इन किसानों से सावधान! कोरेगांव हिंसा कांड को दोहराने की कोशिश करेगा NGO गैंग

नासिक से मुम्बई के लिए रवाना हुआ किसानों का जत्था मुम्बई की देहरी पर दस्तक दे चुका है.

सोमवार को यह जत्था विधानसभा का घेराव करेगा. शनिवार रात कुछ न्यूज़ चैनलों पर इस जत्थे के मार्च की फुटेज दिखी थी.

ढोलक, मृदंग, तबला, हारमोनियम, झांझ, मंजीरों, ढपली की सधी हुई धुन पर मंझे हुए नर्तकों की तरह झूमते नाचते गाते किसानों के छोटे-छोटे जत्थों की भरमार वाले लगभग 20 हज़ार किसान!

इन जत्थों को देखकर पहले तो यह भ्रम हुआ कि यह किसानों की भुखमरी, गरीबी, आत्महत्या और कर्ज की समस्या के खिलाफ पीड़ित किसानों का मुम्बई मार्च है या फिर देश भर से आई लोकनर्तकों की सैकड़ों टोलियों की रैली है?

उसके बाद आज सवेरे इसी किसान मार्च की प्रवक्ता के रूप में एक रूपसी को फर्राटेदार कॉन्वेंटी उच्चारण के साथ किसानों की समस्यायों को लेकर केन्द्र व महाराष्ट्र की सरकारों पर अंग्रेज़ी भाषा में तीखा हमला बोलते हुए भी देखा, तो समझ नहीं सका कि इतने उच्च शिक्षित किसान भारत के किस कोने में रह रहे हैं?

इस सबसे अलग सबसे बड़ा रहस्य यह भी है कि जिस महाराष्ट्र में भाजपा, कांग्रेस, शिवसेना, NCP सरीखी पार्टियों का ही राजनीतिक वर्चस्व है, तथा कम्युनिस्ट पार्टियों का एक भी विधायक/ सांसद तक नहीं है… कम्युनिस्ट पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं है, उस महाराष्ट्र के केवल एक जिले नासिक के 20 हज़ार किसान कम्युनिस्ट पार्टी के आह्वान पर 165 किमी पैदल चलकर मुम्बई जाने को कैसे निकल पड़े?

इस तथाकथित किसान मार्च में लहरा रहे हंसिया हथौड़ा निशान वाले लाल रंग के एक ही शेड के हज़ारों लाल झण्डे उपरोक्त सवाल को जन्म देते हैं.

दरअसल यह केवल नासिक के किसान नहीं हैं. बल्कि देश भर के वामपंथी NGOs का कर्नाटक की सीमा से सटे हुए महाराष्ट्र में भाजपा विरोधी जमावड़ा है.

इन NGOs की मोदी सरकार विरोधी तिलमिलाहट स्वाभाविक भी है.

पिछले 3 वर्षों में कराई गई जांच के दौरान विदेशी चंदे के भारी दुरूपयोग और गम्भीर अनियमितताओं के उजागर होने पर मोदी सरकार लगभग 25000 NGO’s के FCRA लाइसेंस कैंसिल कर चुकी है.

FCRA लाइसेंस के बगैर कोई भी NGO विदेश से चंदा नहीं ले सकता.

इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत में NGOs को 2016 में विदेश से मिली 17 हज़ार 773 करोड़ रूपये की भारी भरकम राशि का आंकड़ा 2017 में गिरकर महज़ 6499 करोड़ पर पहुंच चुका है.

मोदी सरकार की यह कार्रवाई अभी भी तेजी से चल रही है.

यहां यह उल्लेख आवश्यक है कि पेशेवर तरीके से NGOs संचालन के धंधे में वामपंथी विचारधारा का शत प्रतिशत वर्चस्व है.

इसी का परिणाम है कि मोदी सरकार से प्रतिशोध की आग में बुरी तरह जल रहे NGOs का अखिल भारतीय गैंग कल मुम्बई में कुछ माह पूर्व हुई कोरेगांव हिंसा के खूनी तांडव को दोबारा करने की तैयारी कर चुका है.

याद दिला दूं कि पिछले वर्ष दिल्ली में हम इन्हीं NGOs का ऐसा तमाशा देख चुके हैं कि किस तरह तमिलनाडु के किसानों के भेष में एक झुण्ड राजपथ पर राष्ट्रपति भवन के सामने कपड़े उतारकर नंगे होकर नाच रहा था.

दूसरा झुण्ड यही काम कनॉट प्लेस में कर रहा था तथा तीसरा झुण्ड मुंह में मरा हुआ चूहा दबाकर न्यूज़ चैनलों के कैमरों के सामने फोटो खिंचवा रहा था.

भला हो सोशल मीडिया के उन सिपाहियों का जिन्होंने देश के समक्ष उन पेशेवर प्रदर्शनकारियों की वह सच्चाई चित्रों के साथ उजागर कर दी थी कि सूरज ढलते ही तमिलनाडु के वो तथाकथित किसान विदेशी स्कॉच, महंगे लंच/ डिनर पैकेटों और मिनरल वॉटर की बोतलों के साथ दिल्ली के जंतर मंतर की रात को रंगीन और गुलजार कर देते थे.

मुम्बई में कम्युनिस्टी NGOs के इस प्रायोजित पेशेवर प्रदर्शन की बहती गंगा में हाथ धोने से अब शिवसेना, कांग्रेस और NCP भी परहेज नहीं कर रही है. कल मुम्बई में हिंसक उपद्रव की संभावनाएं बहुत प्रबल हैं. देखिए क्या होता है?

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