बौद्धिक विकलांग और बौद्धिक बे-ईमान होता है वामपंथी समुदाय

सूखे से किसानों की बदहाली की ज़िम्मेदार जितनी काँग्रेस है उतना ही कम्युनिस्ट भी हैं.

कोई भी राष्ट्र अपने आरंभिक दशकों में दूरगामी सु-प्रभाव वाली नीतियाँ बनाता हैं.

स्वयं को किसानों-मजदूरों का हितैषी बताने वाले वामपंथी स्वाधीनता के प्रथम चार दशकों में सबसे बड़े विपक्षी दल रहे और सत्तारूढ़ काँग्रेस से उनके सम्बन्ध भी अच्छे रहे.

उस दौरान सूखे, सिंचाई, और किसानों से सम्बंधित दीर्घ-कालीन नीति-निर्माण व क्रियान्वयन के लिए काँग्रेस सरकारों पर दबाव बनाने की ज़िम्मेदारी वामपंथियों की ही थी.

किसानों के प्रति वामपंथियों की इस आपराधिक उदासीनता का नतीजा ये रहा कि देश में कृषि-भूमि के 65 प्रतिशत हिस्से के लिए कोई सिंचाई तंत्र विकसित नहीं हो पाया.

तालाब-तलैयों के रखरखाव की नीति नहीं बन पायी, जलाशय सूखते चले गए, वर्षा-जल संरक्षण के लिए ‘रेन हार्वेस्टिंग’ विकसित नहीं हो सका, भूमि में ‘वॉटर-रिचार्जिंग नीति’ नहीं बन पायी, और देश में वर्षा-हिम-स्त्रोतों से जल की असीम संभावना जल-संग्रहण में तब्दील नहीं हो पायी.

किसे लाभ पहुंचाने के लिए उस दौरान वामपंथी दलों ने तब प्रश्न नहीं उठाए जब सूखेग्रस्त-इलाकों में नेताओं की चीनी मिलों के लिये अत्यधिक जल-आवश्यकता वाले गन्ने की खेती होती रही और वे इलाके सूखते चले गए?

ऊंचे जल-स्तरीय राज्यों में ‘कम जल-आवश्यकता वाली फसलों’ की खेती और निम्न जल-स्तरीय राज्यों में ‘अधिक जल-आवश्यकता वाले फसलों’ की खेती होती रही, और ये कम्युनिस्ट सोये रहे.

यह सत्य है कि वामपंथी-समुदाय ‘इंटेलेक्चुअली चैलेंज्ड’ होता हैं यानि उनका बौद्धिक-स्तर निम्न होता है और फलस्वरूप नीति-निर्माण के गहन मुद्दे बहुत हद तक वे समझ ही नहीं पाते.

आखिर इसी बुद्धि-हीनता के कारण तो विश्व के कई पूर्व कम्युनिस्ट देश भुखमरी के कगार पर आ गए थे.

साथ ही साथ लेकिन ये भी सच है कि कम्युनिस्ट ‘इंटेलेक्चुअली डिस-ऑनेस्ट’ भी होते हैं और ‘मजदूर-किसान’ को मात्र एक ‘नारा’ की तरह इस्तेमाल करते हैं. कम्युनिस्टों की ‘बौद्धिक विकलांगता’ और ‘बौद्धिक बे-ईमानी’ – बड़ा खतरनाक कॉकटेल है ये!

प्रयुक्त तथ्यों का स्त्रोत :

1. World Bank

2. International Water Management Institute

3. Institute of Rural Management Anand (IRMA)

4. Current World Environment journal

5. Others

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