आओ करें जबलपुर की सैर – 1

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चौंसठ योगिनी

एक दिन दफ्तर में खाली बैठा हुआ था. सावन का महीना ऊपर से पवन का शोर था. हिसाब लगाया कि इस बार सप्ताह अंत में तीन दिन की छुट्टी है. चल यार रोहित कहीं घूमने चलते हैं. अंदर खुशी की लहर सी दौड़ गयी. घूमने का नाम सुनते ही जो चीज सबसे पहले याद आती है वही इस बार भी आयी. और क्या याद आएगा, वही पैसों की कमी. पता नहीं ये कमी मेरे पास ही होती है या सबका ये हाल है.

आजकल सोशल मीडिया का ज़माना है, कई लोग सोशल मीडिया पर इतने प्रसिद्ध हैं कि वो जहाँ घूमने जाते हैं उनमें से अधिकतर जगहों पर उनका कोई ना कोई प्रसंशक रूपी दोस्त मौजूद रहता है. जिस से इनके घूमने, रहने और खाने का खर्चा बच जाता है. सिर्फ आने जाने का भाड़ा लगा. हींग लगे ना फिटकरी रंग भी चौखा होय.

पर अपनी ऐसी किस्मत कहाँ. ना कभी लिखना आया, ना कभी सेलिब्रिटी बने. सच कहूँ तो मुझे ऐसे सेलिब्रिटी टाइप लोगों से जलन होती है. बजट देखा. कहीं आस पास ही जाया जा सकता था, ट्रेन से.

उत्तर भारत में जुलाई और अगस्त बारिश के महीने होते हैं. खिड़की से बाहर देखा. बारिश की गोल बूँदें काँच पर से लुढ़कती हुई नीचे गिर रही थी. सुना है ऐसा माहौल देख कर कुछ लोग रोमांटिक हो जाते हैं, मैं इमोशनल हो जाता हूँ. घूमने के लिए इमोशनल.

बारिश में पहाड़ों में जाना नहीं है, साउथ और ईस्ट इंडिया जा नहीं सकता. गुजरात महाराष्ट्र 3 दिन में आना जाना घूमना हो नहीं सकता. तो अब? तो अब मध्य प्रदेश जायेंगे. मामा के राज्य में. नेट चालू करो पार्थ, अजब गजब MP में घूमने की जगह ढूंढो.

बजट, आने जाने का समय, मौसम, ट्रेन में सीट आदि सब चीजों पर गौर किया. मंजिल को अच्छे से फिल्टर पर लगाया गया. जबलपुर. वीकेंड के लिए सही जगह है भाई यहीं चल. इरादा बदले उस से पहले ही घर फोन कर दिया

“ऑफिस में काम ज्यादा है इस बार नही आऊंगा.”
15 अगस्त को कौन सी कम्पनी खुलती है बेटा?
खुलती है, बस ओवरटाइम मिल जाता है.
चल ठीक है, कोई नहीं.

कई बार बुरा भी लगता है, घर पर झूठ बोल कर जाना. पर कहते हैं कि खुजली और कलंक प्रकृति की 2 ऐसी कालजयी रचनाएँ है कि एक बार लग जाये तो मिटाना भारी हो जाता है. मुझे खुजली लगी घूमने की, फिर चाहे झूठ बोल कर ही जाना पड़े. दोस्तों को फोन किया, चलोगे घूमने जबलपुर? जवाब मुझे पहले से ही पता था. आपको भी अंदाजा तो हो ही गया होगा.

13 अगस्त शाम 5 बज कर 45 मिनट, निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन, मध्य प्रदेश सम्पर्क क्रांति. ट्रेन सही समय पर छूटी. बारिश की बूँदें गालों पर लुढ़कते आँसुओं की तरह खिड़की के कांच पर गिर कर नीचे की तरफ भाग रही थी. मैं फिर से इमोशनल हो गया.

बैग से हेडफोन निकाल कर कान में ठूँसा, गाना लगाया- बोलो इतने दिन क्या किया, तेरा नाम लिया हो तुझे याद किया, तुझे याद किया तेरा नाम लिया. खिड़की वाली सीट, बारिश और गाना … क्या संयोग था. ज्यादातर खुशमिजाज लोगों का पसंदीदा कॉम्बिनेशन. जहाँ मौका मिले अपनी तारीफ कर लेनी चाहिए. अँधेरा घिर रहा था. शहर पीछे छूट रहे थे. 9 बजते बजते लोग सोने लगे. जबलपुर मैं आ रहा हूँ, सोचते सोचते सो गया.

जबलपुर पहुंच कर स्टेशन से रिक्शा लिया और बोला किसी सस्ते से होटल में चलो. सस्ते होटलों को रिक्शे वालों से अच्छा भला कौन जानता है. कभी कभी तो लगता है कि जैसे रिक्शा वाले होते ही सस्ते होटल में ले जाने के लिए.

दिल्ली में मैंने अक्सर देखा है एक रिक्शा वाला आप जितने में कहोगे उतने बजट का कमरा दिखा देगा. स्टेशन के आस पास पानी जमा था. रिक्शे वाले ने बताया रात को अच्छी बारिश हुई है. अभी धूप नहीं निकली थी और मौसम इतना खुशनुमा था जैसे कह रहा हो ‘Welcome To Jabalpur’.

एक दो होटलों में पूछताछ करने के पश्चात एक होटल में 400 रु का कमरा मिल गया. जबलपुर की व्यवसायिकता को देखते हुए 400 रु ज्यादा नहीं थे. मुझे यहाँ सिर्फ आज की रात ही रुकना था. अगले दिन रात को फिर वापसी की ट्रेन थी. कमरे में गया और जाते ही नहा कर कपड़े बदले.

कल वाले कपडे थोड़े भीग गए थे. भर पेट नाश्ता किया और घूमने निकल पड़ा. बारिश तो नहीं हो रही थी पर बादल छाए हुए थे. रेनकोट और छाता मैं साथ लाया था. जबलपुर में घूमने के लिए काफी जगह हैं जिनके बारे में आने से पहले में काफी विस्तार से जानकारी लेकर आया था. परन्तु एक दिक्कत वाली बात ये है की सारी जगह काफी दूर दूर हैं. और इनको आपस में जोड़ने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बारे में कोई विशेष जानकारी मुझे नहीं मिल सकी. तो ये निश्चय कर लिया की कोई ऑटो किराये पर बुक कर के घूम लेंगे.

तभी होटल वाले का फ़ोन आया – भाईसाहब आपको कहाँ कहाँ घूमने जाना है?

अरे, ये तो आपको बताना चाहिए कि आपके शहर में भीड़ के अलावा क्या है घूमने का.

हाँ हाँ यहाँ बहुत कुछ है. आप ऐसा करो वापिस होटल आ जाओ मैं सारा इंतज़ाम करवा देता हूँ.

ठीक है आता हूँ लेकिन मुझे सस्ता इंतज़ाम चाहिए.

ठीक है आ जाओ. फिर बात करते हैं.

अच्छा जी ऐसा भी होता है! होटल वाले को मेहमान की इतनी फिक्र! क्या बात है. अक्सर सस्ते होटल वाले को इतनी तमीज से बात करते हुए देखा नहीं. और सस्ते होटलों में रुक रुक कर मैं भी इनकी बदतमीज़ी का आदी हो गया हूँ.

वापिस रिसेप्शन पर पहुँचा तो उसने एक कागज पर कोई 5 या 6 जगह दिखाई. देखो मैं आपको यहाँ यहाँ घूमने भेज रहा हूँ. हमारे जबलपुर की सारी जगह इसमें शामिल हैं. ये आपका ड्राइवर और बाहर आपकी टैक्सी है. इतना सुनने के बाद तुरंत शीशा देखने का मन हुआ. कभी कभी स्मार्टनेस की वजह से मैं अमीर दिखने लगता हूँ. मौका मिलते ही तारीफ कर लेनी चाहिए.

मैंने मुस्कान छुपाते हुए पूछा और पैसे? 800 रु. मैं खुश था. क्यूंकि मैंने नेट पर देखा था ऑटो वाले 1000 रु तक ले लेते हैं. और मैं इतने रु तक देने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी था. फिर भी बनावटी गंभीरता दिखते हुए कहा अरे इतने ज्यादा, क्या आप नहीं चाहते कि मैं जबलपुर घूमूं.

मेरा एक दोस्त यहाँ का है, मैंने पता किया तो उसने तो बताया था कि 500 रु तक टैक्सी मिल जाती है.

नहीं सर वैसे तो ऐसा नहीं है पर चलो आप 600 दे देना. कहीं ज्यादा भाव ताव के चक्कर में टैक्सी वाला भाग ना जाये ये सोचते ही मैंने तुरंत हाँ कर दी. लो जी चलो घूमने.

जबलपुर नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ एक प्राचीन शहर है. इसे मध्यप्रदेश की संस्कारधानी भी कहा जाता है. थलसेना की छावनी के अलावा यहाँ भारतीय आयुध निर्माण के कारखाने तथा पश्चिम-मध्य रेलवे का मुख्यालय भी है.

ये शहर गौंड शासकों, मराठाओं तथा अंग्रेजों के अधीन रह चुका है. पुराने समय के शासकों द्वारा बनवाये गए कुछ महल एवं ताल तालाब इत्यादि अभी भी यहाँ बचे हुए हैं. नेट पर जबलपुर के बारे में जो जानकारी पढ़ने को मिली उनमें से एक पैरा यहाँ ज्यों का त्यों रख रहा हूँ – “जबलपुर का इतिहास उतना ही पुराना है जितना की काशी, पाटलिपुत्र, मगध आदि नगरों का है. पौराणिक आधार पर देखें तो भृगु ऋषि की तपोस्थली भेड़ाघाट और प्रकृतिवादी जाबालि ऋषि का नाम जबलपुर से जुड़ा है. जबलपुर नगरी कभी गढ़ा गोंडवाना, तो कभी त्रिपुरी के नाम से विख्यात रही. यहाँ कई राजा हुए जिन्होंने हिमालय से लेकर सागर के तट तक समस्त राज सत्ताओं को त्रिपुरी के अधीन कर दिया था.”

टैक्सी वाले का नाम अनिल था. अनिल जी वैसे तो काफी बातूनी थे पर जब उनसे शहर के बारे में कुछ जानने की कोशिश की तो उनको ज्यादा जानकारी नहीं थी. खास कर ऐतिहासिक विषयों की. वैसे मुझे लगता है कि पर्यटन स्थलों पर टैक्सी, ऑटो, बस परिचालकों आदि को अपने शहर के सभी स्थलों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां तो होनी ही चाहिए. पर्यटक को काफी मदद हो जाती है ऐसे में.

खोजी पत्रकार तो कहीं न कहीं से जानकारी निकाल लेते हैं पर मेरे जैसे आम पर्यटक के लिए काफी सारे विषय जानकारी के अभाव में अछूते रह जाते हैं. और जरुरी नहीं कि नेट पर उपलब्ध जानकारी हमेशा शत प्रतिशत सही ही हो.

थोड़ी देर चलने के बाद एक शांत सी जगह पर गाड़ी रुकी तो अनिल जी ने बताया कि ‘Balancing Rock’ आ गयी है. गाड़ी यहीं पार्क करनी पड़ेगी. आप घूम कर आ जाओ, मैं यहीं इंतजार करता हूँ.

गाड़ी से उतर कर थोड़ा आगे चला तो क्या देखता हूँ एक बड़ी सी चट्टान एकदम लुढ़कने वाले अंदाज में एक दूसरी बड़ी चट्टान पर बिल्कुल सुई की नोक जितनी जगह पर टिकी हुई है. ये नजारा वाकई विस्मित कर देने वाला था. यदि आपके पास इंटरनेट की उपलब्धता है तो ‘Balancing Rock’ की गूगल इमेज तुरंत देख डालिये.

इस शहर में आगे कुछ देखने को मिले ना मिले पर सिर्फ इस एक चट्टान ने मेरे पैसे वसूल कर दिए. मदन महल की पहाड़ियों पर स्थित ये चट्टान देशी विदेशियों के आकर्षण का खास केंद्र है.

कहते हैं कोई पंद्रह बीस साल पहले आये 6.9 की तीव्रता वाले भूकंप का भी इस चट्टान पर कोई प्रभाव नहीं हुआ था. यहाँ आगे ही मां शारदा देवी का प्राचीन मंदिर है और यहाँ के लोग मानते हैं कि माता की कृपा से ही ये चमत्कार संभव हो सका है. हम भारतीय हमारे साथ थोड़ा भी अच्छा होते ही उसको चमत्कार का नाम देकर तुरंत भगवान के साथ जोड़ देते हैं.

चलो वैसे भी हमें शुक्रगुजार तो होना ही चाहिए चाहे किसी बहाने से ही सही. ये चट्टान कब से अपने इस रूप में इसकी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी. कुछ देर वहाँ रुका. फोटो खींचे और फिर आगे माता शारदा के मंदिर की तरफ चल दिया.

माँ शारदा देवी का मंदिर वहाँ से कुछ ही कदम की दूरी पर है. मंदिर जाते हुए ही दाहिने हाथ की तरफ से सीढियाँ ऊपर की तरफ जा रही हैं. सीढ़ियों के पास एक बोर्ड लगा हुआ है जिसमें लिखा है रानी दुर्गावती का किला. पर मैं पहले मंदिर हो आता हूँ.

मंदिर मेरे लिए कभी घूमने के स्थान ना होकर सिर्फ आस्था के केंद्र होते हैं. इसलिए मैं सोचता हूँ कि ट्रेवल एजेंट अपने ट्रेवल लिस्ट में मंदिरों के नाम ना शामिल करें तो ज्यादा अच्छा होगा. जिस पर्यटक को मंदिर जाना है वो पहले ही अपना प्लान कर के आएगा और खुद ही बोल देगा कि मुझे फलां फलां मंदिर जाना है.

मंदिर से आने के बाद सीढियाँ चढ़ते हुए रानी दुर्गावती के किले की तरफ गया. इस किले को कुछ जगहों पर मदन महल के नाम से भी लिखा गया है. राजा मदन सिंह द्वारा बनवाया गया यह किला मुख्य शहर से करीब दो किमी दूर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है.

यह किला राजा की मां रानी दुर्गावती से जुड़ा हुआ है, जो कि एक बहादुर गोंड रानी के रूप में जानी जाती है. किले का थोड़ा बहुत रख रखाव किया गया है हालाँकि अधिकतर हिस्सा फिलहाल खंडहर में तब्दील हो चुका है.

यह किला रानी दुर्गावती और उनकी पूरी तरह से सुसज्जित प्रशासन व सेना के बारे में काफी कुछ बयान करता है. शाही परिवार का मुख्य कक्ष, युद्ध कक्ष, छोटा सा जलाशय और अस्तबल को देखकर आप इसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सकेंगे. इस किले से प्रचीन काल के लोगों के रहन-सहन का भी पता चलता है. साथ ही इससे उस समय के रॉयल्टी का भी अंदाजा हो जाता है.

जबलपुर जाने पर इस जगह को अवश्य घूमना चाहिए. यह किला उन शासकों के अस्तित्व का साक्षी है, जिन्होंने यहां 11वीं शताब्दी में काफी समय के लिए शासन किया था.

जब मैं यहाँ पहुंचा तो सिर्फ एक परिवार यहाँ पर्यटक के रूप में मौजूद था. उनके अलावा यहाँ कुछ स्थानीय लड़के लड़कियाँ स्कूल की यूनिफार्म और बैग समेत घूम रहे थे. शायद स्कूल बंक कर के आये हों. बच्चे खण्डरों में पढ़ने के लिए तो आये नहीं होंगे, फिर क्या करने आये होंगे. इस से पहले कि जबलपुर का ये ऐतिहासिक पर्यटक स्थल दिल्ली के कुछ पर्यटक स्थलों की तरह सिर्फ खास किस्म के कार्यों के लिए बदनाम हो प्रशासन को यहाँ ध्यान देना चाहिए.

कहने के लिए तो एक चौकीदार भी था वहाँ पर वो अपने सरकारी कर्मचारी होने का धर्म बिना अपवाद के निभा रहा था. ड्यूटी समय पर कुर्सी पर बैठ कर सोने का धर्म. यदि कोई सरकारी कर्मचारी मेरे इस लिखे हुए को पढ़ रहा है तो कृपया बुरा ना मानें ये मेरी आपसे ईर्ष्या है जो मुझसे ये सब जबरदस्ती लिखवा रही है. वरना तो आप कितने कर्म प्रधान होते हैं ये मुझसे बेहतर कोई नहीं जान सकता. मौका मिलने पर तारीफ कर भी देनी चाहिए.

किला घूमने के बाद मैं वापिस टैक्सी में आ गया जहाँ अनिल भाई इंतज़ार कर रहे थे. मुझे यहाँ 2 घंटे का समय लगा. अनिल जी कहने लगे की अकेला बंदा अमूमन यहाँ इतनी देर तक नहीं घूमता और जल्दी ही बोर होकर नीचे आ जाता है, जिससे हम लोगों का समय बच जाता है. पर लगता है आप घूमने के कुछ ज्यादा ही शौकीन हैं. मैंने इसे तारीफ के तौर पर लिया और अनिल जी को धन्यवाद कहा. अब अगर देखा जाये तो 6 में 3 जगह मैं देख चुका हूँ और 3 बाकी है.

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