कृष्ण ने अर्जुन को ही क्यों बनाया गीता के दिव्य ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी?

मैं कई बार सोचता हूँ कि योगेश्वर कृष्ण ने पाँचों पांडवों और महाभारत के अनगिनत पात्रों में से अर्जुन को ही अपना मित्र क्यों चुना और गीता के दिव्य ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी अर्जुन को ही क्यों बनाया.

क्यों वो केवल अर्जुन के ही सारथी बने जिस काम को समाज में छोटा काम समझा जाता है?

युधिष्ठिर धर्मराज थे, नकुल और सहदेव विद्वान थे और भीम महावीर थे, पर कृष्ण ने मित्र बनाया अर्जुन को.

आप ये भी कह सकते हैं कि अर्जुन युद्धकाल में भ्रम में पड़ गये थे कि अपने भौतिक सुखों और राज्य के लिये अपने ही लोगों का रक्त क्यों बहाया जाये.

पर ऐसा ही भ्रम, हताशा और लक्ष्यों से विमुख होने का अवसर तो बाकी पांडवों के जीवन काल में भी आया था पर वो कृष्ण के श्रीमुख से निकले गीता वाणी के अधिकारी नहीं बने.

अगर चारित्रिक श्रेष्ठता के आधार पर निर्णय करना होता तो अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले देवव्रत भीष्म थे जिन्हें गीता का उपदेश दिया जा सकता था पर कृष्ण ने भीष्म का चयन भी इस दिव्य ज्ञान के अधिकारी रूप में नहीं किया.

गीता जैसी कालजयी शिक्षा के उचित अधिकारी चयन के लिये अगर वीरता और शौर्य को मानक माना जाता तो भी भीष्म, अर्जुन से कहीं आगे थे क्योंकि अतुलनीय शौर्य प्रदर्शन से उन्होंने कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने पर विवश कर दिया था.

“मैं युद्ध में हथियार नहीं उठाऊंगा” की प्रतिज्ञा करने वाले कृष्ण को भी भीष्म के पराक्रम ने रथ का पहिया उठाकर उन्हें मारने दौड़ने पर विवश कर दिया था पर गीता की वाणी सुनाई कृष्ण ने अर्जुन को.

आखिर क्यों? ऐसा क्या था अर्जुन में?

इसकी वजह है कृष्ण की वो प्रतिज्ञा और आदर्श जिसे उन्होंने गीता का उपदेश देते हुये कहा था “धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे”.

कृष्ण केवल साधुओं के परित्राण और दुष्टों के विनाश के लिये ही नहीं आते, कृष्ण तो आते हैं धर्म की संस्थापना के लिये क्योंकि धर्म की स्थापना स्वतः ही साधुपुरुषों का त्राण और दुष्टों का विनाश करती है.

आप पूछेंगे कि इसका अर्जुन से क्या संबंध?

अर्जुन से इसका संबंध ये है कि महाभारत काल भारतवर्ष की अवनति का काल था क्योंकि कमोवेश दोनों पक्ष अधर्म और अनैतिकता में अग्रगण्य थे. देश में धर्म और मर्यादा का लगभग लोप हो चुका था.

महाभारत काल के बाद भी इस देश को जीवित रखना था तो धर्म की संस्थापना का संकल्प लेकर आये कृष्ण के लिये आवश्यक था कि वो हिन्दू संस्कृति के रक्षक को गीता-वाणी प्रदान करें और इस धर्म और संस्कृति के रक्षक के रूप में उन्हें अर्जुन दिखाई दिया.

महाभारत का युद्ध चल रहा था. गंगापुत्र भीष्म प्रण ले चुके थे कि इस धरती को अब पांडवों से विहीन कर देंगें और उनकी इस भीष्म-प्रतिज्ञा से कृष्ण समेत पूरा पांडव पक्ष चिंतित था.

युद्ध में अर्जुन उनके सामने आया. अर्जुन भीष्म को देखता है, वो जानता है कि सामने खड़े इस योद्धा ने मुझ समेत मेरे सारे भाइयों के वध और मेरे सेना के विनाश की प्रतिज्ञा ली हुई है.

अर्जुन को तो उस व्यक्ति पर टूट पड़ना चाहिये था, पर अर्जुन ऐसा नहीं करते. वो भीष्म की ओर जो पहला तीर चलाते हैं वो तीर जाकर भीष्म के चरणों के पास गिरता है और अर्जुन कहता है, “पितामह अपने अर्जुन का प्रणाम स्वीकार कीजिये”.

अर्जुन और भीष्म के अंतिम युद्ध में अर्जुन की आँखों से आँसू बह रहे होते हैं जब वो भीष्म पर तीर चलाता है और जब भीष्म विघ्न होकर गिर पड़ते हैं तो सबसे पहले अर्जुन उनके पास जाता है, उन्हें उनके अंतिम काल में सबसे अधिक सुख और प्रेम अर्जुन देता है.

क्या अब भी बताना पड़ेगा कि अर्जुन अमर-गीता वाणी के अधिकारी क्यों बने? क्यों उन्हें कृष्ण ने अपना मित्र बनाया था और क्यों वो सबसे अधिक प्रेम भरे संबोधनों से अर्जुन को बुलाते थे?

क्योंकि कृष्ण जानते थे कि जिन साधुओं के परित्राण और उसके माध्यम से धर्म के उत्थान के लिये वो आये हैं उसके मूर्तिमान स्तंभ अर्जुन हैं. क्योंकि जो साधु होता है वो धर्म का अनुपालन स्वयं करता है. उत्तम हिन्दू आदर्शों के मूर्तिमान स्तंभ अर्जुन थे.

अर्जुन ने उत्तम हिन्दू आदर्श का परिचय दिया था कि बड़े और बुजुर्ग खून के प्यासे भी हो जायें, किसी कारणवश हमें उनके विरुद्ध भी जाना पड़े तो भी आदर्श हिन्दू संस्कार ये कहता है कि बुजुर्ग हमेशा सम्मानीय और आदरणीय होता है.

उनका आदर और उनके प्रति प्रेम और सम्मान का प्रदर्शन हिन्दू संस्कारों में है जिसे तज कर न तो कोई कभी बड़ा हुआ है और न कभी बड़ा हो सकता है.

इन्हीं हिन्दू संस्कारों के अनुपालन के लिये अर्जुन भीष्म के प्रिय थे और उन्हें यश और कीर्ति प्राप्त हुई और दुर्योधन में इन्हीं संस्कारों का लोप था जिसने उसे पहले पराजय और फिर मृत्यु तक पहुँचाया और आज भी सारा भारत उसे हेय दृष्टि से देखता है.

जिसके आँख हो वो देख ले, जिसके कान हो वो सुन ले और जो स्वयं को हिन्दू कहता है इस पर अमल कर ले. राज्य और वैभव स्थायी नहीं है पर संस्कारों के प्रदर्शन से जो यश और कीर्ति मिलती है वो चिरंजीवी होती है और उसे ही दुनिया मानती है.

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