किसान, मज़दूर, साथी और राक्षस लेनिन

नेताजी शहर में क्रांति करके तख्तापलट कर चुके थे, जहां शहर का मजदूर राजा बन गया था.

वहीं गांव में किसानों को जमींदार लूट रहे थे, तो नेताजी ने ज़मींदारों से ज़मीन लूटकर किसानों में बांट दी.

इतिहास के काले कारनामों की सज़ा के तहत सारे जमींदारों को परिवार सहित मृत्युदंड भी दे दिया.

अब नेताजी तो शहरों में रहते थे, क्रांति का मसाला तो वहीं पीसा जा रहा था, अब केवल मसाले से तो पकवान बनने से रहे…

शहरों को बराबर खाने की सप्लाई नहीं मिल रही थी, क्रांतिकारियों का पेट भी अनाज मांगता है (केवल वोदका नही)…

तो नेता जी ने किसानों को बोला कि अपने पेट भरने तक का अनाज तुम्हारा और बाकी का सरकार का.

किसान भड़क गए, उपज का अधिकतम भाग सरकार को कैसे क्यों दे दें?

सरकार के पास इन सबसे निपटने के लिए चेका नाम की सुरक्षा एजेंसी थी… इसने इन विरोधी किसानों को चुन चुन कर मारना शुरू किया.

किसानों ने प्रत्यक्ष विरोध बन्द कर दिया, लेकिन खेती तो उनको ही करनी थी, तो वो भी बस उतना ही उगाते जितने से उनका पेट भरता… इससे शहर में खाने के लाले पड़ने लगे…

आखिर लेनिन का सुझाया गलत कैसे हो सकता था, मोटी बुद्धि के किसानों की ये ज़ुर्रत, तो हर क्षेत्र का कोटा तय कर दिया, मतलब हर इलाके से तय अनाज, सब्जियां और पशु उठाये जाने लगे.

भई क्रांति के लिए इतना तो बनता है, कुछ मौतों से कई जिंदगियों का भविष्य सुधरता है तो क्या दिक्कत है (ऐसा लेनिन बोला)… उठाते उठाते जल्द ही ऐसा दिन आ गया जब उठाने को कुछ बचा ही नहीं.

इसके बाद भूखे किसानों ने अपने पालतू जानवर मारकर खाये, फिर कमज़ोर इंसानों को खाया, फिर लाशें खोद खोद कर खायीं. हाल ऐसे थे कि ये वेदना देख कर हजारों की तादाद में सैनिकों सेना छोड़ भागने लगे…

ये तो हुआ मूर्ख मोटी बुद्धि के किसानों का किस्सा…

जहां लेनिन सरकार ने फैक्टरी लगाई और मज़दूरों ने कुछ मांगे रखी, उन सब मज़दूरों को आंदोलन का विरोध करने के जुर्म में गोली से उड़ा दिया गया…

ये तो हुई मज़दूर की बात…

लेनिन नाम के राक्षस ने अपने वामपंथियों भाइयों को भी नहीं छोड़ा… जो वामपंथी पार्टी इसके हिसाब से न चली या इससे ताकतवर होते हुए दिखी, उसको भी इसने निगल लिया…

इस राक्षस की टूटी मूर्ति पर व्यथित लोगों को उन किसानों-मज़दूरों की ज़िंदगी का 10% जीवन तो मिले… इसी आशा के साथ…

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