बेचैन बंदर : ब्रह्माण्ड और जीवन के रहस्यों की एक रोमांचक दास्तान

कोई व्यक्ति खाने का शौकीन हो तो भी उसे हर तरह का खाना पसंद नहीं आ सकता. ऐसे ही कोई कितना भी पढ़ने का शौकीन हो, उसे हर विषय पर समान रुचि नहीं हो सकती. मेरे मामले में सबसे कम रुचि का विषय ‘विज्ञान’ रहा है, इसके बावजूद कि विज्ञान ही सबसे अधिक आवश्यक विषय है. विज्ञान को पढ़ना कभी मेरे भीतर वो खुशी, वो उत्साह पैदा नहीं कर पाता जितना अन्य विषय.

पर जैसे रोज ही चाय पीने वाले को कभी-कभी कॉफी अच्छी लग सकती है, रोज ही इंडियन खाने वाले को कॉन्टिनेंटल अच्छा लग सकता है, विज्ञान भी कभी-कभी अच्छा लगने लगा था. और इसका श्रेय विजय ठकुराय (विजयराज शर्मा) को जाता है.

इनकी पुस्तक की बड़ी चर्चा सुनी थी. एक तो मेरे क्षेत्र से बाहर का विषय, ऊपर से मेरे हिसाब से थोड़ा अधिक दाम, खरीदूं या नहीं, इसी पेशोपेश में था. किताब पढ़ी, और कह सकता हूँ कि विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह एक बेहतरीन किताब साबित होगी.

हालांकि शुरू के कुछ अध्यायों में अत्यधिक टेक्निकल/साइंटिफिक शब्द और वाक्य संयोजन इसे शुरू से ही बोरिंग होने का अहसान दिला देते हैं, पर यदि कोई थोड़ा धैर्य रखे तो रिदम बन जाता है. शुरू-शुरू के अध्यायों में यह किताब विशुद्ध विज्ञान सम्बंधित प्रतीत होती है. अपने ‘झकझकिया’ की वो खास स्टाइल मिसिंग है पर आगे वे अपने पूरे जलाल पर दिखती है.

एक पाठक की हैसियत से मेरे लिए बड़े उपापोह की स्थिति बन जाती है जब मैं खुद को ही समझ नहीं पाता कि अंततः मैं चाहता क्या हूँ? जब शुरू के अध्यायों में सिर्फ विज्ञान है तो मुझे बोरिंग लगता है और जब बाद के अध्यायों में विज्ञान कम और उसकी धर्म से तुलना अधिक होने लगती है तो यह कवायद अनावश्यक प्रतीत होती है.

लेखक ने कई जगह यह लिखा है, दर्शाया है कि धर्म ने बारम्बार विज्ञान को अमान्य करते हुए अपनी ही ढपली बजाई है, जो कि सही भी है. वे बिलकुल निरपेक्ष होकर सभी धर्मों की एकसार आलोचना करते हैं. वे लिखते हैं कि चूंकि पश्चिम के देशों में इतिहास लेखन अधिक होता था इसलिए वहां धर्म के हस्तक्षेप के लिखित प्रमाण उपलब्ध हैं.

अर्थात भारत में इतिहास लेखन नहीं होता था तो धर्म की विज्ञान में अनावश्यक दखलन्दाजी लिपिबद्ध नहीं हो पाई. यह भी तो हो सकता था कि ‘जियोडारनो ब्रूनो’ जैसा यहां कुछ हुआ ही नहीं तो लिखते क्या?

चार्वाक का जिक्र किया है लेखक ने, उनकी तारीफ की है. ये वही चार्वाक हैं जिन्होंने ईश्वरीय सत्ता को नकार दिया था और कई परम्पराओं पर प्रश्न खड़े किए थे. अलग विचार और प्रश्न रखने वाले उस व्यक्ति को हमारे यहां महर्षि कहा गया, ब्रूनो की तरह चौराहे पर जलाया नहीं गया (हालांकि आनन्द नीलकण्ठन ने अपने ‘अजेय’ में चार्वाक को जलाया जाता हुआ दिखाया है).

यह मानता हूं, और बहुत लोग मानेंगे कि मजहबों ने अनावश्यक रूप से विज्ञान से छेड़छाड़ की है. कुछ भी नया मालूम चले तो धर्म के ठेकेदार इसे या तो स्वीकार नहीं करते या यह कहते हैं कि ये चीज हमारी फलां किताब में पहले से लिखी है. वे विज्ञान को सफल होता हुआ नहीं देख सकते, उसका अस्तित्व स्वीकारने में उन्हें दुख होता है.

पर ऐसा ही कुछ विज्ञान के वकीलों के साथ भी है. विज्ञान का काम शंका करना है, अनुसंधान करना है, पर यह खिल्ली उड़ाता है. तब तक उड़ाता है, जब तक इन्हीं का कोई भाई बन्धु धार्मिक कल्पना को परिकल्पना का नाम देकर अंततः सिद्ध नहीं कर देता.

अंतिम रूप से क्या विज्ञान यह सिद्ध कर सकता है कि ईश्वर है, या नहीं है? सपनों पर इन्होंने लिखा है, उससे महान गणितज्ञ रामानुजन याद आते हैं. रामानुजन के कई फार्मूले आज भी सिद्ध होने का इंतजार कर रहे हैं. अपने जीवनकाल में वे भी नहीं कर पाए थे. सीधे सूत्र ही लिख देते.

पूछने पर कहते कि सपने में देवी नामागिरी सूत्र बता जाती हैं. विज्ञान हर चीज का जवाब नहीं हो सकता. और जिसका जवाब नहीं मिलता उसे हैलुसिनेशन जैसे आसान शब्द का नाम दे देना विज्ञान की अपनी विशिष्ट धर्मांधता है.

किताब विज्ञान के नाम पर प्रचारित हुई, पर वास्तव में मात्र विरोध करती हुई प्रतीत होती है. विरोध पर अधिक फोकस करने से लेखन में सात्विक सुंदरता का लोप हो जाता है. इसके मूल्य को लेकर बहुत आलोचना हुई है जो मुझे सही नहीं लगती. मेरे लिए महंगी है पर यह लेखक/प्रकाशक का अधिकार है कि वह क्या मूल्य रखे. हालांकि यदि चित्र रंगीन होते तो अधिक उचित रहता.

कुछ सामान्य गलतियां हैं जो एडिट की जा सकती थी, पर वे नगण्य गलतियां हैं जो नजरअंदाज की जा सकती हैं. बड़ी गलती एक यह है कि किताब में (जो मुझे मिली) 15 पेज गायब हैं. पेज संख्या 1 से 48 के बाद 129 से 144 है, और उसके बाद 65 से 248. पेज संख्या 129-144 पूरी किताब में दो बार हैं और 49 से 64 नदारत. इस मूल्य की किताब में ऐसा दोष होना बहुत बुरा लगता है. एक और बात कि विज्ञान की किताब में कोई रेफरेंस नहीं? अजीब बात है.

अस्तु,

मुझे किताब पसन्द भी आई, और बहुत बुरी भी नहीं लगी. यदि मेरी बेटी हाईस्कूल/इंटर में होती तो उसे इस किताब को पढ़ने की सलाह जरूर देता.

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