ज़िंदगी और कुछ भी नहीं…

मनोज कुमार की फिल्म शोर देख रहा हूँ जिसमे हिंदी सिनेमा के सबसे यशस्वी गीतों में से एक गीत इक प्यार का नगमा है दर्ज है. गाने से पहले फिल्म में एक खूबसूरत सीन है जिसमे पति मनोज कुमार, पत्नी नन्दा और बेटा दीपक समन्दर के बीच पर बैठे बात कर रहे है. बातचीत पढ़िए.

“मनोज कुमार- गीता, मैने फैक्ट्री मे ऑवरटाइम लगा लगाकर सौ रूपयें इसलिये दिये थे कि तुम अपने और दीपक के लिये दो तीन नये जोडे बना लो और एक तुम हो कि ये उटपटाग खरीद लाई.

नंदा- अच्छा और वो याद नही जब घर का खर्च काट काट कर सताईस रूपये तीस पैसे इसलिये दिये थे कि आप अपने लिये एक नई कमीज सिला सको और आप है कि आप मेरे लिये एक साडी खरीद कर ले आये.

मनोज कुमार- याद है. और वो दिन याद नही जब मैने कहा था, ये जो गजरे है ना , ये बहुत खुशबू वाले है, इन्हे खरीद लो ना और तुमने कहा ये तो फूल है. जूडे में लगते ही मुरझा जायेंगे. अगर आपकी जेब में ज्यादा ही पैसे है तो उन्हे जमा किजियें और अपनी साईकिल में नई ट्यूब डलवा लिजिये. स्टेशन से घर आते आते दो बार पंचर हो जाती है.

नंदा- और वो भूल गए जब मैने कहा था कि सिगरेट पीकर सेहत का सत्यानाश ही करना है तो कम से कम फिल्टर वाला सिगरेट पी लिया करो जो कम नुकसान करता है.

मनोज कुमार- अरे बाबा. फिल्टर वाला सिगरेट जरा महंगा है. बिना फिल्टर वाला सिगरेट पीने से जो पैसा बचता है उससे तुम्हारे लिये मिलन सुपारी आ जाती है.

नंदा- ये तो मै दस बार सुन चुकी हूं इसलिये मैने सुपारी खाना ही छोड दिया और आप है कि सिगरेट नही छोड सकते.

मनोज कुमार- अरे सिगरेट छोडने से कौन सी दौलत जमा होने वाली है.

नंदा- सिगरेट छोडने से जो पैसे बचेंगे उससे आधा पौना लीटर दूध ज्यादा आ सकता है.

मनोज कुमार-फिर

नंदा- दूध से मलाई, मलाई से मक्खन और मक्खन से घी

मनोज कुमार- और घी से

नंदा- सेहत

मनोज कुमार- और सेहत से

नंदा- लोहे का काम करने वाले इंसान को फौलाद बनकर रहना चाहिए.

मनोज कुमार- गीता, कभी कभी सोचता हूं कि इस दो वक्त की रोटी के चक्कर में गांव भी छोडा. मां बाप से दूर यहां शहर में डेरा भी डाला मगर ये गरीबी है कि पीछा ही नही छोडती.

मास्टर दीपक- ये गरीबी वरीबी छोड़ो और ये बताओ कि ये टोपी कैसी लग रही है.

मनोज कुमार- गीता, ये कपडे तो ठीक है पर ये टोपी लाने की क्या जरूरत थी.

नंदा- तुम्हे सरदर्द होता है इसलिये

मनोज कुमार- तो ये टोपी क्या एक्सप्रो का पेड है

नंदा- फैक्ट्री से थककर आते हो फिर स्टेशन से घर तक साईकिल चलाते हो. नंगे सिर धूप लगती है तो सरदर्द हो जाता है.

मनोज कुमार- अरे ये सरदर्द का ड्रामा तो इसलिये होता है ताकि तुम्हारे हाथ से सर की मालिश हो जाती है.

मास्टर दीपक- झूठ मत बोलो डैडी. मम्मी तो केवल पांव दबाती है. जूतो की पालिश और सर की मालिश तो मै ही करता हूं.”

इस एक बहुत साधारण पर भारतीय लोवर मीडिल क्लास के जीवन की बेसिक जरूरतों के संघर्ष और उसके बीच भी जिंदाबाद रहे प्रेम के दृश्य को देखते हुए सोच रहा हूं कि ये वर्ग, ये लोग क्या अपने रोजमर्रा के जीवन में लेनिन, मोदी, लूथर, गांधी, विराट-अनुष्का, दक्षिणपंथ, वामपंथ, बजट, चुनाव विश्लेषण, नेता, ब्यूरोक्रेसी के प्रायोजित प्रचार के बारे में सोचते भी है क्या जैसा कि मुख्य मीडिया और सोशल मीडिया भ्रम पैदा कर रहा है.

दिन भर में ऐसे कितने लोगों से मिलना होता है जो आज भी दैनिक जरूरतों को पूरा करने में खत्म होते जा रहे है और दूसरी और फेसबुक और व्हाट्स एप पर इन मुद्दों पर बहस होते देख रहा हूं. हर लिहाज से देश के आंकड़े अगर सकारात्मक और सही ट्रैक पर है तो आज भी जीवन की छोटी छोटी जरूरतों को लेकर आम आदमी परेशान क्यों है?

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