सुगंध की बाहें नहीं होतीं

तू सुगंध है
सुगंध किसी की मल्कियत नहीं हुआ करती
तू मेरी मल्कियत नहीं.

सुगंध एहसास के लिए है
बाज़ुओं में उसकी कल्पना
धोखा है अपने आप से
धोखे में जीना
ख़ुद को क़त्ल करना है

मैंने ख़ुद को क़त्ल किया है.
मैंने हर पल कमजोरियों का ज़हर पीया है

हर सोच में तू मेरी है
सिर्फ़ मेरी
….. और हक़ीक़त में सदियों का फ़ासला है
सपना स्मृति से फिसल जाता है
सच आलिंगन से निकल जाता है

सुगंध जड़ रहे
यह हो नहीं सकता
मेरा रिश्ता ख़ुदकुशी के दर पर है
पर सुगंध की बाहें नहीं होतीं.

– (अमृता प्रीतम की वर्जित बाग़ की गाथा में लिखी जसबीर भुल्लर की कविता)

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