कॉमरेड, तुम्हारी अलमीरा में लाशों का ढेर है, तुम्हारे घर में बदबू का बसेरा है

वामपंथी कुपढ़ और अनपढ़ हैं, इसीलिए इतने कुतर्की भी. उनको पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियां पढ़नी चाहिए.

पढ़ी होती तो उस बूढ़े बाघ की भी कहानी पता होती, जो अपने नाखून और दांतों के गल जाने पर संन्यास का नाटक करता है.

फिर, एक सोने का कंगन हाथ में लेकर तालाब में उतरता है और सभी को अपनी वृद्धावस्था और अंतिम समय का हवाला देकर उस कंगन को दान करने की इच्छा जताता है.

ज़ाहिर है, दान तो उसे करना नहीं होता है, फिर भी जो भोले जानवर उसकी चपेट में आ जाते, वह उनको खा जाता है.

आखिरकार, एक खरगोश उस बूढ़े और लाचार बाघ का यह ‘दान’ देख लेता है, उसका प्रपंच खोल देता है और वह अपने अंतिम दिनों में लाचार मौत मरता है.

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एक चीज़ होती है परसेप्शन-बिल्डिंग या छवि-निर्माण. वामियों के प्रिय चॉम्स्की इसका खूब इस्तेमाल करते हैं. कम्युनिस्ट इसमें माहिर होते हैं.

माणिक सरकार भी वही बूढ़े बाघ थे या हैं, छवि-निर्माण उनका भी किया गया है. गांधी भी तीसरे दर्जे में चलते थे और उनके साथ उनकी बकरी भी होती थी.

सरोजिनी नायडू का यह बयान इतिहास में दर्ज है कि गांधी की गरीबी को मेनटेन करने के लिए कांग्रेस को बहुत खर्च करना पड़ता था.

कल से लोग माणिक सरकार की ईमानदारी, निष्ठा और सच्चाई पर आंसूपछाड़ रुदाली गाते हुए त्रिपुरा की जनता को गरियाए जा रहे हैं.

एक महान आचार्य तो एक कदम आगे बढ़ कर केजरीवाल की ईमानदारी (?) को माणिक के साथ जोड़कर कह रहे हैं कि अब ये देश रहने लायक नहीं है.

काँग्रेसी-कौमी कुतर्की ये सब गाएं तो उनको माफ किया जा सकता है, पर आप???

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अब दो-तीन बातें जान लीजिए. अव्वल तो जो अच्छा आदमी होगा, वह कुछ भी हो सकता है, कम्युनिस्ट नहीं होगा. एक खूंरेज, कत्लोगारत वाली विचारधारा (?) को कोई भी आदमी अपने senses में सपोर्ट नहीं कर सकता है.

यही त्रिपुरा है, जहां चार संघ के लोग मार दिए जाते हैं और उनकी लाश तक परिवारवालों को नहीं मिलती. कितने लोगों की हत्या हुई, यह माणिक सरकार ही जानते होंगे…

इसी त्रिपुरा में बेरोज़गारी और गरीबी चरम पर है…. (मने, हम पूरे राज्य को ही अपनी तरह गरीब रखेंगे). इसी माणिक सरकार के हेलीकॉप्टर का बिल भी देख लेते कॉमरेड…

और हां, किसी मंत्री या नेता के संघ के कार्यक्रम में जाने पर तो तुमको बहुत दर्द होता है, तुम तुरंत नैतिकता का खोल ओढ़ लेते हो, लेकिन माणिक सरकार ने दो दशकों तक अपने वेतन का पैसा जो पार्टी-फंड में दिया, उस पर मुंह में गोबर भर लेते हो…?

वो पैसा माणिक सरकार के पिताजी का नहीं था, करदाताओं का था और उन्हें वह पार्टी-फंड में देने का अधिकार किसने दिया…? वह त्रिपुरा के चीफ-मिनिस्टर नहीं, सीपीएम के काडर्स के चीप-मिनिस्टर मात्र थे……

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कॉमरेड, तुम्हारी अलमीरा में लाशों का ढेर है, तुम्हारे घर में बदबू का बसेरा है. बेहतर है, अब भी सच्चाई को मान लो. भारत की जनता ने तुम्हारा बोरिया-बिस्तर बांध दिया है, अब आखिरी कांटा (केरल का) भी वह उखाड़ फेंकेगी…

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