Happy Women’s Day बोलने से पहले एक बार इसे अवश्य पढ़ें

हम उस देश के वासी हैं जिस देश के लोगों को अपने अस्तित्व के विषय में ही नहीं पता… अंग्रेजों ने एक प्रोग्रामिंग हमारे मन-मष्तिष्क में फीड कर दी थी.

इस प्रोग्रामिंग में बताया गया था कि हम लोग अशिक्षित, असभ्य, अज्ञानी थे… गरीब, भुखमरी और बीमारी से जूझते हुए थे… बड़े दीन-हीन लाचार थे.

अंग्रेज आए तब उन्होंने हमको शिक्षा व्यवस्था दी, ज्ञान-विज्ञान दिया… नई-नई तकनीकें दीं, जिससे हमारा विकास हुआ.

हमें सामाजिक कुरीतियों से मुक्ति भी अंग्रेजों ने ही दिलाई… उदाहरण के लिए सती-प्रथा का नाम सबके मस्तिष्क में आ जाता है.

चूंकि प्रोग्रामिंग ऐसी की हुई है कि हमारी सोचने-समझने की शक्ति समाप्तप्रायः ही है… इसलिए कभी विचार ही नहीं किया कि इस असभ्य, अशिक्षित, अज्ञानी देश को सोने का चिड़िया क्यों कहा जाता था…

गरीब-भूखे देश में दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक विदेशी आक्रमणकारी बार-बार क्यों आते रहे… गरीबों के पास सोने की मुर्गी तो थी नहीं जिसके अंडे से इतना सोना हो जाता था… जिसको लूटते जाते थे पर खत्म ही नहीं होता था.

इन बातों पर तो विचार किया ही नहीं, उल्टे हमने मान लिया कि वो जो कह रहे हैं वही सत्य है.

परिणामस्वरूप उल्टी गँगा बहने लगी… पूरब से प्रकाश लेने की जगह पश्चिम से प्रकाश लेने लगे… पश्चिमी देशों में जो भी होता है वही हमारा आदर्श बनता चला गया.

उनका आहार-विहार, ज्ञान-विज्ञान, पारिवारिक-सामाजिक व्यवस्था तक को हमने बड़े सम्मान के साथ आत्मसात कर लिया.

उनके सारे त्योहार हमारे और हमारे त्योहार पर्यावरण के शत्रु घोषित होने लगे… बिना ये सोचे समझे कि हमारी और उनकी भौगोलिक परिस्थिति भिन्न है…

उनके यहाँ जब दिन होता है तब हमारे यहाँ रात होती है… उनके यहाँ वर्ष के आठ महीने ठंड पड़ती है पर हमारे यहाँ ऐसा नहीं है.

उनके यहाँ बच्चे सरकार के होते है परिवार से ज्यादा… इसलिए माता-पिता के डाँटने या मारने की शिकायत पुलिस से करने पर कार्रवाई होती है.

हमारे यहाँ बच्चों पर पूरा-पूरा अधिकार माता-पिता का होता है… प्रतिदिन दो-चार थप्पड़ बच्चों को लगाना सामान्य दिनचर्या है जिसकी शिकायत करने की कोई परम्परा भी नहीं है.

जहाँ माता-पिता का कोई महत्व ही नहीं है वहाँ मदर डे, फादर डे मनाना तो समझ में आता है पर जहाँ दिन-रात का साथ है, जन्म से मृत्यु तक पूर्ण अधिकार के साथ वहाँ वर्ष में एक दिन उनको महत्व देना उनका अपमान करना नहीं है क्या?

जिस समाज में सन्तान को माता के नाम से भी पहचान मिलती थी उदाहरण स्वरूप देवकीनंदन, कौन्तेय आदि.

जहाँ विदुषी स्त्रियाँ रहती थीं उदाहरण स्वरूप विद्योत्तमा और मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती, जिन्होंने आदि शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया था.

जहाँ जीजाबाई और झाँसी की रानी थीं… जहाँ भाषा को मातृभाषा कहा जाता है… जहाँ स्त्रियों को देवी कहने की परम्परा थी.

जहाँ “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” की सूक्ति कही जाती थी…

वहाँ वर्ष में सिर्फ एक दिन स्त्रियों को समर्पित कर देना उनका अपमान नहीं है क्या?

पश्चिमी देशों के दार्शनिकों का मत था कि स्त्री एक निर्जीव वस्तु के समान भोग की वस्तु है इसलिए इसमें आत्मा नहीं होती है… उनका स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं है पुरुष के साथ ही उनका अस्तित्व है

इसलिए वहाँ स्त्रियों को किसी भी प्रकार का कोई अधिकार नहीं था… यहाँ तक कि सन्तान को अपनाने का भी अधिकार पिता का था.

वोट देना तो बहुत दूर की बात थी… गवाही भी मान्य नहीं थी… बहुत बाद में तीन स्त्रियों की गवाही एक पुरुष के बराबर मानी जाने लगी.

विधवा या परित्यक्ता स्त्री को ढूँढ कर मार दिया जाता था… स्त्री को पुरुष से कम समझने की मानसिकता आज भी वहाँ है जिसका ताजा उदाहरण है ट्रम्प जैसे व्यक्ति को राष्ट्रपति चुनना पसँद किया अमेरिकी समाज ने हिलेरी क्लिंटन की तुलना में.

ऐसे समाज के कुछ प्रगतिशील लोगों ने वर्ष का एक दिन स्त्रियों के नाम किया तो समझ में आता है कि एक दिन तो सम्मान दिया… पर हम क्यों सिर्फ एक दिन सम्मान दिखाने का प्रयास कर रहे हैं?

हैप्पी विमेन्स डे बोलने से पहले एक बार विचारियेगा जरूर… बाकी जो है सो तो हइये है.

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