पूंजीवाद और मार्क्सवाद, दोनों से ही उपजी त्रासदी, मिश्रित अर्थव्यवस्था ही सफलतम मॉडल

18 वीं सदी के मध्य में यूरोप (UK) में एक अर्थशास्त्री हुए, एडम स्मिथ. इन्होंने सिद्धांत प्रतिपादित किया कि तीव्र आर्थिक विकास के लिए अर्थव्यवस्था मुक्त होनी चाहिए जो डिमांड व सप्लाई की अदृश्य ताक़त द्वारा ख़ुद नियंत्रित होगी, इसमें सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.

चूँकि उस समय यूरोप में आर्थिक तंगी थी, तो एडम स्मिथ का सिद्धांत हाथों हाथ लिया गया, उसके बाद एडम स्मिथ बहुत प्रसिद्ध हो गए.

यूरोप के ज़्यादातर देशों में सरकार ने एडम स्मिथ के सिद्धांत पर नीतियाँ लागू कर दी.

वो दौर मशीनीकरण का था, मास प्रोडक्शन का था. मुक्त अर्थव्यवस्था व बाज़ार में मोटे प्रॉफिट के लालच में धड़ाधड़ उद्योग व मशीने लगने लगीं, वस्तु व सेवाओं का उत्पादन शुरू हुआ.

कार्टेल व लॉबिंग के चलते प्रॉफिट मनमाना था. उत्पादन बढ़ने के बावजूद सरकारी हस्तक्षेप न होने से ज़रूरी वस्तुएँ महँगी मिलने लगीं.

कामगारों का न्यूनतम वेतन तय न होंने से उन्हें कौड़ियों के भाव वेतन मिलता था ताकि उत्पादन पर लागत कम की जा सके.

ऐसा होने से धीरे धीरे यूरोप के देशों में एक छोटा वर्ग अमीर होता गया और दूसरा वर्ग जो बड़ा था, ग़रीब होता गया.

समाज में एक बड़ी जनसंख्या की क्रय क्षमता गिरने से मंदी आ गई, जिसमें अमीर वर्ग भी कष्ट में आ गया.

यूरोप में हाहाकार मच गया, ग़रीबी से अनेकों लोगों ने भूखे दम तोड़ा. यूरोप की अर्थव्यवस्था चरमरा गयी. ऐडम स्मिथ का सिद्धांत असफल माना जाने लगा जिसे बाद में पूँजीवाद नाम दिया गया.

इसी बीच 19वीं शताब्दी में यूरोप (जर्मनी) में एक दूसरे दार्शनिक का जन्म हुआ, उनका नाम था कार्ल मार्क्स.

पूँजीवाद के प्रतिकार में उन्होंने एक दूसरा सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसे मार्क्स के क्लास सिद्धांत नाम से जाना गया.

उन्होंने कहा कि “पूँजीवादी समाज में दो क्लास होते हैं, एक तो बुर्जुआ जो उत्पादन के संसाधनों को नियंत्रित करता है, दूसरा सर्वहारा या वर्किंग क्लास (proletariat) जो बुर्जुआ क्लास को अपना श्रम बेचकर उत्पादन करता है. ऐसी व्यवस्था में बुर्जुआ क्लास वर्किंग क्लास का शोषण करता है.”

चूँकि उस समय यूरोप और उससे प्रभावित रूस पूँजीवाद के दंश को झेल रहा था, कार्ल मार्क्स का ये सिद्धांत पुनः हाथों हाथ लिया गया, कार्ल मार्क्स प्रसिद्ध हो गये.

कार्ल मार्क्स ने कहा कि उत्पादन के संसाधन सहकारी अथवा सरकारी संस्थाओं के पास ही होने चाहिए, जिसका उद्देश्य प्रॉफिट कमाना नहीं बल्कि आम लोगों के हित के मद्देनज़र काम करना होना चाहिए. उन्होंने सोशलिस्ट इकॉनमी का कॉन्सेप्ट दिया.

20वीं शताब्दी में रूस में ‘लेनिन’ और चीन में ‘माओ’ कार्ल मार्क्स के सिद्धांत से बहुत प्रभावित हुए. लेनिन ने कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों पर रूस में क्रांति कर दी. क्लास स्ट्रगल हुआ, बुर्जुआ वर्ग को खींच-खींच के मारा गया. ऐसे समाज में निजी व्यापार करना एक जुर्म हो गया.

उन्ही दिनों भारत भी पूँजीवाद का दंश झेल रहा था. नेहरु, सरदार भगत सिंह वगैरह भी मार्क्स व लेनिन से बहुत प्रभावित थे.

उसके बाद रूस हो, चीन हो और आज़ादी के बाद भारत हो, इन सारे ही देशों में सोशलिस्ट इकॉनमी की नीव पड़ी. जिसमें बड़े स्तर का कोई निजी व्यापार करना एक प्रकार से किसी जुर्म से कम नहीं था, अतः ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था ने दम तोड़ दिया.

सहकारी व सरकारी मॉडल में पूर्ण सरकारी हस्तक्षेप होने व मालिकाना (ownership) के अभाव में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया. ऐसी स्थिति में राजस्व में गिरावट के चलते टैक्स की दरें बढ़ा दी गई. आम लोगों का शोषण फिर भी जारी रहा. समृद्धि की जगह दरिद्रता आती गई.

धीरे धीरे कार्ल मार्क्स का सिद्धांत भी असफल माना जाने लगा. रूस और चीन दोनों ने कार्ल मार्क्स के सिद्धांत पर आर्थिक नीतियों की नीव डालने वाले लेनिन व माओ से तौबा कर ली. अंततः रूस व चीन दोनों ही देशों ने 1980 आते आते पूर्ण रूपेण इस सिद्धांत को त्याग दिया.

एडम स्मिथ के पूँजीवाद व कार्ल मार्क्स के समाजवाद, इन दोनों ही सिद्धांतों के विश्व स्तर पर ‘ट्रायल और एरर’ प्रयोग के बाद दुनिया ने सीखा कि वास्तव में ये दोनों ही सिद्धांत अतिवाद हैं और रास्ता इनके बीच है. निजी व्यापार कोई अपराध नहीं है, इससे समाज को कोई नुक़सान नहीं बशर्ते सरकार उसे रेगुलेट करें.

इसे मिक्स इकॉनमी मॉडल कहा गया. जिसके अनुसार- “It’s not government business to run a business, but government business is to regulate a business.”

माने सरकार निजी व्यापार को मुक्त तो छोड़ेगी, लेकिन उसका प्रॉफिट मार्जिन लिमिट कर उसे रेगुलेट करेगी. वो ये सुनिश्चित करेगी कि समाज में लगभग सभी व्यापार के कमोबेश एक निश्चित प्रॉफिट मार्जिन से ज़्यादा न लें, माने उनका अधिकतम मूल्य तय करेगी. साथ ही जिनका बिज़नस जितना बड़ा हो, उनका प्रॉफिट मार्जिन उतना कम हो या उनपर इनकम टैक्स ज़्यादा हो ताकि समाज में आर्थिक असंतुलन न आने पाए.

लेकिन ये कोई नई खोज थी, ऐसा बिलकुल नहीं था. उससे कहीं पहले वर्षों से प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था इसी मॉडल पर चलती आयी थी. चाणक्य ने भी अर्थशास्त्र का यही मॉडल दिया था या कहें भारतीय मॉडल का पुनर्लेखन किया था, जिसमें व्यापारी व्यापार करेगा और सरकार उसे रेगुलेट करेगी, उसे सुरक्षा, सुविधाएँ वगैरह मुहैया कराएगी.

चाणक्य के कालखंड में व्यापार मुक्त था लेकिन सभी वस्तु व सेवाओं का अधिकतम मूल्य निर्धारित किया गया था जिसके ऊपर बिक्री अपराध थी. मज़दूर की न्यूनतम मज़दूरी तय थी.

चाणक्य के अनुसार यदि राजा को राजस्व बढ़ाना हो तो कर (टैक्स) बढ़ाने के बजाए, व्यापार को बढ़ाएँ. कई हज़ार वर्षों तक प्राचीन भारत की समृद्धि इस मिक्स सिद्धांत की सत्यता का प्रमाण हैं.

ऐसा कहा जा सकता है कि वास्तव में एडम स्मिथ व कार्ल मार्क्स एक प्रकार की मर्यादा की खोज कर रहे थे, जिसमें एडम स्मिथ ने सूखाग्रस्त क्षेत्र में तट रहित (मर्यादा रहित) नदी की कल्पना की थी, जिससे बाढ़ आने के बाद कार्ल मार्क्स ने नदी को सुखा देने का कार्य किया. दोनों ने ही त्रासदी को जन्म दिया. दोनो ने ही एक blunder किया था.

जबकि भारतीय दर्शन के अनुसार नदी जीवनदायनी है बशर्ते वो अपनी मर्यादा में हो (अर्थात तटों के बीच से बहे). जब वही नदी अपने तटों को छोड़ देती है, तो बाढ़ लाकर महाविनाश का कारण भी बनती है.

ये एक बात समझने में यूरोप को तीन शताब्दियाँ लग गई, जिसमें अनेकों लोग मारे गये, कई देशों ने ख़ूनी त्रासदी झेली. जबकि उन्ही दिनों भारत में ही प्राचीन भारत का आर्थिक मॉडल उपेक्षा का शिकार रहा.

समझने की बात ये हैं कि इतना कुछ हो जाने के बावजूद अत्यंत लालची व्यापारी, एडम स्मिथ के unsustainable मॉडल की ही पैरवी करता है.

वहीं दूसरी ओर आज भी कुछ मूर्ख क़िस्म के जड़वादी लेनिन, कार्ल मार्क्स का सिक्का ज़बर्दस्ती चलाना चाहते हैं, भले ही समाज में दरिद्रता साफ साफ परिलक्षित हो रही हो. ये रेगुलेटेड बिज़नस को भी ये पूँजीवाद नाम देते हैं, ये आज भी निजी व्यापार को अपराध बताते हैं.

ख़ैर, अब इनके क़िले ढह चुके हैं. ये मिक्स एकनॉमिक मॉडल सफलतम सिद्ध हुआ है, वर्तमान में भारत की आर्थिक नीतियाँ इसी पर आधारित हैं, लेकिन ये सभी प्रकार के व्यापार में पूर्णरूपेण लागू नहीं हुआ है. अभी इसके विस्तार का बहुत स्कोप है.

विभिन्न क्षेत्रों में व्यापार व सरकार की मर्यादा क्या हो, वस्तु व सेवाओं का अधिकतम मूल्य क्या हो, ये आज भी अध्ययन व शोध का विषय है. जहाँ पर्याप्त जानकारी है, वहाँ कई राजनैतिक व सामाजिक अड़चने हैं. बदलाव धीरे धीरे जारी है. त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा का ढहाना ऐसे ही राजनैतिक व सामाजिक बदलाव का बेहतरीन उदाहरण है.

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