जोगी सोइ जानिए, जग ते रहे उदास, तत निरंजन पाइए, कहे मच्छन्दरनाथ

मेरे बचपन के दोस्त संजीव कुमार सिंह के पिता जी पिछले पाँच वर्षों से लकवा से पीड़ित हैं. उनके शरीर के बांये तरफ का हिस्सा काम नहीं करता है. इस कारण उनकी जिन्दगी बिस्तर तक ही सिमट कर रह गई है.

कोलकाता के बेलियाघाटा में उनका कोयले का डिपो था. उनका केस, उस समय के बंगाल के सबसे महँगे वकीलों में से एक, पूर्व सांसद अजीत पाँजा लड़ा करते थे. घर में बोरा में भरकर रुपया आता था. कभी ऐसा जीवन जिया हुआ इंसान जब बिस्तर पकड़ ले और अपने नित्य दैनिक कर्म के लिए भी दूसरे पर निर्भर हो जाए, तो उन पर फ्रस्टेशन हावी हो जाना स्वाभाविक है.

एक ही बात को बार-बार रिपिट करते हैं, दिन-रात सबको परेशान करते रहते हैं. आंटी हमेशा इनके देखभाल में लगी रहती है. मुझे संजीव से उम्मीद नहीं थी कि वो अपने पिता जी की सेवा ऐसी तत्परता से करेगा. उनकी सेवा में व्यवधान न उत्पन्न हो, इसलिए उसने पैंतीस साल के उम्र तक विवाह ही नहीं की और अभी आगे करना भी नहीं चाह रहा है.

अंकल अभी पिछले तीन महीने से दिल्ली में अपनी बेटी और दामाद के यहाँ इलाज के लिए आये हुए हैं. उनके दामाद जय शंकर शर्मा जी मेरे बहुत खास दोस्त हैं. वो भी दिल्ली विश्वविद्यालय में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. वो भी मन से श्वसुर जी के सेवा में लगे हुए हैं. पाँच दिन पहले उनकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई तो हमलोगों ने उन्हें रोहिणी के पास मैक्स हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया.

वो मुझे देखते ही बहुत खुश हो जाते हैं. इसलिए मैं भी समय निकाल कर उनसे मिलने चला जाता हूँ. कल जब उनसे मिलने गया तो वो कहने लगे कि राहुल तुम्हारे पापा मेरे संघतिया थे, वो मुझसे उम्र में छोटे थे, पहले मुझे मरना चाहिए था. अब मैं नहीं बचूँगा, मेरी तबीयत बिगड़ रही है. हमलोग उनको मोटिवेट करने लगें कि ऐसी नकारात्मक बातें ना सोचें.

उसी समय वो अचानक चिल्लाने लगें कि राहुल एक बार “दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी हो जाए”. लोगों को समझ ही नहीं आ रहा था कि ये क्या कहना चाह रहे हैं. मैं समझ गया पर वहाँ कोई भी ड्रामा क्रियेट नहीं करना चाह रहा था, इसलिए अनभिज्ञ बनकर चुप खड़ा था.

पर वो जब बड़े आर्त भाव से बोलने लगे, तो सब मुझसे कहने लगे कि ये जो कह रहे हैं प्लीज वो कर दीजिए. अंकल की स्मृति में था कि मैं तेरह साल पहले भजन गुनगुना लेता था, वही वो सुनना चाह रहे थे. मैं अब भजन नहीं गाता, भजन सुनता भी हूँ तो ध्यान के लिए. मुझे उनकी पसन्द के भजन का मात्र दो पंक्ति ही याद थी, इसलिए बिलकुल तमाशा बनने से बच रहा था.

पर उनकी जिद्द के आगे वही दो पंक्ति सुना दिया. वो भावुक हो गयें और बोले राहुल एक बार और सुना दो. इस बार जब मैं गा रहा था तो शर्मा जी ने रेकॉर्ड कर लिया, जिससे अंकल को बाद में सुनाया जा सके. मैंने गाना शुरू किया – “दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी, कैसे आऊँ रे कन्हाई तेरी गोकुल नगरी, बड़ी दूर नगरी”.

वो बिलकुल शांत हो गये. हमलोग जब उन्हें बिलकुल शांत देखें तो डर ही गए. उन्हें दो पंक्ति सुनकर ही नींद आ गई थी. मैं तो डर ही गया कि इन्हें कुछ हो गया तो मेरे सिर पर ही इल्जाम आ जायेगा कि इसके गाने से ही उनकी जान चली गई.

आज फिर जब मैं उनसे मिलने गया तो ऐसा नजारा देखा कि मेरा दिल ही बैठ गया. संजीव के बड़े भाई बबलू सिंह अंकल के कान के पास मोबाइल लगाकर मेरा गाना सुना रहे हैं. बबलू भाई साहब कहने लगे कि जब इनकी तबीयत खराब होती है तो दवा की जगह राहुल का गाना खोजने लगते हैं और उन्हें आराम भी मिल जाता है.

जैसे ही अंकल को पता चला मैं आ गया हूँ फिर रिक्वेस्ट करने लगे कि एकबार सुना दो. मैंने उन्हें यूट्यूब पर एक से एक भजन गायकों की आवाज में वो “दूर नगरी” वाला भजन पूरा सुनाया, पर उन्हें उनमें से किसी में आनन्द नहीं आया.

मेरे लिए ये विषय चिन्ताजनक थी. मैंने बबलू भाई साहब से कहा कि इन्हें यूट्यूब के किसी अच्छे सिंगर में इन्ट्रेस्ट डेवलप करवाइये. मरते समय मेरी  आवाज़ सुनकर मरे और इनकी आत्मा मेरे पास आकर कहने लगे कि राहुल एक बार “दूर नगरी” सुना दो, तब क्या होगा? मैं अकेले भी रहता हूँ और मुझे भूत-प्रेतों से डर भी लगता है. बबलू भाई साहब और शर्मा जी जोड़ से हँसने लगें, पर मेरे लिए ये हँसने का विषय नहीं है.

जो मुमुक्षु हैं और जिन्हें थोड़ा भी आध्यात्मिक राहों की खबर है, वो समझ सकते हैं कि ये कितनी खतरनाक बात है. हम केवल अपनी ही नहीं, दूसरों की भी तीव्र आकांक्षाओं के वशीभूत होकर भी धरती पर बार-बार पटके जाते हैं. आपका मन जहाँ अटक जाता है, प्रकृति आपको देर-सबेर उस वासना के पूरा होने का अवसर ज़रूर देती है, भले ही उसके लिए आपको जन्म पर जन्म लेना पड़े.

मेरे पिता जी का मेरे इसी परिवार में उनका ये तीसरा जन्म था. परिवार के प्रति अति भावनात्मक लगाव के कारण बार-बार उनकी आत्मा खींच कर यहीं चली आती है. यही कारण है कि मैं लोगों को अपने दिल के करीब आने से भरसक रोकने की कोशिश करता हूँ. मैंने अपने चारों ओर कठोर पहरे लगा रखें हैं कि कम से कम लोक-व्यवहार में मेरा गुजारा हो जाये. जितने अधिक संबंध, उतने ही अधिक फिसलन की संभावना. जरा सी सावधानी हटी कि आगे के कई जन्म बिगड़ जायेंगे.

इसीलिए जिसे नि:श्रेयस की उपलब्धि करनी हो, उसके लिए संसार से उदासीन रहना ही श्रेयस्कर है. यही कारण है कि मच्छन्दरनाथ जी कहते हैं – “जोगी सोइ जानिए, जग ते रहे उदास। तत निरंजन पाइए, कहे मच्छन्दरनाथ।।”

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