अपनी भाषा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा की बैठक नागपुर में चल रही है. इस बैठक में कुछ प्रस्ताव पारित होते हैं. देश में उन प्रस्तावों के अनुरूप वातावरण बने यह अपेक्षा होती है.

इस वर्ष का पहला प्रस्ताव पारित हो गया है. यह प्रस्ताव भारतीय भाषाओं के गरिमा, सम्मान, संरक्षण, संवर्धन, और दैनंदिन उपयोग को लेकर है.

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि संपन्न और समृद्ध भाषाओँ का देश होने के बाद भी हमारे देश में अंग्रेजी का न केवल चलन-वलन हैं, अपितु अंग्रेजी संभ्रांत लोगों की भाषा मानी जाती हैं.

यदि आप अंग्रेजी में बात करते हैं, तो ही आप बुद्धिजीवी, विद्वान, आधुनिक, कलाप्रेमी इत्यादि हैं, ऐसा माना जाता हैं.

पैंतीस से ज्यादा देशों की तो मैंने भी यात्रा की है. किन्तु मुझे (अंग्रेजी भाषिक देश, अर्थात इंग्लैंड, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया आदि को छोड़कर) भारत एकमात्र देश ऐसा मिला, जहां दो समान भाषा बोलने वाले लोग भी, आपस में मिलने पर अंग्रेजी में संवाद करते हैं..!

फ़्रांस में यदि दो फ्रेंच आदमी मिले, और आपस में अंग्रेजी में बोलने लगे, तो उन्हें ‘अनाड़ी’ समझा जाता हैं. यही हाल जर्मनी में हैं. यही जापान, इज़राइल, हॉलैंड, स्पेन, मेक्सिको, इंडोनेशिया… सभी देशों में.

दुर्भाग्य से हमारे देश में इस ‘अनाड़ीपन’ को लोग अपनी बुद्धिमत्ता समझते हैं…!

संघ के प्रस्ताव में अपील है, स्वयंसेवकों से, समाज से, सरकार से, कि वे भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दें. अपने बच्चों की प्राथमिक / माध्यमिक शिक्षा मातृभाषा में या अन्य भारतीय भाषाओँ में ही करें. आपस में भारतीय भाषाओं में ही संवाद करे… आदि.

मेरा यह मानना हैं कि देश को सुदृढ़, सक्षम और संपन्न बनाने में, ‘भाषा’ एक बहुत बड़ा ‘कारक’ है. इस दृष्टि से संघ का यह प्रस्ताव अत्यंत महत्वपूर्ण है.

लगभग एक वर्ष पहले, इज़राइल ने हिब्रू भाषा किस प्रकार से उनके देश में लागू की, इस पर एक टिप्पणी लिखी थी. उसे पुनः दे रहा हूँ –

14 मई, 1948 को जब इज़राइल बना, तब दुनिया के सभी देशों से यहूदी (ज्यू) वहां आये थे. अपने भारत से भी ‘बेने इज़राइल’ समुदाय के हजारों लोग वहां स्थलांतरित हुए थे.

अनेक देशों से आने वाले लोगों की बोली भाषाएं भी अलग अलग थी. अब प्रश्न उठा कि देश की भाषा क्या होना चाहिए..?

उनकी अपनी हिब्रू भाषा तो पिछले दो हजार वर्षों से मृतवत पडी थी. बहुत कम लोग हिब्रू जानते थे. इस भाषा में साहित्य बहुत कम था. नया तो था ही नहीं.

अतः किसी ने सुझाव दिया कि अंग्रेजी को देश की संपर्क भाषा बनाई जाए. पर स्वाभिमानी ज्यू इसे कैसे बर्दाश्त करते..?

उन्होंने कहा, ‘हमारी अपनी हिब्रू भाषा ही इस देश के बोलचाल की राष्ट्रीय भाषा बनेगी.’

निर्णय तो लिया. लेकिन व्यवहारिक कठिनाइयां सामने थी. बहुत कम लोग हिब्रू जानते थे. इसलिए इज़राइल सरकार ने मात्र दो महीने में हिब्रू सिखाने का पाठ्यक्रम बनाया. और फिर शुरू हुआ, दुनिया का एक बड़ा भाषाई अभियान..! पाँच वर्ष का.

इस अभियान के अंतर्गत पूरे इज़राइल में जो भी व्यक्ति हिब्रू जानता था, वह दिन में 11 बजे से 1 बजे तक अपने निकट के शाला में जाकर हिब्रू पढ़ाता. अब इससे बच्चे तो पाँच वर्षों में हिब्रू सीख जायेंगे. बड़ों का क्या..?

इस का उत्तर भी था. शाला में पढने वाले बच्चे प्रतिदिन शाम 7 से 8 बजे तक अपने माता-पिता और आस पड़ोस के बुजुर्गों को हिब्रू पढ़ाते थे.

अब बच्चों ने पढ़ाने में गलती की तो..? जो सहज स्वाभाविक भी था. इसका उत्तर भी उनके पास था.

अगस्त 1948 से मई 1953 तक प्रतिदिन हिब्रू का मानक (स्टैण्डर्ड) पाठ, इज़राइल के रेडियो से प्रसारित होता था. अर्थात जहां बच्चे गलती करेंगे, वहां पर रेडियो के माध्यम से बुजुर्ग ठीक से समझ सकेंगे.

और मात्र पाँच वर्षों में, सन 1953 में, इस अभियान के बंद होने के समय, सारा इज़राइल हिब्रू के मामले में शत प्रतिशत साक्षर हो चुका था..!

आज हिब्रू में अनेक शोध प्रबंध लिखे जा चुके हैं. इतने छोटे से राष्ट्र में इंजीनियरिंग और मेडिकल से लेकर सारी उच्च शिक्षा हिब्रू में होती हैं. इज़राइल को समझने के लिए बाहर के छात्र हिब्रू पढने लगे हैं..!

ये हैं इज़राइल..! जीवटता, जिजीविषा और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक..!

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