी नहीं. घर गृहस्थी छोड़ना तो पलायन करना है. मैं तो कहता हूं, चाहें तो संन्यासी भी घर न छोड़ें. आश्रम में सन्यासियों के रहने की व्यवस्था है. यहां रहना जरूरी तो नहीं. कहीं रहने मात्र से, कुछ पहनने मात्र से व्यक्ति संन्यासी नहीं हो जाता. व्यक्ति ने कुछ भी होना हो, मन से होना है. आश्रम में रहे, न रहे; गैरिक वस्त्र धारण करे न करे. गैरिक वस्त्र भी जरूरी नहीं. माथे पर चंदन, गले में कण्ठी माला…. जरूरी नहीं. परंपरा के अनुसार संस्कार में बहुत कुछ जरूरी बना दिया है जो जरूरी नहीं. लोग हैं कि भौतिक सामग्री की तरह आध्यात्मिक सामग्री भी इकट्ठा किए जा रहे हैं… इकट्ठा किए जा रहे हैं…..’’

स्वामीजी के प्रवचन से हॉल में बैठे भक्त, साधक धीरे धीरे एकदम विरक्त होते जाते. प्रसाद, लंगर की महक से जागते और सांसारिक प्रपंच की ओर पुनः अनुरक्त होते.

सांय के सत्संग में जब शिव स्तुति के बाद माता की भेंटें गाई जातीं तो आसपास के गांवों से आई महिलाएं अपने बाल बिखेर ‘खेलना’ शुरू कर देतीं. कुछ खड़ी हो कर नाचने लग जातीं. कुछ तो आंखें बंद कर भावावेश में तेजी से बाहें लहरातीं. कुछ पालथी मार जोर जोर से सिर घुमाते हुए बालों को घुमातीं तो माहौल डरावना हो उठता.

इस तरह ‘खेलना’ गांव के गुरु चेलों के सामने होता है, ये सब अंधविश्वास की निशानी है. स्वामीजी ऐसे प्रपंच अपने सत्संग में नहीं चाहते थे. जब नीचे से संभ्रांत भक्त आने लगे तो धीरे धीरे गांव के लोगों पर रोक लगने लगी.

‘‘यह साधना जागे हुए लोगों के लिए है, सोए हुओं के लिए नहीं. साधना में मनुष्य को ऊपर उठना है, अध्यात्म में जाना है, सांसारिक अंधकूप में नहीं खोना है.’’ स्वामी कहते.

स्वामीजीने आश्रम में महिलाओं का प्रवेश वर्जित तो नहीं किया, कोई अकेली महिला रात्रि को आश्रम में नहीं रूक सकती थी. न ही किसी को साध्वी बनने की अनुमति थी. साधक या सन्यासी केवल पुरुष ही बन सकता था. साधक पुरुष आश्रम में रह सकता था. सन्यासी तो रहते ही थे.

किसी सन्यासी को महिला की ओर आंख उठा कर देखने की अनुमति नहीं थी. इस मामले में वे भगवान बुद्ध का उदाहरण देते. हां, विश्वासपात्र भक्त लोग कुटिरों में सपरिवार आ कर ठहर सकते थे.

‘‘अरे! ये तो घनश्याम हैं… मेरे श्याम हैं. इनके पैर छुए कभी! इतने नरम हैं जैसे रूई. और हाथ… सिर पर हाथ रखें तो लगे गूंथा हुआ आटा रख दिया है. हथेलियां जैसे बच्चे का नरम पेट. जब स्वामीजी पास से गुजरते तो महिलाएं उन्हें छूने के लिए बेताब हो जातीं और भावुकता में आंखों से झर झर आंसू बहने लगते.

स्वामीजी शिव के उपासक थे, स्वयं को शिव का अनुचर मानते. आश्रम में विशालकाय शिवलिंग के होते हुए, प्रतिदिन शिव स्नान का जल प्रसाद में ग्रहण करते हुए भी महिलाओं को उन में कृष्ण दिखलाई पड़ते.

कोई कहता स्वामीजी एम.एस.सी. हैं, कोई कहता डाक्टरी पास कर रखी है. बहुत बड़ी पोस्ट पर थे, अचानक सब त्याग दिया, पायलट बाबा की तरह. माना जाता था कि स्वामीजी ने कोई सिद्धि की हुई है. सिद्धि के कारण उनके पास अपार शक्तियां हैं. जिसके सिर पर वे हाथ रख दें, वह धन्य हो जाता. विश्वास तो यह था, कई शक्तियों के स्वामी दो सौ वर्ष के होंगे किंतु देखने में पैंसठ सत्तर से ऊपर लगते. इतनी वय हो जाने पर भी स्वामी जी का चेहरा दमकता था. शरीर स्थूल हो जाने पर भी हाथ पांव से जैसे खून टपकता.

स्वामीजी के आने से पहले खुशबू का एक झौंका आता. जब वे गुजरते तो चंदन की खुशबू चारों ओर फैल जाती. खड़े होते तो जैसे चंदन के पेड़ हों.

आश्रम के पूरे वातावरण में चंदन अगरबत्तियों की महक फैली रहती. सात्विक सुगन्धित हवा से पूरा आश्रम भरा भरा रहता. कहीं पूजा अर्चना हो रही है, कहीं यज्ञ चल रहा है, कहीं होम हवन हो रहा है.

गर्मियों में गैरिक वस्त्र धारण किए संन्यासी, श्वेत वस्त्र धारण किए भक्त; सादी मगर मंहगी साडि़यों में महिलाएं, चुलबुलाते बच्चे; इतने लोग आ जाते कि पूरा आश्रम किलकारियां मार उठता. श्वेत परिधान में महिला अनुयायियों का एक टोला गुजर जाए तो सारा वातावरण महक उठता.

अब विदेशी भक्त भी आने लगे थे. सभी भक्ति भाव में मगन और मस्त हुए यहां तहां विचरण करते. हर कोई गाता हुआ और नाचता हुआ सा प्रतीत होता. महिलाओं को खाना बनाने या परोसने की कोई चिंता नहीं. समय समय पर चाय, नाश्ता, भोजन के वूफे लगे रहते. अब आश्रम में बहुतेरे स्थायी सेवादार तैनात कर दिए गए थे. आसपास के ग्रामीणों को भी बरतन मांजने, भोजन पकाने से ले कर स्टोर आदि को सम्भालने के काम योग्यता के अनुसार काम मिल गए थे.

आज भी सुकन्या के परिवार की महत्ता कम नहीं हुई थी. सुकन्या के बापू मुख्य द्वार पर बैठते. आगन्तुकों का परिचय लेते और जांच परख कर भीतर जाने की इजाजत देते.

यूं तो स्वामीजी के साथ तीन चार संन्यासी हमेशा साथ रहते किंतु स्वामी असीमानंद विशेष अनुयायी था उनका. सदा साए की तरह साथ रहता. कभी लगता उनका दत्तक पुत्र ही हो.

स्वामी असीमानंद…. जब पहली बार आया तो लड़का सा था. भूरी मूंछें भी पूरी तरह नहीं उगी थीं. लगता, बचपन में ही संन्यासी हो गया है. दूसरी बार आया तो शरीर भरने लगा था. जैसे पहाड़ में हर साल छिंज मेलों में कुश्ती के लिए नए नए युवा पहलवान पंजाब, हरियाणा से आते. जब वे अगले साल आते तो उनका जिस्म भरा भरा और और ताकतवर होता. गांव के लोग उनकी ताकत और कुश्ती के करतबों को देख हैरान होते रहते. एक साल में ही वे बचेल से गबरू बन जाते.

हर साल चार पांच युवा संन्यासी अवश्य बनते जो स्थायी रूप से आश्रम में ही रहते थे. पहले मुख्य आश्रम में हर वर्ष वसंत में दीक्षांत समारोह होता जिसमें इच्छुक युवाओं को संन्यासी बनाया जाता. अब यह समारोह गर्मियों में यहां भी होने लगा था.

तीसरे वर्ष जब असीमानंद ने आश्रम में प्रवेश किया तो धीर गम्भीर युवा संन्यासी का रूप था. सिंदूरी रंग, नारंगी चेहरा, काली घनी भौंहें. चौड़े कन्धों पर जब गैरिक उत्तरीय छितरा कर गिरता तो निर्वस्त्र पुष्ट वक्ष स्थल में स्पंदन होने लगता.

घुटे हुए गोल सिर में जब छोटे छोटे बाल उगने लगते तो सुराही की तरह लम्बी व सुडौल गर्दन का रंग और ओजस्वी लगता. लम्बी सुतवां नाक के ऊपर पूरे माथे पर जब लाल पीले चंदन का लेप लगता तो तेजस्वी आंखों में एक अनोखी चमक आ जाती. जब वे देखते तो दृष्टि जैसे एकदम आरपार हो जाती.

क्रमश:

– सुदर्शन वशिष्ठ

गन्धर्व – 2

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