कौन बदन से आगे देखे औरत को, सबकी आँखें गिरवी हैं इस नगरी में!

डिसक्लेमर: लेखक नादान है (और शायद प्यार में भी है). तो जो दिल में आए, कुछ भी ऊल-जुलूल लिख रहा है. कृपया त्रुटियों के लिए क्षमा कर दीजिएगा. और किसी को कोई बात अच्छी ना लगे तो मान लीजिएगा कि वो इसी इरादे से लिखी गई है ताकि आपको अच्छी ना लगे. मैं तो लिखूँगा बिकॉज़ देयर इज़ फ्रीडम ऑफ स्पीच एण्ड एक्प्रेशन इन दिस कंट्री!

हमीदा शाहीन जी का एक शेर है:
“कौन बदन से आगे देखे औरत को,
सबकी आँखें गिरवी हैं इस नगरी में!”

यकीनन जिस्म से आगे बढ़कर रूह तक पहुँचने का सफ़र तय करना हर किसी के बस की बात नहीं है. यदि सीता की अग्निपरीक्षा के विषय में जो जिसने बताया बस वही जानते हो तो आप भी एक औरत के जिस्म से रूह तक का सफ़र तय नहीं कर सकते. ज़रा ख़ुद ज़हमत उठाइए, पढ़िए, क्योंकि पढ़ना बहुत ज़रूरी है.

“त्याग दी सब ख़्वाहिशें निष्काम बनने के लिए,
राम ने खोया बहुत कुछ, ‘श्रीराम’ बनने के लिए!”

‘श्री’ कहा जाता है लक्ष्मी जी को, जिनका अवतार थीं माता जानकी. इसीलिए “श्रीराम” शब्द अपने आप में ही परिपूर्ण है. लेकिन ‘श्री’ का साथ पाने के लिए राम की सी तपस्या भी करनी पड़ेगी. तो अबसे श्रीराम लिखा दिखने पर केवल राम नहीं, सिया का स्मरण भी किया कीजिए. क्योंकि सिया बिन राम के साथ भी ‘श्री’ नहीं लग सकता.

“शक्ति सहितं शिवं शिवं, शक्ति विहीनं शवं शवं”.
अर्थात शक्ति है, तभी शिव ‘शिव’ है, शक्ति नहीं है इसीलिए शव ‘शव’ है. साधारण मनुष्य भी शक्ति का साथ पाकर शिवमय हो सकता है परन्तु शक्ति का जो साथ ना हो तो मनुष्य का शरीर शव के समान है.

इतिहास से अनजान पीढ़ी के लिए बनाए गए Moksh- The Dramatics Society के नाटक “अतिथि _ भवः” में एक डायलॉग हुआ करता है, कि “सारे शहर की दीवारें मर्दाना कमज़ोरी के इलाज के इश्तिहार से रंगी हैं, फिर जाने क्यों सब कहते हैं कि औरत कमज़ोर है.” अरे औरत तो कभी कमज़ोर हो ही नहीं सकती. हर प्रकार के जीवों में नारी (मादा) ही तो जन्म देती है संतान को. जो प्रकृति के सृजन में अपने भीतर से एक अन्य जीव की उत्पत्ति कर सके, क्या वो किसी भी स्थिति में कमज़ोर हो सकती है? नारीवाद, फ़र्ज़ी नारीवाद, मर्दवाद, फेमिनिज़्म, फेमिनाजिज़्म, जेंडर इक्वौलिटी, इत्यादि सभी शब्दों से बिल्कुल परे हमें ये स्वीकारना होगा कि पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक हैं.

औरत के हालत पर ही जावेद अख़्तर के मामू-जान मजाज़ लख़नवी का इक शेर है:
“तिरे माथे पे ये आँचल तो बहुत ही ख़ूब है लेकिन,
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था!”

मगर ईरान में हिजाब के खिलाफ विरोध ज़ाहिर करती युवतियों के लिए दो साल की कैद के फैसले सुनकर लगता है कि औरत को माथे के “आँचल” का ही परचम बनाना चाहिए, “हिजाब” का परचम बनाया जाना किसी मज़हब या किसी मर्दवादी सत्ता या शायद मर्दवादी सत्ता के मज़हब को बहुत खल रहा है.
(जिन्हें कोई शंका हो या ईरान के हालत से अनजान हों तो वे पढ़ सकते हैं, क्योंकि पढ़ना बहुत ज़रूरी है. पर यदि ऐसी ख़बरों से अपनी इच्छानुसार अनजान बने रहना चाहते हैं या आपकी राजनैतिक विचारधारा की मानसिक गुलामी आपको इस बारे में जानने-पढ़ने-सोचने-बात करने की इजाज़त नहीं देती तो आप अनजान बने रह सकते हैं. बिकॉज़ यू ऑल्सो हैव यूअर फ्रीडम डियर कॉमरे…!
https://iranwire.com/en/features/5209 )

कहा तो दिलावर फ़िगार ने भी था कि,
“औरत को चाहिए कि अदालत का रुख़ करे,
जब आदमी को सिर्फ़ खुदा का ख़्याल हो!”
मगर “जहाँ शरियत का कानून चले, वहाँ औरत का ही खून जले” वाले दरबारों में औरत की सुनवाई कैसे मुमकिन है.
ऐसी अदालतों की खातिर नीलमा सरवर जी लिख के ही गई हैं, कि:
“औरत अपना आप बचाए, तब भी मुजरिम होती है,
औरत अपना आप गंवाए, तब भी मुजरिम होती है!”
(उन्हें भी ये इल्म शायद इसीलिए था क्योंकि वे ख़ुद भी एक औरत थीं.)

सेलेक्टिव ऑउटरेज करने वाले सभी महानुभावों से एक विनम्र निवेदन ज़रूर है. दुनिया में कहीं भी किसी के भी साथ कुछ गलत हो रहा हो, तो उसके साथ खड़े ज़रूर हुआ कीजिए (बिना पीड़ित के साथ ज़ात-मज़हब-क्षेत्र-लिंग आदि आधारों पर भेदभाव किए), क्योंकि जाने कितनी यात्नाएं और पीड़ाएँ वो सह ही रहा होता है, आपके भेदभाव से भावनात्मक रूप से भी टूट जाएगा तो समय आपको भी दोषी ठहराएगा. अब ये तो आप स्वीकारते ही होंगे कि ‘समय बड़ा बलवान है’.

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है. सब बधाई दे रहे हैं. एक हमारी भी कबूल कर लो. साथ ही ईरान की उन साहसी युवतियों को भी नमन जो मज़हबी सत्ता, मर्दवादी सत्ता या मर्दवादी मज़हब की सत्ता (जो सही विशेषण लगे, लगा लीजिए), के आगे घुटने नहीं टेक रहीं.

– रमन सिंह

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