अब मौन के घर में रहती हूँ

ma jivan shaifaly poem

मैं कभी शब्दों के घर में रहा करती थी
और मौन की परिभाषा कहा करती थी
अब मौन के घर में रहती हूँ
और शब्दों के शोर को सहती हूँ

तब बहुत कुछ कहा जाता था
फिर भी सबकुछ अनकहा रह जाता था
अब कोई कुछ पूछता भी है
तो मुस्कुरा देती हूँ
मौन के घर में जो रहती हूँ

तब मैं अक्सर
सत्य कहा करती थी
और असत्य से बचकर रहती थी
अब मैं असत्य भी कह देती हूँ
तभी तो सम्पूर्ण रहती हूँ
दोनों का स्वीकार ही समर्पण जाना है
मौन के घर में जो रहती हूँ

तब अनुभव का अभाव था
अब अ-भाव का अनुभव है
तब शब्दों का सागर था
अब खाली सी गागर है
तब हर लहर एक शोर था
अब नीरवता हर ओर है

मैं अब भी वही कहती हूँ
मौन के घर में रहती हूँ
कहती नहीं बस हूँ … मौन…

– माँ जीवन शैफाली

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