कथा दाल पानियों की

किसी समय झाबुआ में, किसानों का एक नवविवाहित जोड़ा था, फसल के समय युवक किसान नवब्याहता का गौना कर अपने घर लाता है कि फसल पक गई है और घर पर मौजूद जानवरों का ख्याल रखने को कोई चाहिए.

नव ब्याहता को गौने के समय हिदायत है कि गौने की बेला में नक्षत्रों की चढ़ाव है जो किसान के पति के सर कर्जा चढ़ायेगी.

सो ग्रहों के इस चढ़ाव के उतार के लिए ससुराल से हल है कि नौ दिन तक जब तक पूनम का चाँद आकाश में नहीं आता, पति के भोजन का मसाला मायके से ही आना चाहिए.

नवविवाहिता दुल्हन, दुपट्टे के छोर में नौ गठाने कर नौ ग्रहों के हिसाब से गठानों में नौ मसाले बाँध लेती है. हल्दी, मिर्ची, नमक, जीरा, तेजपान, लौंग, राई, इलायची और हिंग.

इस साल पानी अच्छा गिरा है, खेत में चने और मक्के की फसल है. दिन रात की रखवाली बड़ी जरूरी है. किसान खेत पर चक्की में साबुत अन्न को पीस सत्तू बना लेता है, ठंड़े पानी के साथ, चार फक्की, कि उसे वहीं रहना है, खेत में, फसल की कटाई तक.

मगर भीलनी परेशान है. पाँच साल बाद पति का सामीप्य, पति के साथ बैलगाड़ी पर वह गुदगुदाती चुहलबाजी, वह प्रेम भरे चुम्बन मगर जैसे ताप की धरती पर बूँद भर छींट…

इस स्वल्प मिलन को बीते भी तीन दिन हो चले. इधर गौने के बाद मायके से भीलनी का भाई और भौजाई बहन के घर मक्का छोड़ने आएँ हैं, साथ लाए हैं गाय का घी, बहन के लिए.

लेकिन वहीं घर पर, बहन का उतरा चेहरा भौजाई पढ़ लेती है. पूछने पर भीलनी अपना सारा दुख अपनी भौजाई से कह देती है.

भौजाई तीन पहर वहाँ रूककर घर संभालने का भीलनी को आश्वासन देती है, कि तब तक भीलनी जाए और अपने प्रिय से मिलकर आ जाए, भीलनी हर्षित हो भौजाई को गले लगा लेती है.

मगर फिर भीलनी को पति की भूख का ख्याल होता है, खुद भीलनी ने पति वियोग में कौर भर अन्न ही भोजन के नाम पर खाया था, मगर केवल तीन प्रहर का वक्त है, यह बहूमूल्य समय खाना पकाने में व्यर्थ नहीं किया जा सकता.

सो लोटे में गाय का दूध और बकुचा भर घी भर, गर्मी का ताप हरने को प्याज, लहसुन और दही एक बर्तन में धर, वह खेत जाने को तैयार होती है.

मिलन की अभूतपूर्व कहानियों को पिरोए लोकगीतों के छंद, जो उसने अपनी दादी से सुने थे, उन्हें गुनगुनाते हुए दाँत में दुपट्टे का छोर फसाएँ, मुँह ढाँप पिया के खेत की ओर वह प्रेयसी तेज कदमों से निकल चलती है.

ओ मगर प्रेम का वह उत्साह, खेत में पिया का कुम्हलाया चेहरा देख उतर जाता है, कर्मण्या उस खेतिहर के बदन से पसीने की बूँदें चमचमा रही थी. मट्टी से सना धूप में ताम्बई हो चला था, इस कड़ी मेहनत और जागरण के साथ स्वल्पाहार के दुर्लक्षण भीलनी ने तुरंत भाँप लिए.

खेत में किसान आम के पेड़ के नीचे लेटा है, और उधर भीलनी ने वहाँ धूप में सूख रहे मकई के भूट्टो से दाने चुन लिए हैं, चक्की के पाट में उन्हें वहीं पर पिसा, मकई का मोटा दरदरा आटा,
पास में गाय का दूध है.

भीलनी पानी और दूध के साथ मकई का वह आटा घोलती है, हथेलियों से बाटियाँ बनाती है, मगर बाटियों को पकने में समय लगता है, और समय ही तो नहीं भीलनी के पास, तो वह उन्हें पतला थापती है, ना अधिक पतला ही, कि वे जल जाएं.

आँच के लिए गोबर के सूखे ऊपलों को आग दिखाती है, तेज आँच से, पानी और मकईयें के उन “पानियों” को बचाने के लिए पास के खाखरे के पेड़ के पत्तों के बीच पानियों को रखती है, इधर मकई के वह पानिये भाप और आँच में सिंक रहे होते हैं, उधर खेत से भीलनी हरे छोड़ चुन लाती है.

घी में प्याज लहसुन कतर भूनती है, लोकगीत गाती जाती है, और दुपट्टे की एक एक पोटली खोलते हुए मसालें मिलाती जाती है.

छोड़ (हरे चने) के दाने मिलाकर लकड़ी से चलाती रहती है, आखिर में पानी मिला हरे चने की सुगंधित दाल तैयार करती है. इधर पानियें सिककर तैयार होते हैं, दूध में सिंझे, फूले कुरकुरे और मीठे. और तेजपान, हींग और लौंग, इलाइची से महकती दाल, जिसमें खेत से तोड़े टमाटर और हरी मिर्च का छौंक हैं.

इस अद्भुत सुगंध से किसान की नींद टूटती है, अपनी स्वप्न प्रिया को सामने पाकर मुस्कुराता है, क्षुधावर्धक गंध पर प्रियतमा की मुस्कान देह का ताप हरती है.

इधर भीलनी, गर्म पानियों की राख को झाड़कर उन्हें घी की हँड़िया में डाल घी पिलाती है, प्रेम से कौर निगलते उस जोड़े को निहारते हुए आकाश में सूर्य अपनी कला बदलता है. बीते ढेड़ प्रहर का प्रेम महीन होकर उस भोज में घुलकर भोज को दिव्य बनाता है, और उस व्यंजन को एक तरह से उस किसान भीलनी की धरा पर अमर.. जहाँ श्रम और विश्राम के बीच प्रेम को बहुत कम समय मिलता है. तब प्रेम से पगे दाल पानिए सदैव यूँ ही तैयार होते हैं, खाए जाते हैं, खिलाए जाते हैं.

दाल पानिए, एक किसानी भोज है, मगर इसकी दिव्यता और स्वाद सभी आत्मओं को अपने रस से भीगोता है, यह व्यंजन अपने अनूठे स्वाद से स्मृति में जा पैठता है, जब भी झाबुआ पधारे इस अद्भुत व्यंजन का स्वाद जरूर चखें.

– किंशुक शिव

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY