महिलारहित समाज की कल्पना, ‘मातृभूमि’ और झकझोर देने वाले सवाल

दो दिन पहले ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस गुज़रा है. जीवन की भागदौड़ और जद्दोजहद में प्राण-पण से समर्पित महिलाओं को सलाम. हालांकि, एक प्रगतिशील समाज में इस सलाम के माने और मतलब को भी संशय से देखा जा सकता है. और ऐसे में महिला केन्द्रित मुद्दों पर किसी तरह की चिंता भी शायद उसी खांचे में रखी जा सकती है.

श्रीदेवी के साथ ही हिन्दी सिनेमा में जीवित सितारा नायिकाओं की फ़ेहरिस्त से एक नाम और कम हो गया. जीवन का यह परम सत्य चुभता भी है. सिनेमा, समाज और महिलाओं को केंद्र में रखकर इस हफ़्ते की बात कुछ गंभीर भी है.

श्रीदेवी अब गुज़रे दौर की बात हो गई हैं मगर श्री को अगर उनके काम से याद करें तो ही बेहतर होगा. यूं मेरे पास श्री की किसी फ़िल्म के बहाने उनके अभिनय को याद करने और उस पर बात करने का मन नहीं. बीते दिनों अलग-अलग जगहों पर श्री के बहाने सिनेमा की बातें होती रहीं.

अपनी तरफ से मैं श्रीदेवी की बात कभी और करना चाहूँगा पर आज बतौर प्रस्तोता श्री की फ़िल्म ‘मातृभूमि-अ नेशन विदाउट वूमन’ का ज़िक्र करना चाहूँगा. मनीष झा लिखित-निर्देशित यह फ़िल्म 2003 में बनी थी और जिसने अपने कंटेन्ट के ज़रिये थोड़ी हलचल मचाई थी.

यह फ़िल्म एक ऐसे समय की ओर इशारा करती है जब बालिका हत्या के कारण किसी गाँव में केवल पुरुष ही बच जाते हैं और दूर-दराज के गाँव में भी कोई महिला नहीं है. ऐसे में जब कोई स्त्री उस गाँव में किसी घर में ब्याह दी जाए तो क्या भयावह स्थिति (दरिंदगी, वहशीपन) होगी उसका चित्रण इस फ़िल्म में है.

हालांकि, महिला दिवस के आसपास बात महिलाओं की तरक़्क़ी के संदर्भ में होना चाहिए थी पर यह फ़िल्म अपना असर कभी भूलने नहीं देती. फिर अखबार के पहले पन्ने पर रोज़ ही देश के किसी भी कोने में महिलाओं के साथ हुए दुर्व्यवहार की ख़बरें इतनी आम-सी लगती हैं जैसे हमारे ज़मीर मर गए हों. और हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है.

हालांकि, यह भी नहीं कि सब कुछ अंधकार भरा ही है. मगर फ़िक्शन और सच किसी भी तरह के हों, डिस्टर्ब तो करते ही हैं. ‘मातृभूमि’ भले एक काल्पनिक कथा हो या ‘एक्सैजरेशन’ जैसा कुछ पर सिनेमा में इस तरह की चेतावनी और बहुत आगे तक देख लेने की कोशिश सवाल तो है ही.

क्या गाँव, गली, मुहल्ले में एक परिवार तक रहने और मर्यादा में रहने की सीखें सही थी? क्या पुरुषों के समाज और आचरण का यह भयावह सत्य सम्पूर्ण पुरुष जाति का अपमान नहीं? क्या महिला और पुरुष दोनों के ही साथ रहने में हमेशा टकराहट नहीं और क्या यह भी सच नहीं कि यह असमानता हमेशा बनी रहेगी?

नज़रिये में हमेशा फर्क रहेगा और यह द्वंद्व ही आगे बढ़ने के लिए जिम्मेदार है. 21वीं सदी में भ्रूण हत्या के बहाने केवल पुरुष समाज के बचे रह जाने की चिंता में पिछले दशक की ‘मातृभूमि’ ने वही तस्वीर दिखाई है जैसी भूखे होने पर जानवरों द्वारा शिकार पर झपट्टा मार कर खा जाने और केवल अपनी भूख मिटालेने की संतुष्टि की.

मुझे याद तो नहीं आता कि उस समय इस फ़िल्म का क्या प्रभाव पड़ा होगा पर लगभग 15 साल पहले आई यह फ़िल्म और इसकी कहानी पर बात ज़रूर होनी चाहिए. बीते दिनों जब मैंने यह फ़िल्म फिर देखी तो आज की स्थितियों और अख़बारों की सुर्खियों में एक कॉलम में घटना की सूचना वाली स्थिति में ‘एक्सट्रीम लेवल’ पर मुझे ‘मातृभूमि’ की कहानी ही याद आई.

किसी गाँव में दूध की उबलती कढ़ाई में पैदा हुई बच्ची को डूबा देने वाली घटना से ‘मातृभूमि’ की कहानी शुरू होती है और फिर कुछ सालों बाद इसी रिवाज के कारण गाँव में केवल पुरुष बचते हैं और महिलाएं नहीं हैं. ऐसे में पुरुष ही महिलाओं की कमी को पूरा करते हैं.

लौंडा नाच से लेकर दर्शन-रति तक यहाँ तक कि पुरुष समाज में ब्याह के लिए भी लेन-देन और मज़ाक-मस्ती के साथ धोखाधड़ी करते हुए पुरुष को ही कन्या बना कर ब्याहने तक की नौबत. यानि स्त्री किसी कमोडिटी से भी बदतर, केवल उसके नाम पर ही दहेज और लेन-देन.

यही इज्ज़त का भी प्रश्न. पुरुषों के इसी फ्रस्ट्रेटेड समाज में अचानक दूर-दराज के गाँव में किसी महिला का मिल जाना. फिर इसी महिला को पाँच लाख में उसका बाप पाँच लड़कों से ब्याह देता है.

यहाँ तक कि ससुर भी उस स्त्री को भोग रहा जिसने अपने बेटों की शादी में लड़की के बाप को पाँच लाख रुपये दिये. केवल यही नहीं स्त्री को गाय-ढ़ोर से भी बदतर समझे जाने की दशा में किसी को होश नहीं कि वह पाँच भाइयों में से किसी एक से दिल लगा रही.

बस यही बात बाक़ी चार को नागवार. अपने ही भाई का क़त्ल भी. स्त्री किसी तरह नौकर की मदद से भागने की कोशिश करती है पर वह नौकर उसी के सामने बुरी तरह काट दिया जाता है. और नीच जाति के इस नौकर की मदद से भागने के जुर्म में यह लड़की तबेले में गाय की खूंटी से बांध दी जाती है.

नौकर की जाति के लोग बदला लेने आते हैं पर तबेले में बंधा देख फिर वही झपट्टा मारने की वृत्ति. महिला गर्भवती हो गई और बात इतनी सामान्य कि होने वाले बच्चे का पिता कौन, इस पर भी तंबाकू-चूना घिसने जैसा फैसला. उफ़ … इधर दोनों ही जाति के लोग अब महिला पर अपना अधिकार जताने के कारण एक-दूसरे को ख़त्म कर रहे. पैदा हुआ बच्चा एक लड़की है और यहाँ यह कहानी ख़त्म होती है.

कैसा समाज इस कहानी में दिखाया गया कि इस पर बात करने यहाँ तक कि सोचने का भी मन न हो. महिलारहित समाज में किसी एक महिला के आ जाने भर से ऐसी अराजकता कि कोई दूसरी उपमा ही न मिले. क्या यह समाज इसी स्थिति की ओर नहीं जा रहा?

अपने गुस्से, रोष, इंद्रियों के दमन और भोग की इच्छा इसी तरह नहीं शांत हो रही? निर्भया का उदाहरण है ही. अब तो अख़बारों में बलात्कार की ख़बर इतनी आसानी से प्रकाशित होती है जैसे रोज़ बलात्कार न हों तो मानो कुछ घटा ही न हो. पुरुषों को किस तरह से सोचना होगा, यह अपने आप में सवाल है. मगर इस वृत्ति की रोकथाम भी क्या हो?

सेलिब्रेशन अपनी जगह सही है. सम्मान भी है ही मगर तकनीक और विज्ञान के कारण उन्नत होने के बाद भी यह समय भयावह है. हालांकि, महिला दिवस के बहाने बात तो सिनेमा में महिलाओं की उपस्थिति और विश्व सिनेमा में महिला फ़िल्मकारों के योगदानों पर कुछ लिखने की थी पर इसी बीच ‘मातृभूमि’ ने बुरी तरह झकझोरा.

महिला दिवस के बहाने ही उपलब्धियों को गिनते हुए हिन्दी सिनेमा में महिला गीतकारों की अनुपस्थिति पर बात करने का मन भी था. यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं कि हिन्दी सिनेमा के सौ सालों से भी ज़्यादा के समय में महिला गीतकारों में अग्रिम पंक्ति में कोई नहीं दिखता.

पर समानता और असमानता के बीच, स्वीकार्यता और कमियों के बीच, पुरुष और महिलाओं में फर्क न करते हुए केवल उपलब्धियों और कमियों पर बात करने के पहले शायद बहुत भीतर बसी कुंठाओं और बर्बर इच्छाओं को बाहर निकालना होगा. वरना 21वीं सदी में भी समय उसी पाशविक वृत्ति के आसपास ही घूमता रहेगा, हम चाहें मंगल तक पर घर क्यों न बना लें?

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