उदयन : एक प्रयास

सुबह सुबह आँख खुली तो खिड़की के बाहर रात अब तक जाग रही थी. मेरा भी सोने का मन नहीं हुआ, लगा जैसे सोने में समय ज़ाया हो रहा है तो उठी और सीधे मेन गेट खोलकर बाहर को निकल गयी….

बाहर धान के खेत पर धुंधली सुबह कोहरे की चादर से मुंह निकालकर झांक रही थी. मन तो किया कि काश मोबाइल साथ ले आती तो सुबह को कैमरे में कैद कर लेती….

साथ में यह भी ख़याल आया कि अच्छा ही हुआ जो नहीं लाई… खूबसूरती को कैद करना उसके साथ अन्याय होता… उसके दृश्य को कैद कर भी लेती पर सुबह की खुशबू को कैसे कैमरे में कैद कर पाती…

तो मैंने गहरी सांस लेकर अपने अन्दर जितनी सुबह उड़ेल सकती थी, उड़ेल ली… थोड़ी बहुत जो बची रह गयी उसे मुट्ठी में छुपा लिया…..

तभी किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई लौट आइए अजित भाई (उदयन स्कूल के संस्थापक) बुला रहे हैं….. लौटकर उन तक पहुँची तो उन्होंने कहा चलिए उदयन स्कूल के बच्चों के आने में अभी बहुत समय है उससे पहले हम शिवपुरी (मुसहर टोला को अजित भाई द्वारा दिया गया नाम ) हो आते है, वहां के रहवासियों से मिल आते हैं.

हम लोग अजित भाई के घर से निकलकर पीछे पतली पगडंडियों पर चलने लगे.. अजित भाई ने हिदायत दी कि मैं बीच पगडंडी पर ही चलूँ, आसपास घास पर नहीं…

मैं उनकी बात का अर्थ समझ पाती उससे पहले ही खेत में से एक लड़की को कपड़े ठीक करते हुए दौड़ लगाते देखा… हमारी वजह से वो नित्यकर्म भी पूरा नहीं कर पाई थी…

जब हम शिवपुरी पहुंचे तो सबसे पहले दिखाई दिया टिमटिमाता तारा, जी हाँ अपनी तारा रानी, मैंने उसे छूकर देखा ताकि मेरी मुट्ठी में बंद सुबह की धूप उसके चेहरे पर कुछ मुस्कान बिखेर सके….

इतने में वहां एक प्यारी सी लड़की दौड़कर आई तो अजित भाई ने पूछा इसे पहचाना?

माँ हूँ ममता को न पहचानूंगी…. किस्मत भी न जाने क्यों कभी कभी गलत जगह पर अड़ जाती है… सूरत भी दी और सीरत भी लेकिन कहाँ जहां आईना नहीं…

जहां रानी हैण्ड पम्प के नीचे नहाती है और नग्न महावीर तसले में बैठा नज़र आता है, जहां दुधमुंहे बच्चे की माँ की छाती से दूध नहीं उतरता…. केवल माँ की देह को चूसता हुआ बच्चा भूख से बिलखता है….

एक चारपाई पर एक नवजात बच्चा रो रहा था… मैंने अपनी देह में उड़ेली सुबह को उसके माथे का सूर्य बना दिया… उसे छुआ तो वो खिलखिलाकर हंस पडा… बिलकुल उस लक्ष्मी की तरह जिसका ज़िक्र मैंने अजित भाई की एक पोस्ट में किया था-

लक्ष्मी इंदौर के एक अनाथ आश्रम में मिली थी मुझे. उसे गोद में उठाया तो वो ऐसे हंसी थी जैसे ऊपर आसमान से देवताओं ने फूल बरसाए हो…. उन दिनों भी मैंने यही लिखा था- किसी ने ईश्वर को हंसते सुना हो तो शायद वो ऐसे ही हंसता होगा…

छोटे छोटे घर लेकिन वैज्ञानिक तरीकों से बने हुए, अजित भाई ने Cob House का अर्थ और बनावट समझाई….

फेसबुक पर अजित भाई की उदयन रिपोर्ट में जितने लोगों को देखा था उन सबको सच में देखना बहुत अद्भुत अनुभव था…

गयी थी तो अपने साथ सुबह को बाँध कर ले गयी थी उन लोगो के लिए… वहां से लौट रही थी तो मन किया उनकी किस्मत का अँधेरा चुरा लूं… जीवन में पहली बार चोरी का ख़याल आया…..

मैं देख रही थी… एक एक करके आग के रंग में रंगे युनिफॉर्म पहने बच्चे अजित भाई के घर के बड़े से आँगन में इकट्ठा हो रहे थे…. जैसे जैसे बच्चो की संख्या बढ़ रही थी वैसे वैसे उस आग की तपिश भी बढ़ रही थी…

कच्ची मिट्टी से ये बच्चे जिनको सही आकार देकर इसी आग में तपाकर पक्का करना है ऐसे लग रहे थे जैसे सुबह की एक एक किरण इकट्ठा होकर अपना पूरा एक सूरज बना देने के लिए उतारू है.

उनको सिखाने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था, मैं तो खुद सीखने आई थी सारे अभावों के बावजूद कैसे खिलखिलाकर हंसा जा सकता है… दुनिया भर की सुविधाएं एक तरफ उनका पढ़ने का जज़्बा एक तरफ…

तो सबसे पहले उन लोगो की attendance ली ताकि सबके नाम जान सकूं. और उनको बताया कि जिसका भी नाम पुकारूं वो Yes madam कहेगा. वहां जितने भी बच्चे इकट्ठे हुए थे और जितनो के भी मैंने नाम लिए उस सबके नामों के साथ ममता ने खड़े होकर बताया कि ये वहां बैठा है, वो वहां बैठा है…

कुछ एक बच्चों ने Yes Madam बोला तो कुछ शरमाते हुए बस अपनी ही जगह पर सिकुड़ते रहे…. लेकिन ममता का आत्मविश्वास देखते ही बनता था… फिर चाहे उसके बैठने का तरीका हो, बोलने का या लिखने का…. सबसे जुदा, सबसे बेहतर….

मानव सभ्यता के विकास में पढ़ने लिखने का कितना महत्व है ये तो मैं नहीं जानती लेकिन अपनी भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति ने मानव को सभ्यता के उस मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां उसे साधारण और असाधारण व्यक्तित्व की दो अलग अलग श्रेणी में विभाजित कर दिया गया है.

और इन दो श्रेणियों के बीच के सेतु पर इंसान चलता है वो अवस्था कहलाती है अध्ययन की, प्रेक्टिस की, प्रयास की….

और इन दो श्रेणियों के इंसान को आप बचपन में ही पहचान सकते है. तो मैंने और उदयन की दो टीचर्स ने मिलकर बच्चो को दो श्रेणियों में विभाजित किया – एक वो थे जिन्हें अभी सिर्फ पेन पकड़ना आता है और दूसरी श्रेणी में वो बच्चे थे जो पेन पर सवार होकर नोटबुक पर सरपट भाग रहे थे. जिनमें ये होड़ लगी हुई थी जो उन्हें सिखाया जा रहा है वो जल्द से जल्द करके बता दें.

कुछ बच्चे उम्र में बहुत छोटे हैं जैसे हमारी तारा और उसी उम्र के कुछ और 2-3 बच्चे हैं, जिनका पढ़ना लिखना उतना आवश्यक नहीं है फिलहाल, जितना रोज़ की दिनचर्या में शामिल होना ताकि उनमें शुरू से अनुशासन आए.

उदयन की बाकी टीम के साथ मिलकर हम सुबह का नाश्ता, दिन का खाना और बच्चों को कपड़े बांटने में लगे रहे.

आज महिला दिवस पर ममता और तारा की याद आई, जिन्हें इस दिवस का पता भी न होगा, लोग इसको अलग से मनाने के पक्ष में भी नहीं है. लेकिन हम इस दिन के बहाने कम से कम उनकी उन्नति के बारे में विचार कर उन्हें आशीर्वाद तो दे ही देते हैं.

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