कश्मीर, धारा 370 और 8 जुलाई 2017 का महत्व

सबको मालूम है कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा देने वाली धारा 370 एक बड़ी समस्या है… इसका हटना ज़रूरी है… लेकिन ये नहीं मालूम कि कश्मीर के भारत में विलय के लिए धारा 370 जरूरी नहीं थी।

असल में कश्मीर का भारत में विलय पहले हुआ और धारा 370 बाद में आई… इसी 370 के बाद लगभग 4 वर्ष बाद आई धारा 35A…

समस्या 35A है, जैसे ही 35A ख़त्म होगी, इस धारा 370 का कोई मतलब नहीं रह जाएगा और ये भी मिट जाएगी…

थोड़ा पीछे चलते हैं… मुस्लिम बाहुल्य प्रोविंस जम्मू कश्मीर के हिन्दू राजा हरी सिंह ने बिना शर्त भारत में विलय किया था… सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करके नेहरू ने पास भेज दिया था जो उस समय कश्मीर देख रहे थे.

नेहरू ने ही राजा के सामने शर्त रखी कि देशद्रोह के आरोप में जेल में बन्द शेख अब्दुल्लाह को रिहा करो और उसको प्रधान मंत्री बना के भेजो उससे विलय पर बात करूँगा.

नेहरू उस समय राजा हरि सिंह के प्रधानमंत्री से मिलते ही नहीं थे… राजा ने शेख अब्दुल्लाह को इसलिए गिरफ्तार किया था क्योंकि विलय का अधिकार राजा के पास था.

इसके उलट शेख अब्दुल्लाह पाकिस्तान में विलय चाहता था जिसके लिए उसने हिंसक विरोध किया और राजा ने उसको देशद्रोह के अपराध में कारागार में डाल दिया था.

नेहरू प्रदर्शन के समय कश्मीर गए थे और वहाँ उन्होंने शेख अब्दुल्लाह का समर्थन किया था… जिससे राजा से नेहरू के सम्बन्ध कटु हो गए थे…

15 अगस्त 1947 के बाद अक्टूबर तक नेहरू ने राजा और उनके प्रधानमन्त्री का तिरस्कार किया… उधर पाकिस्तान के क़ायद-ए-आज़म जिन्नाह ने कश्मीर में कबायली और उनके साथ सादे कपड़ों में सेना भेज दी जो कश्मीर को लूटते, मार काट, बलात्कार हुए अंदर बढे चले आ रहे थे.

राजा हरी सिंह बार बार दिल्ली की मिन्नत करते रहे कि रक्षा करो और कश्मीर को भारत में मिलाओ लेकिन नेहरू अपने ज़िद पर अड़े थे…

अंततः हार कर राजा ने शेख अब्दुल्लाह को रिहा किया और शेख के साथ अपने रानी को दिल्ली भेजा विलय पत्र और पाकिस्तानी हमले से बचाव के गुहार को लेकर…

इस बार राजा ने विलय पत्र और मदद का पत्र नेहरू की जगह लार्ड माउंटबेटन को भेजा था… इधर राजा ने सेवकों से कह दिया था कि अगर इस बार असफल रहे तो मुझे गोली मार देना…

खैर बात आगे बढ़ी… चूंकि सेना के तीनों अंगों के प्रमुख अभी अँगरेज़ थे और उनके मुखिया लार्ड माउंटबेटन थे तो उसने फैसला लेते हुए 22 अक्टूबर को भारतीय सेना कश्मीर में उतार दी.

ये लड़ाई पूरे एक वर्ष और दो महीने चली… सेना ने 60% भाग खाली करा लिया था लेकिन नेहरू मामले को UN (संयुक्त राष्ट्र) ले गए…

सेना प्रमुख, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और अन्य लोग नेहरू को रोकते रहे लेकिन नेहरू ज़िद पर अड़े रहे… मामला UN गया और संघर्ष विराम (ceasefire) घोषित हो गया.

खैर आगे… विलय के बाद राजा ने कश्मीर छोड़ दिया और मुंबई में आकर बस गए… नेहरू ने कश्मीर को शेख अब्दुल्लाह के हवाले कर दिया…

जब संविधान लिखा जा रहा था तब शेख अपने लिए स्पेशल प्रोविज़न का मांग लेकर नेहरू के पास आया जिसको नेहरू ने मान लिया और सरदार पटेल को निर्देश दिया कि ये सब संविधान में जोड़ा जाए…

सरदार पटेल ने विरोध किया तो सीधे ड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन डॉ अम्बेडकर के पास भेजा जिन्होंने उस कागज़ को फाड़ के कूड़े में फेंक दिया…

लेकिन नेहरू ज़िद पर अड़े थे और अंत में राजगोपालाचारी के जरिए इन बिंदुओं को संविधान में डलवाया जिसको आज हम धारा 370 के नाम से जानते हैं…

इसके लिए आहूत मीटिंग के विरोध में डॉ आंबेडकर ने वॉक आउट किया था जिसका खामियाजा उनको अंत तक नेहरू की कांग्रेस के हाथों भुगतना पड़ा था…

हालांकि सरदार पटेल ने इस धारा 370 को कभी भी ख़त्म करने के लिए इसमें टेम्पररी प्रोविज़न जुड़वा दिया था…

लेकिन 1950 में जब पटेल नहीं रहे, कांग्रेस से अन्य सबको दरकिनार कर नेहरू खुद प्रधानमंत्री और कांग्रेस के अध्यक्ष भी बन बैठे तो उन्होंने धारा 35A को जन्म दिया…

ये भी रिकॉर्ड में है कि नेहरू ने जब 35A को डॉ राजेंद्र प्रसाद के पास भेजा तो उन्होंने इसको लगाने को मना कर दिया जिस पर नेहरू ने उनको पत्र द्वारा कहा कि हम इस पर प्राइवेट में बात करेंगे…

कुछ दिन बाद वो ऐतिहासिक प्राइवेट बात हुई जिसके बाद राष्ट्रपति ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए… इस धारा के अनेकों बिंदुओं से सिर्फ एक बिन्दु बताता हूँ…

पहला और सबसे ज़रूरी कि जम्मू और कश्मीर में भारत के संविधान के तय मानकों द्वारा और संसद से पारित किसी भी कानून को जम्मू और कश्मीर में नहीं माना जाएगा.

जम्मू और कश्मीर में वही धाराएं और कानून मान्य होंगे जो वहाँ की विधानसभा पारित करेगी… भारत के कानून नहीं माने जाएंगे… जम्मू कश्मीर का अलग झंडा होगा, इसको रिपब्लिक ऑफ़ J&K बोला जाएगा, यहाँ का सदर CM (मुख्यमंत्री) नहीं PM (प्रधानमंत्री) होगा, यहाँ के PM और भारत के PM का प्रोटोकॉल PM – PM प्रोटोकॉल होगा, यहाँ भारत के किसी नागरिक को आने के लिए परमिट लेना होगा.

यह अनोखा अधिकार ही कश्मीर की मूल समस्या का जड़ है… 370 लगने और इसमें 35A जुड़ने के बाद ‘8 जुलाई 2017’ तक भारत के संविधान से पारित कोई कानून J&K में मान्य नहीं थे …

8 July 2017 को अंग्रेज़ों से आज़ादी के ठीक 69 वर्ष 10 महीने और 24 दिन बाद कोई पहला ऐसा देश व्यापी कानून बना जिसको पहली बार जम्मू और कश्मीर की सरकार ने माना और उसी स्वरुप में उसे लागू किया… वो कानून है GST – Goods And Service Tax – 2017.

इसलिए GST न सिर्फ देश में क्रांतिकारी आर्थिक बदलाव लाने वाला कानून है और इससे आने वाले वर्षों में देश में व्यापारिक पारदर्शिता के साथ उन्नति के नए आयाम लिखे जाएंगे बल्कि इस GST ने J&K में भी भारत के संसद से पारित कानून को वहाँ लागू करवाने रास्ता साफ़ किया गया…

ये GST जिस प्रारूप में केंद्र सरकार ने पास करके दिया, ठीक वैसे ही, उसी प्रारूप में J&K में लागू हुआ… जो अभूतपूर्व है, ऐतिहासिक है और आने वाले समय में कश्मीर में हमारे अगले कदम को मजबूती प्रदान करने वाला है…

ये उपलब्धि हमारी आपकी जेब से कुछ दिन तक चन्द रुपयों के नुकसान से कहीं बड़ी, अनंत फायदे वाली उपलब्धि है… इस सफलता के लिए भारत की इस मोदी सरकार और J&K की पीडीपी – बीजेपी गठबंधन सरकार को इतिहास के पन्ने में ख़ास जगह मिलेगी.

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