वो घर की बाजीराव पेशवा थी जिसे कभी हारते नहीं देखा

आज से करीब पचासी पहले जनमी थी वो. या शायद नब्बे बरस पहले की बात हो ये. जन्मी थी नरसिंहपुर के पास एक छोटे से देहात बेदू में.

वो वक्त ऐसा था कि लड़कियों के लिये स्कूल होते ही नहीं थे. सो उनका स्कूल से, पढ़ाई से कोई वास्ता रहा नहीं. गौरवर्णा, तीखे नाक नक्श वाली वो निरक्षर लड़की बेटीबाई तेरह साल की उम्र मे नरसिंहपुर के एक धनी व्यापारी से ब्याही गई.

सास सीधी सी थी सो इस लड़की ने ब्याह होते ही घर की चाबियाँ अपनी कमर मे लटका ली और वो जब तक जीती रही ये चाबियाँ यथास्थिति वहीं लटकी रहीं.

यही लडकी सोलह की होते होते मेरे विद्वान पिता की माँ बनी और पैंतीस की होने के आसपास मेरी अंतर्मुखी माँ की सास हुई.

वो घर की एकछत्र प्रशासिका थी. क्या मजाल कि एक पत्ता भी उसकी मरजी के बिना खड़क जाये. चार बेटों और दो बेटियों की ये गर्वोन्नत माँ सारे घर को अपनी ऊंगली पर नचाने मे सक्षम थी.

बहुओं की छोड़िये उसके बेटों की भी घिग्गी बंधी रहती थी उसके सामने. वो अपने तर्कों से किसी को भी पछाड़ सकती थी. वो निरक्षर थी पर उसके बोलते वक्त उसके तेजतर्राट, पढ़े लिखे बेटों की बोलती भी बंद रहती थी.

ऐसे में थर थर काँपती बहुओं की तरफ से विद्रोह या चुनौती हो इसकी कोई संभावना थी ही नहीं. पति तो शादी के तत्काल बाद आत्मसमर्पण कर चुके थे ऐसे में वो जो चाहती थी वही होता था. वो काम करते कभी देखी नहीं गईं पर बहुओं को काम में लगाये रखना आता था उसे.

जो होता था उनसे पूछकर होता था और जो उनसे बिना पूछे कुछ कर जाता था उसकी खैर होती नहीं थी. घर के सारे नियम उसके बनाये होते थे और वो खुद अपने बनाये नियमों के ऊपर थी.

सामान्य कद की उस दुबली पतली महिला की तीखी आँखे कुछ ऐसी मारक थी कि सामने वाला खुद को कमज़ोर महसूस करने लगता था. दुनिया जहान की गालियां देना आती थी उसे. लड़ना और लड़कर जीतना उसका पसंदीदा शगल था.

वो घर की बाजीराव पेशवा थी जिसे कभी हारते नहीं देखा गया. वो राजा राम का अवतार थी, उसका अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा चारों दिशाएं रोंदता फिरता था. किसी में साहस नहीं था कि उसे लगाम लगाने का दुस्साहस कर सके.

एकाध बार जरूर कोशिश की बड़े लड़के के ससुरालियो ने. सोचा बहन के साथ खड़े होकर दिखाये. पर वे बुरी तरह से हारे. मुँह की खाकर लौटे और ऐसे प्रसंगो से उस औरत की साख में इजाफा ही हुआ.

उसकी ये हैसियत, ख्याति घर तक ही सीमित नहीं थी. उस छोटे से शहर के उस बड़े से मोहल्ले के सारे ही रहने वाले उनसे भली भाँति परिचित थे. और मन मार कर ही सही उनका आदर करते थे.

वह आवेगी थी पर न्यायप्रिय थी. निरक्षर थी पर पढ़ने के फायदे खूब जानती थी. गुस्सैल थी पर तार्किक थी. वो निरंकुश थी पर सभी पर प्रभुत्व बनाये रखने के सारे ही पैंतरे उसे पता थे. असहमति पसंद थी नहीं उसे और उसकी सहमति प्राप्त कर लेना अच्छे अच्छों के लिये कठिन था.

यह अपराजित नायिका बयालीस की होते होते मेरी दादी बनी और मुझसे हार गई. मैं उनके सबसे बड़े लड़के का बड़ा लड़का था. उनका पहला पोता. वो मुझ पर रीझी. मक्खन सी पिघली और मेरी संरक्षिका हुई.

वो दृढ़ महिला जब तक जीती रही उसके लड़के उसकी पिंडलियों और तलुओं की तेल मालिश करते रहे और वह मुझसे प्रेम करती रही. मैं उनकी हर नीति, अनीति में उसके साथ बना रहा. मेरी अपनी माँ से उनका कड़ा बर्ताव भी मुझे उससे दूर नहीं कर सका.

अपने आखरी दिनों में आँखे धुँधला गई थी उसकी, पर अपने पोते की नववधू को छूकर उसका निहाल होना देखते ही बनता था. जब तक वो रही माँ बन कर रही और जब वो गई तो मुझे माँ के ना रहने सा ही अफसोस हुआ.

मेरे निरंकुश, आवेगी, अडियल और तीखे होने की वो इकलौती वजह हैं. उनसे मिल पाते आप तो बेहिचक ये मानते ये कि दिवस मनाने की जरूरत महिलाओं को नहीं पुरुषों को है.

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