आओ करें जबलपुर की सैर – 2

अब हम भेड़ाघाट की तरफ बढ़ रहे थे. भेड़ाघाट जबलपुर से करीब 20 किमी की दूरी पर है. यहाँ तक पहुंचने के लिए कोई खास मशक्क्त नहीं करनी पड़ी और जल्दी ही अनिल जी ने अपनी गाड़ी पार्किंग में जा लगायी.

हम नदी एवं मार्बल रॉक्स यानी संगमरमर की चट्टानें देखने पहुंचे थे. उन्होंने रास्ता बताया और मैं उधर को चल दिया. नर्मदा की खूबसूरती के बारे में आज यानी 26 नवंबर 2017 के वेब दुनिया नामक हिंदी पेज पर छपा है ‘लगातार जोर मारती लहरों से चट्टानों का सीना चीरकर हजारों वर्ष के कठोर संघर्ष के बाद नर्मदा ने यह सौंदर्य पाया है जिसे निहारने देश ही नहीं, विदेशी पर्यावरण प्रेमी भी खिंचे चले आते हैं.

संगमरमरी चट्टानों के बीच बिखरा नर्मदा का अनूठा सौंदर्य देखते न तो मन अघाता है और न आँखें ही थकती हैं. भेड़ाघाट, तिलवाराघाट के आस-पास के क्षेत्र का इतिहास 150 से 180 करोड़ वर्ष पहले प्रारंभ होता है.

कुछ वैज्ञानिक इसे 180 से 250 करोड़ वर्ष पुरानी भी मानते हैं. ‘ मार्बल रॉक्स नर्मदा नहीं के दोनों तरफ की किनारों पर स्थित है और आश्चर्यजनक रूप से ये 100 फीट से भी ऊँचीं है. नर्मदा की ये संगमरमरी चट्टानें सौंदर्य से परिपूर्ण हैं. यह एक अत्यंत रमणीय पर्यटन स्थल है.

चाँद की रोशनी में भेड़ाघाट की मार्बल चट्टानों की सैर का एक अलग ही तरह का अनुभव रहता है. चूँकि बारिश का मौसम था तो माँ नर्मदा अपने पूरे वेग पर थी पानी का स्तर बहुत ज्यादा था. मैं वहीँ संगमरमर की चट्टानों पर बैठ कर नदी को निहारने लगा. ‘बहता पानी और डूबता सूरज अक्सर मुझे कुछ लिखने को प्रेरित करते हैं.

‘ये लाइन मेरे दिमाग में आयी और तुरंत मैंने वहीं बैठे बैठे इसको मोबाइल में लिख कर सेव कर लिया. बीच में कुछ देर के लिए हल्की बूंदें गिरीं तो मैंने छाता तान लिया था. अभी कुछ दिन पहले ही यहाँ ऋतिक रोशन की मोहनजोदारो फिल्म की शूटिंग हुई है. बेशक ये जगह है ही फिल्माने लायक. अति सुन्दर.

भेड़ाघाट के पास ही नर्मदा का पानी काफी ऊंचाई से झरने के रूप में गिरता है. इसी झरने को धुआँधार फॉल कहते हैं. जबलपुर के पर्यटन स्थलों की सूची में एक नाम इसका भी है. जब पानी एक धारा के रूप में ऊपर से नीचे नदी में गिरता है तो दूर से देखने पर नदी में से धुआं सा उठता दिखाई देता है और धार मतलब पानी की धारा. इसीलिए इसको धुआँधार फॉल का नाम दे दिया गया है.

मेरे भम्रण के दौरान बारिश अपने चरम पर थी तो नर्मदा में खूब पानी था. इस वजह से मैं फॉल नहीं देख सका क्योंकि नदी का जलस्तर इतना बढ़ा हुआ था कि इसने झरने को पूरी तरह ख़त्म कर दिया था. अन्यथा ये भी एक आकर्षक दर्शनीय स्थल होता.

करीब 2 घंटे बिताने के बाद अगला पड़ाव चौंसठ योगिनी मंदिर होगा. भेड़ाघाट के पास ही यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है. यहाँ तक जाने के लिए 150 से अधिक सीढियाँ चढ़ कर जाना पड़ता है. यह बहुत ही भव्य मंदिर है. यहाँ 64 योगिनी अर्थात् देवियों की प्रतिमा है.

दसवीं शताब्दी में स्थापित हुए दुर्गा के इस मंदिर से नर्मदा दिखाई देती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार यह प्राचीन मंदिर एक भूमिगत रास्ते के द्वारा रानी दुर्गावती के किले से जुड़ा हुआ है. इस मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में कलचूरी साम्राज्य के दौरान हुआ.

बाद में अपनी प्रवृति के अनुरूप ही मुगल आक्रमणकारियों ने मंदिर को काफी नुकसान पहुँचाया और मूर्तियों को तोड़ दिया गया. विखंडित मूर्तियां मुगल मानसिकता के प्रमाण के रूप में ज्यों की त्यों अभी भी विराजमान हैं. यकीनन ये जगह जबलपुर घूमने आने के दौरान जरूर देखने वाली जगह में शामिल है. अगर इसको आप मंदिर की श्रेणी में डालना चाहते हैं तो मैं अपनी पहले वाली लाइन वापिस लेता हूँ जिसमे लिखा था कि मंदिर पर्यटक स्थलों की सूची से बाहर होने चाहिए.

मन में खुशी और उदासी वाले मिश्रित भाव लिए मैं बाहर लगी बेंच पर आकर बैठ गया और नर्मदा की तरफ देखने लगा. इस जगह को कैसे लिख कर परिभाषित किया जाये ये ही विचार कर रहा था कि एक परिवार वहाँ टहलते हुए आ गया.

ग्रुप का सज्जन बेंच पर आकर बैठा तो जैसे पूरे दिन से चुप पड़ी मेरी बातूनी जुबान को बोलने का मौका मिल गया. मैं उस बन्दे से ऐसे बातें करने लगा जैसे मेरे घनिष्ट मित्र हो. बन्दे ने भी पूरे उत्साह से बात की.

परिवार रोहतक से आया था और मैं रेवाड़ी से. दो हरियाणवी सुदूर प्रदेश में जब मिल बैठे तो बातों का लंबा सिलसिला चल निकला. उन्होंने बताया कि वो हर साल कम से कम चार या पांच जगहों पर घूमने जाते हैं और ये उनका जूनून है.

वाह, आपसे मिल कर मजा आया. फिर तो हमने दुनिया भर की जगहों के बारे में अपने अनुभव साझा किये. हम दोनों ही लगभग समान जगहों पर घूमे हुए थे. चर्चा रोचक हो चली तो उनकी श्रीमती ने भी चर्चा में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.

मुझे ये जान कर बड़ा ही सुखद आश्चर्य हुआ कि उनके दोनों बच्चे भी घुमक्कड़ी की बातों में रुचि दिखा रहे थे और छुपा दिए गए इतिहास से कुछ हद तक वाकिफ थे. मैंने इस तरफ इशारा किया तो विकाश जी ने कहा की ‘रोहित भाई मैं तो बोलता हूँ अपने बच्चों को यहाँ ऐसी जगहों पर अवश्य लाना चाहिए. देखने दो उनको की इतिहास में क्या घटित हुआ और उसको हमसे कैसे छुपाया गया. बेशक इस मंदिर में आने के बाद इतिहास को प्रत्यक्ष रूप से महसूस किया जा सकता है.’

अब मेरी हैरान होने की बारे थी. विकाश जी कैसे बिना किसी लाग लपेट के अपनी बातें बड़ी आसानी से कह रहे थे जबकि हम में से कई इस तरह की चर्चा से अक्सर बचते रहते हैं. विकाश जी के साथ घंटे भर बतियाने के बाद मैं वापिस आ गया जहाँ अनिल भाई मेरी राह देख रहे थे. शाम होने लगी थी.

पता नहीं देखने के लिए कोई और जगह बची थी या नहीं पर मेरा मन अब और कहीं जाने का नहीं था. अनिल भाई को कहा चलो अब वापिस चलते हैं. और कहीं नहीं जाना. जवाब मिला ‘ठीक है चलो. रास्ते में एक शिव मूर्ति मंदिर है जिसको आपको देखना चाहिए. वहाँ कुछ देर के लिए रुकते हुए चलेंगे.’

यार शिव मूर्ति तो दिल्ली में भी है, मुझे नहीं जाना चलो बस.’ इस से पहले कि मैं कुछ भूल जाऊँ, वापिस होटल पहुँच कर अपना आज का अनुभव लिखना चाहता था.

मना करने के बाद भी अनिल जी ने जबलपुर के विजयनगर पहुंचने के बाद गाड़ी पप्रसिद्ध शिव मूर्ति मंदिर की तरफ घुमा दी. होटल मालिक के बाद ये दूसरा बंदा था जो अपने शहर के मेहमान की इतनी देख रेख कर रहा था.

‘भैया, आप जाओ प्रभु के दर्शन कर आओ मैं यहीं मिलूंगा.’ ठीक है जल्दी ही आता हूँ. अंदर प्रवेश किया तो भगवान शिव की आसन्न मुद्रा में बैठे हुए की एक मूर्ति बनी हुई थी. मूर्ति ज्यादा पुरानी नहीं है और साल 2006 में ही इसे आम जनता के लिए खोला गया है.

मूर्ति की ऊंचाई 76 फीट है. अगर आप इसे मंदिर की श्रेणी में रखना चाहते हैं तो मैं फिर से अपने सबसे पहले वाले विचार के समर्थन में आना चाहूंगा. ‘मंदिरों को पर्यटन स्थलों की सूची से बाहर ही रखना चाहिए.’

शिवजी को प्रणाम किया और अपने विचार के लिए माफी मांगी. वापिस आने पर अनिल जी को घूर कर देखा और कहा ‘बहुत अच्छी जगह थी भाई. अच्छा किया जो इधर ले आये. पर अब और कहीं नहीं ले जाना बस.’ अनिल जी इतना खुश हुए जैसे कोई मुराद पूरी हो गयी हो, उनको लगा मैं वाकई बहुत खुश हूँ. चलो अच्छा है.

अगले दिन देर तक सोया. कोई प्लान नहीं था. पास में ही एक शॉपिंग मॉल था. तब पता नहीं था लिखूंगा इसलिए नाम याद नहीं रखा. टहलते टहलते वहाँ चला गया. वहाँ से जबलपुर के ऊपर लिखी हुई एक किताब खरीदी. जो बाद में ये लेख को लिखने में काफी सहायक सिद्ध हुई.

थिएटर में ऋतिक की मोहनजोदारो लगी हुई थी. ट्रेन रात को है तब तक क्या करूंगा सोच कर मैंने मूवी की टिकट ले ली. सबसे पहला सीन वहीँ का आया जहाँ मैं कल गया था भेड़ाघाट. अच्छा लगा देख कर.

बाहर निकला तो जोरदार बारिश हो रही थी. रेनकोट पहना और छाता भी तान लिया. होटल से बैग उठाया और सीधे स्टेशन जा पहुँचा. शाम को ट्रेन समय से चली. संयोग ही था कि वापसी में भी वही खिड़की वाली सीट, बारिश की बूंदें और गाना. याद रखने वाले अनुभव के साथ अलविदा जबलपुर.

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