उसकी गालियां याद आती हैं तो बरबस मुस्कान आ ही जाती है…

आज से कुछ साल पहले जब मैं ट्रेन और बस से नियमित यात्रा करती थी, तब बस में अक्सर एक महिला मिल जाती, बिना सिलवटों की बड़े करीने से साड़ी पहने, सामान्य से थोड़ी बड़ी बिंदी लगाती, मुझे बड़ा प्रभावित करती.

बिल्हौर में तहसील में संभवतः कार्यरत थीं (मैंने कभी पूछा नहीं) साथ चलती थी तो आपस में एक मुस्कान की अदला बदली हो जाती.

मैं बस से तभी चलती थी जब मेरी train छूट जाती पर वे बस से ही चलती थीं तो लगभग सभी चालकों और परिचालकों को नाम से जानती और उनसे ढेर बतियाते चलती. महिलाओं से मैंने उन्हें कभी ज्यादा बातचीत करते नहीं देखा.

उनके साथ मेरे कई दिन बेहद स्मरणीय रहे!

#1 एक बार मैं परिचालक की सीट के ठीक पीछे वाली सीट पर बैठी थी, आगे परिचालक के ठीक बगल वाली सीट पर एक नशेबाज सा अधेड़ वय का व्यक्ति बैठा बीड़ी पी रहा था, उसका धुँआ सीधा मेरे ऊपर ही आ रहा था. मैंने थोड़ा अनदेखा किया क्योंकि सुबह सुबह कई बार उलझने का मूड नहीं होता.
परन्तु उनकी दृष्टि मुझसे मिली, वे वहीं से गरजीं “ए bose dk फेंक बीड़ी”
मैं मुंह खोले देखती रही उनकी तरफ!

बीड़ी धारक बोला “काहे! किराया हमउँ दे के बईठे हैं”

वे खड़ी हो के उसकी ओर लपकी और लगभग छलांग मारते हुए आ के उसकी कॉलर पकड़ के बोलीं “साले! मा%%%% ! अभी गेट खोल के नीचे धक्का दूँगी दोबारा बीड़ी के लिए मुंह नहीं खुलेगा!” उनकी आवाज की दहाड़ से पूरी बस को जैसे लकवा सा मार गया था और बीड़ी धारक ने तो बीड़ी फेंक के शायद सांस भी पूरी यात्रा में धीरे धीरे ही ली.

#2 एक गरीब सी महिला अपने 4-5 साल के बच्चे को ले कर चढ़ी और परिचालक से उसका टिकट छोड़ देने की विनती करने लगी. परिचालक उसके अपमान पर उतारू हो गया. वे फिर दहाड़ीं “ए साले bose dk! बच्चे का टिकट बना मत देना!” परिचालक तुरंत नतमस्तक हो गया!

#3 हमारे साथ की ही साथी शिक्षिका को बीच में बस स्टॉप से करीब 5km पहले उतरना था. बस की mst थी उनके पास, जो कि अगले बस स्टॉप तक की ही थी. उन्होंने आवाज दी रुकने को! बस चालक ने बस नहीं रोकी और मुस्कुराता हुआ बोला, बस तो स्टॉप पर ही रुकेगी. शिक्षिका अपने वांछित स्थान से काफी आगे आ गयीं तो शांत हो कर बैठ गयीं.

बस अपने स्टॉप पर पहुँच कर रुकी, वही महिला अपनी सीट से उठीं, चालक के पास आयीं और अचानक उसके गाल पर जोरदार तमाचा जड़ा और फिर वही गाली “साले!^#^#&!! वहां रोक देता तो अम्मा मर जाती तेरी?”

चालक उनका रौद्र रूप देख के भय के मारे कुछ बोल ही नहीं पाया! शिक्षिका ही बोलीं “अरे रहने दीजिए! रोज का ही है इन लोगों का”

अबकी बार वे शिक्षिका की तरफ चिल्लाईं “हां!तो पहले मारती कंटाप! ये भो%#& वाले सीधी तरह कहाँ समझते हैं.” शिक्षिका मुस्कुरा कर रह गयीं!

महिला सुरक्षा के लिए स्वयं नियुक्त उस महिला का सशक्तिकरण मैं कभी नहीं भूलती.
और उसकी गालियां याद आती हैं तो बरबस मुस्कान आ ही जाती है.

– ज्योति अवस्थी

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