कसाईयों का विलाप

पोलिश लेखक Ryszard Kapuscinski का सोवियत कत्लखाने पर लिखा गया यात्रा वृत्तांत Imperium अद्भुत है. यह किताब नही, सोवियत कत्लखाने के खिलाफ चार्जशीट है.

दसियों साल पहले पढ़ा और एक-एक चीज याद है, इसलिए कि चार-पांच बार पढ़ा. कमज़ोरों के लिए नहीं है यह दस्तावेज़.

कापुसिंस्की उन चंद सौभाग्यशाली लोगों में थे जिन्हें सोवियत संघ के पतन के तत्काल बाद वहां के समाज को नज़दीक से देखने-जानने का मौका मिला और वह समाज जो कि अभी तक पूरी तरह सोवियत था. बोरिस येल्तसिन ने तो बस सत्ता संभाली ही थी.

हर पन्ने पर हाड़ जमा देने वाली ठंड, भूख, भय, दमन और लाखों लोगों के तिल-तिल कर मरने की दास्तान है. ये वो किताब थी जिसे पढ़ने के बाद रोमान टूटा और वामपंथ के नाम से घृणा हो गई.

बहरहाल, इस किताब को एक बार पढ़ लेने के अनुरोध के बाद मैं Imperium में वर्णित एक सबसे अहिंसक विवरण साझा करूंगा और इस दावे के साथ कि सोवियत ब्लैक बुक के हिसाब से यह बिना लहसुन प्याज़ वाला खाना है. बाकी ब्यौरे बहुत भयावह हैं.

हुआ यह कि कापुसिंस्की मॉस्को के जाड़े की एक सुबह होटल से निकले तो देखा कि कुछ लोग ठंड में नहा रहे हैं. जिज्ञासा वश वहां पहुंचे तो पाया कि वहां एक गर्म पानी का सोता था.

दिमाग ठनका कि ये गर्म पानी का सोता कहां से आया. पता चला कि ऐन इस जगह पर कभी दुनिया का सबसे भव्य, सबसे विशाल चर्च हुआ करता था.

इस चर्च का निर्माण 17वीं सदी में तत्कालीन ज़ार ने शुरू कराया था. उनकी मौत के बाद आए दो ज़ारों ने भी इस चर्च का निर्माण जारी रखा. ज़ारों की तीन पीढ़ियां और पूरे 75 साल में यह चर्च तैयार तैयार हुआ.

पूरे चर्च में सोने की नक्काशी थी. एक हज़ार टन सोने का गुंबद था और और यहां तक कि चर्च की सोने की घंटी को बजाने के लिए भी दर्जनों लोग चाहिए होते थे. चर्च के गेट खोलने और बंद करने के लिए सैकड़ों लोगों की ज़रूरत पड़ती थी.

पूरे एक लाख लोग चर्च में एक साथ प्रार्थना कर सकते थे. यह संभवत: विश्व की सबसे लंबे समय में निर्मित हुई और सबसे भव्य इमारत थी.

ज़ारों के पतन के कम्युनिस्ट आए. लेनिन सनक कर कुछ साल में गुज़र गए लेकिन स्टालिन महाशय की साम्यवादी नज़र बहुत पैनी थी.

क्रेमलिन इस चर्च के सामने झुग्गी लगता था. सर्वहारा की सरकार शोषक और बुर्जुआ अतीत के इस प्रतीक को कैसे बर्दाश्त करे?

सो कॉमरेड स्टालिन ने तय किया कि एक सड़ियल अतीत की इस सड़ियल बुर्जुआई (पगान) निशानी का कोई नामोनिशान बाकी नहीं रखना है.

योजना बनी कि इस चर्च को ध्वस्त कर कोई ऐसी इमारत बनाई जाए जो सोवियत संघ के अनंत विस्तार, इसकी सैन्य शक्ति और इसकी प्रगतिशील कम्युनिस्ट विचारधारा और साम्यवादी मूल्यों को परिलक्षित करे.

वैकल्पिक इमारत का नक्शा बनते ही सर्वहारा के दुलारे स्टालिन ने बिना समय गंवाए कॉमरेडों के हाथ में हंसिया-हथौड़ा देकर उन्हें चर्च को ध्वस्त करने के काम में लगा दिया.

लेकिन पंद्रह दिन बाद सारे कॉमरेड वापस हो लिए. हंसिया-हथौड़ा और जिहादी जोश किसी काम न आया. इतने दिन में बेचारे चर्च की दीवार में खरोंच भी नहीं मार पाए थे.

कुपित स्टालिन ने फौजी इंजीनियर भेजे. उन्होंने बताया कि दीवार टूटने वाली नहीं है. इसे उड़ाना पड़ेगा. सोवियत इंजीनियरों ने बड़ी मेहनत की और तय किया कि बिलकुल इतने बारूद की जरूरत पड़ेगी इसे सुरक्षित तरीके से ढहाने के लिए.

स्टालिन मोशाय ने बारूद लगाकर चर्च को उड़वा दिया. ज़ारशाही का सबसे गौरवशाली प्रतीक ध्वस्त हो गया. पर इसी जगह कम्युनिस्ट रूस की जो भव्य नई इमारत खड़ी करने का जो प्लान था, वह इंदिरा आवास योजना की तरह कागजी ही रह गया.

स्टालिन के सोवियत रूस के पास एक दमड़ी भी नहीं थी जो उसके सपनों की इस प्रगतिशील प्रतीक की नींव भी डाल सके. बहरहाल लाखों लोगों की 75 साल की इस अनवरत मेहनत को ज़मींदोज़ करने का बदला प्रकृति ने अपने तरीके से लिया. ऐन उसी जगह गर्म पानी का सोता बना कर.

अब जो हमारे वामपंथी, प्रगतिशील और लिबरल भाई त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा गिराए जाने पर छाती पीट कर विलाप कर रहे हैं, उनसे यही कहना है कि लेनिन की हज़ार प्रतिमाएं ले लो, बस वो चर्च लौटा दो.

तुम्हारा बनाया भी कुछ है? एक लाख प्रतिमाएं ले लो, बस उन चंद धरोहरों को वापस लौटा दो जो तुम्हारी बर्बरता की शिकार हो गईं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY