पर्वत नदियों के पिता हैं, सागर साजन है

स्त्रियों सी नदियाँ कहीं रुकती नहीं,
सदा बहती रहती हैं
सभ्यताओं का लालन पालन करती हैं
प्यास बुझातीं, ग्राम-नगर बसाती जातीं
मानवता पर इठलातीं, जीवों की माँ हो जाती हैं

ये नदियां हैं……….

पुरुषों से पर्वत सदा अचल, अटल, अविचल रहते हैं
मानव का पथ रोकते से प्रतीत होते
धरती की छाती पर बोझ से लगते
पर नदियों के जन्मदाता यही तो हैं

स्त्री सी नदियों के बिना जीवन नहीं और
पुरुषों से पर्वतों के बिना नदियां नहीं

पथ में स्थिर हों तो मृत्यु को प्राप्त हों
सागर-लक्ष्य को प्राप्त हों तो पूर्ण हो जाती हैं
मिठास छोड़ कर नमक हो जाती हैं
क्योंकि जानती हैं वे सागर से ही हैं
सागर बादल देते हैं, बादल वर्षा लाते हैं
वर्षा ही तो नदियों को यौवन देती हैं

पर्वत नदियों के पिता हैं, सागर साजन है
इन दोनों के बिना नदियाँ नहीं होतीं
वैसे ही जैसे पुरुषों के बिना स्त्रियां नहीं होतीं
और स्त्रियों के बिना जीवन नहीं होता!

– ज्योति अवस्थी

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