आयुर्वेद आशीर्वाद : शक्तिवर्धक कीड़ा जड़ी

आज हम आपको आयुर्वेद में प्रयुक्त होने वाली एक ओर ऐसी दवा के बारे में बताने जा रहे है जो कि आयुर्वेद चिकित्सा में प्रयुक्त होता है..जिसका नाम है कीड़ा जड़ी.

इसका ये नाम इसलिए रखा गया है क्योंकि ये आधा कीड़ा होता है और आधा जड़ होता है इसलिए इसे कीड़ा जड़ी के नाम से भी जानते है. जैसा कि दिए गए चित्र में भी दिखाया गया है इस औषधि को. इसे औषधि के श्रेणी में रखा गया है. अब जाने विस्तार से –

सामान्य तौर पर समझें तो ये एक तरह का जंगली मशरूम है जो एक ख़ास कीड़े की इल्लियों यानी कैटरपिलर्स को मारकर उस पर पनपता है. इस जड़ी का वैज्ञानिक नाम है कॉर्डिसेप्स साइनेसिस और जिस कीड़े के कैटरपिलर्स पर ये उगता है उसका नाम है हैपिलस फैब्रिकस.

स्थानीय लोग इसे कीड़ा-जड़ी कहते हैं क्योंकि ये आधा कीड़ा है और आधा जड़ी है और चीन-तिब्बत में इसे यार्सागुम्बा कहा जाता है. ‘यार्सागुम्बा’ जिसका उपयोग भारत में तो नहीं होता लेकिन चीन में इसका इस्तेमाल प्राकृतिक स्टीरॉयड की तरह किया जाता है.

सर्वप्रथम इसका उल्लेख तिब्बती साहित्य में मिलता है. इस उल्लेख के अनुसार यहाँ के चरावाहों ने देखा कि यहाँ के जंगलों में चरने वाले उनके पशु एक विशेष प्रकार की घास जो कीड़े के समान दिखाई देती है, को खाकर हष्ट-पुष्ट एवं बलवान हो जाते हैं.

धीरे-धीरे यह घास एक चमत्कारी औषधि के रूप में अनेक बीमारियों के इलाज के लिए प्रयोग होने लगी. तिब्बती भाषा में इसको ‘यार्सागुम्बा’ कहा जाता है. जिसका अर्थ होता है ग्रीष्म ऋतु मे घास और शीत ऋतु ऋतु में जन्तु. अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार यर्सी गम्बा हिमालयी क्षेत्र की विशेष प्रकार एवं यहाँ पाये जाने वाले एक कीड़े के जीवन चक्र के अद्भुत संयोग का परिणाम है.

शक्ति बढ़ाने में इसकी करामाती क्षमता के कारण चीन में ये जड़ी खिलाड़ियों ख़ासकर एथलीटों को दी जाती है. ये जड़ी 3500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाई जाती है जहां ट्रीलाइन ख़त्म हो जाती है यानी जहां के बाद पेड़ उगने बंद हो जाते हैं.

मई से जुलाई में जब बर्फ पिघलती है तो इसके पनपने का चक्र शुरू जाता है. रासायनिक दृष्टि से इस औषधि में एस्पार्टिक एसिड, ग्लूटेमिक एसिड, ग्लाईसीन जैसे महत्वपूर्ण एमीनो एसिड तथा कैल्सियम, मैग्नीशियम, सोडियम जैसे अनेक प्रकार के तत्व, अनेक प्रकार के विटामिन तथा मनुष्य शरीर के लिए अन्य उपयोगी तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं.

इसको एकत्रित करने के लिए अप्रैल से लेकर जुलाई तक का समय उपयुक्त होता है. अगस्त के महीने से धीरे-धीरे प्राकृतिक रुप से इसका क्षय होने लगता है और शरद ऋतु के आने तक यह पूर्णतया: विलुप्त हो जाती है.

वनस्पतिशास्त्री डॉक्टर एएन शुक्ला कहते हैं, “इस फंगस में प्रोटीन, पेपटाइड्स, अमीनो एसिड, विटामिन बी-1, बी-2 और बी-12 जैसे पोषक तत्व बहुतायत में पाए जाते हैं. ये तत्काल रूप में ताक़त देते हैं और खिलाड़ियों का जो डोपिंग टेस्ट किया जाता है उसमें ये पकड़ा नहीं जाता.”

कीड़ा-जड़ी से अब यौन उत्तेजना बढ़ाने वाले टॉनिक भी तैयार किए जा रहे हैं जिनकी भारी मांग है. जड़ी-बूटी की श्रेणी में आने वाला यार्सागुम्बा शारीरिक शक्ति के साथ-साथ यौन शक्ति को भी बढ़ाता है. यह एक प्रकार का कीड़ा है, जो हिमालय की ऊंचाइयों में पाया जाता है. इसका उपयोग करना भारत में प्रतिबंधित है, किन्तु जहाँ यह मिलता है वहां इसकी कीमत 60 लाख रूपये प्रति किलोग्राम है.

यार्सागुम्बा एक प्रकार का मृत कीड़ा है जो शारीरिक बीमारियों को दूर करने के साथ सांस और गुर्दे की बीमारी में भी उपयोगी है. इसी के साथ यह बुढ़ापे को भी बढ़ने से रोकता है तथा शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है.

यह सेक्स पावर को बढ़ाने के लिए भी बहुत उपयोगी है, हिमालयी वियाग्रा यार्सागुम्बा दवा का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता, जबकि अंग्रेजी वियाग्रा से हृदय कमजोर होता है. यह भारत में दुर्लभ प्रजाति है. सिर्फ तिब्बत और हिमालय के कुछ क्षेत्र को छोड़कर और कहीं नहीं मिलती है.  यार्सागुम्बा नेपाल के भी कुछ इलाको में पायी जाती है.

यह कीड़ा भूरे रंग का होता है जिसकी लम्बाई लगभग 2 इंच होती है. यह कीड़ा यहां उगने वाले कुछ खास किस्म के पौधों पर ही पैदा होते हैं. इस कीड़े का जीवन काल लगभग छह महीने का होता है. सर्दियों में इन पौधों से निकलने वाले रस के साथ ही यह पैदा होते हैं. मई-जून में यह कीड़े अपना जीवन चक्र पूरा कर लेते हैं और मर जाते हैं. मरने के बाद यह कीड़े पहाड़ियों में घास और पौधों के बीच बिखर जाते है.

यार्सागुम्बा भारत में प्रतिबंधित है. नेपाल में भी इस पर प्रतिबन्ध लगाया गया था, किन्तु 2001 के बाद वहा की सरकार ने इस पर से प्रतिबन्ध हटा लिया था. इसकी कीमत 60 लाख रूपये प्रति किलोग्राम बताई जा रही है.

तो दोस्तो कैसी लगी आपको जानकरी, अगर जानकरी पंसद आयी तो इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करे ताकि विलुप्त हो रही आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को दोबारा से उभारा जा सके..

– आयुर्वेद डॉ अमर वर्मा

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