उसकी भूख और मेरी नींद… कौन इसका हिसाब रखेगा?

फ्राइडे है… अगर आपकी शनिवार की ड्यूटी ना हो तो लोग फ्राइडे का इंतज़ार करते हैं. थैंक गॉड इट्स फ्राइडे… सिर्फ रेस्टॉरेंट का नाम नहीं है, एक सेंटीमेंट है.

फ्राइडे खाने पीने, घूमने फिरने, मौज मस्ती करने का दिन है. पर आज मेरी पत्नी के उपवास का दिन है. मेरी घूमने फिरने और मस्ती करने की शौकीन पत्नी ने शुक्रवार को उपवास का दिन चुना है… मेरी वजह से.

मैं सारी जिंदगी कोई ना कोई एग्जाम देता रहा हूँ. और कभी भी बहुत कंसंट्रेशन से पढ़ने लिखने वाला बन्दा नहीं रहा हूँ. कोर्स की किताबों के अलावा हर चीज मुझे भटकाती है. तो परीक्षाएँ भगवान भरोसे ही पास करता रहा हूँ. और भगवान से मेरा कनेक्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है. तो वह कनेक्शन जुगाड़ने का काम मेरी पत्नी का है.

तो जब भी कोई परीक्षा आती है, वह एक मन्नत माँग लेती है. कभी 11 बृहस्पतिवार, कभी 21 शुक्रवार के व्रत उठा लेती है. मेरे एग्जाम तो ले दे के सारे खत्म हो गए, उसके व्रत उपवास का कोटा खत्म नहीं हुआ है.

मेरी सफलता और उन्नति के लिए उसने जो इतनी भूख सही है, उसका हिसाब लगा सकता हूँ क्या? इसकी बराबरी कैसे होगी? मेरी सफलता में, मेरे करियर में कितना हिस्सा उसका है? कौन गिनेगा? पूछूँ वामिनियों फेमिनिस्टों से यह गणित लगाएंगी क्या? या इसे पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री से अन्याय की कहानी बता कर निकल लेंगी?

उसकी भूख की कीमत वापस चुका सकता हूँ क्या? कभी चुकाई है?

एक बार ऐसा एक समय आया था. हमारी शादी के कुछ पहले की बात है. वह बीमार पड़ी थी. बहुत बहुत ही बीमार. तब मैं 10 दिनों तक लगातार उसके सिरहाने रहा. नहीं, कुछ करना नहीं था जग के. पर तब लगता था कि हमारे पास समय बहुत कम है, कीमती है. जो है उसे सोकर नहीं गँवाना था.

आखिर में उसका ऑपेरशन हुआ. सब ठीक रहा. मैं उसे हस्पताल में छोड़ कर वापस आया. फौज में आप छुट्टी से एक दिन भी देरी नहीं कर सकते. आना ही पड़ा. बिना रिजर्वेशन के स्लीपर क्लास में चढ़ा… दिल्ली में.

ट्रेन के प्लेटफार्म छोड़ने से पहले सीट के नीचे फर्श पर अखबार बिछा कर जो सोया… उठा तब ट्रेन हावड़ा में घुस रही थी. बीच में एकबार मुगलसराय में उठकर टॉयलेट गया था जब किसी ने मुझे हिला डुला के चेक किया कि जिंदा हूँ, ठीक ठाक हूँ, या किसी ने कुछ खिला दिया है. दस दिन की कसर एक दिन में पूरी की…

लौट कर आया तो सबसे पहले कालीघाट गया… और पहली बार भगवान से कुछ माँगा था… इस प्रॉमिस के साथ कि आज के बाद कुछ नहीं माँगूँगा… तब से आजतक भगवान से माँगने का काम आउटसोर्स कर रखा है…

उसकी भूख और मेरी नींद… कौन इसका हिसाब रखेगा? बराबरी हुई या नहीं? माँग लो बराबरी… देखो क्या मिलता है? इन वामिनियों फेमिनिस्ट मूढ़मतियों को पता नहीं कि इनसे क्या छीना छला जा रहा है. जीवन में जिसने बराबरी का हिसाब लगाया उसे हमेशा नुकसान ही उठाना पड़ता है. जीवन के बही खातों में आग लगा दो… फायदे में रहोगे.

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