वो अपने छोटे सी गृहस्थी रूपी ब्रह्मांड की स्वयंभू महामाया आदिशक्ति है

उसकी सुबह
परिंदों से पहले हो जाती है
और उसकी रात तब होती है
जब चांद, आधा आसमान
नाप चुका होता है…

अपनी बेतरतीब पैरहन
और उलझे बालों को लपेट
जुड़ा बना वो सुलझाने लगती है
बिस्तर पर पड़ी सिलवटें

और किचन से बेडरूम की
हर परिक्रमा में समेटती है
दाएं बाएं बिखरा पड़ा सामान…

उसकी घड़ी की सुइयां
बाकी घड़ी की सुइयों से
पंद्रह मिनट आगे रहती है

उसके ज़हन की फहरिस्त में है
बच्चो के टिफिन उनके स्कूल बैग
सास की कम मीठे की चाय
ससुर की खाली पेट की दवाई

और एक कप चाय वो भी
जिसमें दूध पत्ती और चीनी के बाद
घोलनी है थोड़ी रुमानियत
और जगाना है उस पुरुष को
एक नई ऊर्जा से भरकर
जिसे जाना है बाहर दुनिया में
दो पैसे कमाने…

उसे कब वक्त मिलता है
नारीवाद के गूढ़ अर्थ को समझने का
या पुरुषवाद को खत्म करने की
युक्ति लड़ाने का…

ना उसे शिफॉन की साड़ी पहन
करनी है कोई क्रांति
ना लड़नी है किसी आज़ादी की लड़ाई
अपने अंग वस्त्रों से…

उसे फुर्सत ही कहां है
माँ बहन पत्नी बेटी और बहू बनने से
वो जानती है वो अपने छोटे से
घर गृहस्थी रूपी ब्रह्मांड की
स्वयंभू महामाया आदिशक्ति है…

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