और इसी जगह से प्रथम विश्व युद्ध की नींव पड़ गयी

(1)टाउन हाल - जो एक सरकारी भवन है - की पट्टिका पे लिखा हुवा है कि "सर्ब" अपराधियों ने इस भवन में स्थित पुस्तकालय में आग लगा दी थी. ध्यान दीजिये, अपराधी नहीं, सर्ब अपराधी लिखा है. (2)सरायेवो शहर के एक काफे के बाहर वाल पेंटिंग. संयुक्त राष्ट्र को वहां के लोग युद्ध ना रोक पानें का दोषी मानते है. (3)और इसी जगह से प्रथम विश्व युद्ध की नींव पड़ गयी

28 जून 1914 को ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के शाही राजकुमार, वारिस और आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड, सरायेवो (Sarajevo) में अपने साम्राज्य की सशस्त्र सेना का निरीक्षण करने के लिए गए थे.

खुली कार में वे पहली बार अपनी प्रेयसी एवं पत्नी सोफी – जो एक गरीब चेक (Czech) परिवार से होने के कारण शाही प्रोटोकॉल से वंचित थी तथा अपने पति के बगल में जनता के सामने नहीं बैठ सकती थी – के साथ सरायेवो का दौरा कर रहे थे.

चूंकि ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य ने सरायेवो पे युद्ध के बाद कब्ज़ा किया था, वहां पे सोफी अपने पति के साथ सरकारी कार्यक्रमों में भाग ले सकती थी, उनके बगल में बैठ सकती थी. 28 जून को उनके विवाह की सालगिरह भी थी.

सर्ब राष्ट्रवादी मानते थे कि बोस्निआ प्रान्त – जिसकी राजधानी सरायेवो थी – उनके राष्ट्र सर्बिया का भाग है और वे ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य से अप्रसन्न थे. 28 जून को एक सर्ब – गाव्रिलो प्रिंसिप – ने लैटिन पुल के पास गोली मार के आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और सोफी की हत्या कर दी.

कई देशों ने इस हमले के लिए सर्बियन सरकार को दोषी ठहराया. 28 जुलाई को ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया पर युद्ध की घोषणा कर दी. रूस, बेल्जियम, फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन और सर्बिया एक हफ्ते में ऑस्ट्रिया-हंगरी और जर्मनी के खिलाफ खड़े हो गए.

और प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया.

पिछले सप्ताह कुछ समय बोस्निआ-हर्ज़ेगोविना की राजधानी सरायेवो में बिताये. व्यस्त कार्यक्रम से कुछ समय निकालकर लैटिन पुल गया और वह जगह देखी जहाँ पे फ्रांज फर्डिनेंड और सोफी की हत्या हुई थी.

प्रथम विश्व युद्ध की त्रासदी से अधिक मुझे इस बात ने विचलित किया कि सोफी की अपने पति के साथ, उनके बगल में उनकी पहली यात्रा थी, वह भी उनकी शादी की वर्षगांठ के अवसर पे. गोली लगने के बाद फ्रांज फर्डिनेंड ने सोफी को कहा कि “प्रिये, तुम मर नहीं सकती, तुम्हें हमारे बच्चों के लिए जीना है.”

यूगोस्लाविया के शहर इसी सरायेवो ने वर्ष 1984 में विंटर ओलिंपिक खेलो का आयोजन किया था. लेकिन 8 वर्ष बाद ही उसी यूगोस्लाविया के प्रान्त बोस्निआ-हर्ज़ेगोविना ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी.

इसको रोकने के लिए सर्बिया की सेना ने सरायेवो शहर की घेराबंदी कर दी. शहर के चारो तरफ पहाड़ियों पे स्नाइपर (निशानेबाजों) ने पोजीशन ले ली और जो भी व्यक्ति घर से निकलता, उसे वे शूट कर देते थे. चार वर्ष चली इस घेराबंदी में लगभग 14000 लोग मारे गए, जिनमें 5400 आम नागरिक थे.

जब मोर्टार या ग्रेनेड से आम लोगों की मृत्यु हो जाती थी, तो उस जगह पे मोर्टार से बने निशानों में बाद में लाल रंग भर दिया गया जिसे सरायेवो रोजेज या गुलाब कहा जाता है. सरायेवो के पुराने भाग में एक तरफ ओटोमन (टर्की) और दूसरी तरफ ऑस्ट्रो-हंगेरियन स्टाइल के भवन बने हुए है.

सरायेवो रोजेज या गुलाब

आज बोस्निआ-हर्ज़ेगोविना एक विभाजित राष्ट्र है. यह बोस्नियाक (मुस्लिम), सर्ब (ऑर्थोडॉक्स ईसाई) और क्रोएट्स (कैथोलिक ईसाई) सम्प्रदाय और नागरिकता के आधार पे बंटा हुआ है.

सरायेवो पूरी तरह से बोस्नियाक शहर है, इसके दो किलोमीटर दूर पूर्वी सरायेवो सर्ब शहर है. इसी तरह कुछ शहरों में क्रोएट की बहुलता है. इस देश में तीनों सम्प्रदाय के तीन राष्ट्रपति है जो हर आठ महीने में टर्न लेते है.

इसी तरह इनके विधायक भी बंटे हुए हैं. मिक्स्ड क्षेत्रों में एक स्कूल में दो शिक्षा व्यवस्था है; सुबह एक वर्ग के छात्रों को एक भाषा, साहित्य और इतिहास पढ़ाया जाता है, तो दोपहर को दूसरे ग्रुप को अन्य भाषा, साहित्य और इतिहास.

किसी ने सही ही कहा है कि बालकन्स के देश – जिसमें सर्बिआ, क्रोएशिया और बोस्निया-हर्ज़ेगोविना शामिल है – इतने अधिक इतिहास का उत्पादन करते है कि उसकी खपत नहीं हो पाती.

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