आशु उवाच : वासुदेव कृष्ण – 2

कंस ने लगभग डाँटते हुए कहा- मुझे बहलाओ मत कृष्ण. मैं गोकुल की गोपी नहीं हूँ, जो तुम्हारे बोले गए प्रत्येक शब्द को सत्य मान लूँ.

और ना ही तुम्हारा भक्त हूँ, जो तुम्हारे अन्याय को भी तुम्हारी कृपा मानकर भावाभिभूत रहते हैं.

पुण्य में इतना सामर्थ्य नहीं होता कृष्ण कि वह पाप को परास्त कर सके, इसलिए वह परमात्मा का सहारा लेता है. पापी का लक्ष्य पुण्यात्मा नहीं परमात्मा होता है. इसलिए पुण्यात्मा भले ही परमात्मा को पहचानने में भूल कर दे किंतु पापात्मा उसे घोर अंधकार में भी पहचान लेता है. पुण्यात्मा के प्रेम से तुम मात्र प्रकट होने के लिए बाध्य होते हो किंतु पापात्मा का द्वेष तुम्हें निकट रहने के लिए विवश करता है.

पुण्यात्माएँ नहीं, पापात्माओं के कारण ही परमात्मा को जन्म लेने के लिए बाध्य होना पड़ता है.

पुण्यात्मा तो मात्र परमात्मा का स्मरण करते हैं, किंतु पापात्मा, परमात्मा का स्फूरण करते हैं.

संसार के हृदय में पापी द्वारा मिटा दिए जाने का भय ही परमात्मा की भक्ति का मूल कारण होता है.

याद रखो पुण्यात्मा का पुण्य नहीं, पापी का पाप ही परमात्मा को प्रतिष्ठा दिलाता है. वह पापी ही होता है जो अपने सर्वनाश की कहानी से परमात्मा को अमरता प्रदान करता है.

कृष्ण तुम कुब्जा के कारण नहीं कंस के कारण याद रखे जाओगे.

संसार तुम्हें प्रेम के कारण नहीं अपितु युद्ध के कारण स्मरण रखेगा.

कंस के वक्तव्य को सुनकर श्रीकृष्ण के मुख पर उनकी चिर-परिचित मुस्कान आ गई, वे मधुर हास्य के साथ बोले- होनी को टालने का प्रयास तो आपने किया था मामाश्री, तभी तो मेरे जन्म से पहले ही मेरी मृत्यु की व्यवस्था कर दी थी.

कंस ने चौंकते हुए कृष्ण से कहा- क्यों, अपने जीवन की रक्षा के लिए किया जाने वाला प्रयास क्या अनुचित, अन्यथा कर्म की श्रेणी में आता है?

कुछ लोग मरण से बचने के लिए भक्ति का आश्रय लेते हैं, तो कुछ लोग अपने जीवन की रक्षा के लिए युक्ति को प्रधानता देते हैं. मुझे भक्ति से अधिक अपनी युक्ति और शक्ति पर विश्वास था. अपनी शक्ति और युक्ति पर अगाध विश्वास क्या अधर्म की श्रेणी में आता है? जो नृशंसता से तुमने मेरा वध किया. मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था कृष्ण जो मेरे नाश के लिए तुम ईश्वर होते हुए भी नश्वर हो गए?

श्रीकृष्ण अब अपनी रौ में आ चुके थे, चित्त पर चोट करने वाली अपनी मुस्कान को कंस पर फेंकते हुए बोले- सुनना चाहते हो तो सुनो मामा, आपने अपने पिता महाराज उग्रसेन को ही बंदीगृह में डाल दिया, जिस बहन को तुम अपने प्राणों से अधिक प्रेम करते थे उसी की गर्दन पर तुमने तलवार रख दी, उसने अपने प्राणों की भीख माँगी तो उसे कारावास में बेड़ियों से जकड़कर डाल दिया, अपने भाई समान मित्र वसुदेव को जो तुम्हारे बहनोई थे, कारावास में नरकीय यातना दी. तुमने एक बार नहीं आठ बार तुम्हारी बहन के नवजात शिशुओं का निर्ममता के साथ संहार किया.

तुमने मथुरा में लोकतंत्र की हत्या करके राजतंत्र को स्थापित कर दिया.

कोई भी शासन या सत्ता समाज के कल्याण का हेतु होती है मामा, लेकिन आपने समाज को शक्तिहीन करके स्वयं को शक्तिसंपन्न कर लिया. स्वयं को सुरक्षित करने के लिए समाज को असुरक्षित करना कहाँ का धर्म है ?

मामा जिस कृष्ण के सम्मुख आज तुम खड़े होकर यह पूछ रहे हो कि मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? तो सुनो, तुमसे अपने प्राण बचाने के लिए मुझे छः बार स्वयं के प्राण गँवाने पड़े हैं. मृत्यु, जिसका होना निश्चित है उस पर विजय पाने के लिए तुमने आठ बार कृष्ण की हत्या करने का प्रयास किया जिसमें से छः बार तुम अपने इस दुष्कृत्य में सफल भी हुए. इसके बाद भी तुम यह पूछते हो कि मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था कृष्ण?

पूछना तो मुझे चाहिए मामा की मैंने आपका क्या बिगाड़ा था जो आपने अपने अंदर के सुर को असुर में परिवर्तित कर दिया?

एक बात और मामा, कृष्ण को अपने अस्तित्व की स्थापना के लिए किसी कंस की आवश्यकता नहीं है, अपितु कंस को अवश्य कृष्ण का आश्रय लेना होगा. मामा, तुम पहले भी भ्रम थे और अभी भी भ्रम में हो, कृष्ण युद्ध के कारण नहीं अपितु मृत्यु के मुख में खड़े होकर बोली गयी जीवन गीता के लिए याद रखा जाएगा. वह कंस के द्वेष के लिए नहीं, राधा के प्रेम के लिए स्मरण में रहेगा. कृष्ण राजा होते हुए भी भूपाल के रूप में नहीं, गोपाल के रूप में ही याद किया जाएगा.

कंस क्रोध की उस अवस्था में पहुँच गया जहाँ मनुष्य क्रोध के आवेग में काँपता हुआ अश्रुपूरित हो जाता है. व्यक्ति को जितना कष्ट उसके नष्ट हो जाने में नहीं होता उससे कहीं अधिक पीड़ा उसे अपने भ्रष्ट हो जाने की होती है, कंस जानता था कि वह अपने नष्ट हो जाने को लेकर व्यथित नहीं है अपितु वह अपने भ्रष्ट हो जाने के ताप से जल रहा है.

उसका मन हुआ कि वह अपने हृदय में व्याप्त द्वेष और क्रोध की अग्नि से सम्पूर्ण विश्व को क्षण भर में भस्म कर दे. कंस पीड़ा से चित्कार करते हुए बोला- सम्पूर्ण विश्व को समान दृष्टि से देखने की झूठी घोषणा करने वाले पक्षपाती कृष्ण, तुम उस समय कहाँ थे जब इस अबोध कंस ने जन्म लिया था?

तुम उस समय कहाँ थे जब इस अबोध बालक कंस को तुम्हारा गौरवशाली यादव वंश पाप और ग्लानि के बोध से भर रहा था?

क्या छल, कपट का सहारा लेकर एक स्त्री के साथ बलपूर्वक किए गए दुराचार से पैदा होने वाली संतान भी दुराचारी और पापी ही होती है?

क्या तुम्हारे इन गौरवशाली माथुरों को जो लोकतंत्र में विश्वास करते हैं इस सामान्य व्यवहार का भी ज्ञान नहीं था, कि व्यक्ति जन्म से पापी और दुराचारी नहीं होता अपितु समाज के द्वारा अपमानित और प्रवंचित करने पर पाप का जन्म होता है.

जिस कंस का अत्याचारी, दुराचारी, पापी समझकर तुमने संहार किया था वह तुम्हारे घृणित समाज की उत्पत्ति थी.

अद्भुत है तुम्हारा न्याय वासुदेव कृष्ण, तुमने कंस रूपी निर्मिति का संहार तो कर दिया किंतु उसके निर्माता समाज का रक्षण प्राणपण से करते रहे!

स्मरण रखो जनार्दन कृष्ण, तुम अधर्मी को समाप्त करके कुछ समय के लिए तो धर्म की रक्षा कर सकते हो, किंतु धर्म की स्थापना नहीं कर सकते.

तुमने कंस के सभी पापों को उसके अपराधों को तो चिन्हित कर दिया, किंतु इस बात पर कभी विचार किया कि क्यों एक पुत्र ने जो उस सत्ता का एक मात्र उत्तराधिकारी है, अपने पिता को कारावास में डालकर उन्हें अपमानित किया?

क्यों अपनी प्रिय बहन और बहनोई को मरणांतक पीड़ा दी? क्यों यादवों के लोकतंत्र को ध्वस्त कर राजतंत्र में परिवर्तित कर दिया? मथुरा का अधिपति होने के बाद भी, क्यों प्रजा के रक्षण की जगह मुझे उनके भक्षण में अधिक सुख मिलता था? अपने लिए जय जयकार सुनने के बाद भी मैं क्यों प्रत्येक नागरिक के हृदय में हाहाकार मचा देना चाहता था ?

कृष्ण देख रहे थे जिस कंस के भय से असुर भी थरथर कांपते थे वही कंस आज उनके समक्ष भाव के आवेग से थरथरा रहा था. उन्हें लगा जैसे आज कंस अपने हृदय में व्याप्त संताप की गठरी को उनके समक्ष खोलकर रख देना चाहता है.

क्रमश:
– आशुतोष राणा

आशु उवाच : वासुदेव कृष्ण – 1

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