बोर्ड के कम नम्बरों से ज़िंदगी के नम्बर कम नहीं होते

बात तब की है जब हम दसवीं कर रहे थे. तब भी पेपर मार्च में होता था. CBSE ICSE का बिना चीटिंग के होता था और स्टेट बोर्ड का स्कूल अनुसार फुल चीटिंग से होता था.

हमारे यहां भी एक एक नम्बर की लड़ाई थी, जहां कोई केवल पास होने के लिए पेपर दे रहा था, कोई टॉपर बनने के लिए….

आज वो पेपर दिए 18 साल निकल गए, मतलब ये कि हे! दसवीं के बच्चों, हमने आपकी उम्र जितनी ज़िंदगी अपने दसवीं के पेपर के बाद जी ली, और अब आपको बताते हैं सच्चाई कि इन नम्बरों से क्या मिला-

1. जो Businessman के बच्चे थे, वो CA करके, टॉपर होकर भी पिताजी का business कर रहे हैं. ज़्यादा नम्बर वाले और कम नम्बर वाले सब बराबर हो गए.
2. जो सर्विस क्लास के थे वो सर्विस कर रहे हैं, सर्विस क्लास वाले के बच्चे ने अगर ऊंची जगह से ठप्पा लगवाकर graduation और MBA किया तो वो ज़्यादा कमा रहे हैं. (IIT IIM छाप)
3. कुछ इक्का दुक्का अपने मन का काम कर रहे हैं, और उनके काम और उनके नम्बर में कोई लेना देना नहीं है.

ऊपर के तीनों से अलग हैं जो “खुश” हैं, जो इस दुनिया मे बस मौज पर मौज उड़ाए जा रहे हैं… खुशियां बिखेर रहे हैं… खुशियां समेट रहे हैं… दसवीं या बारहवीं में ये ज्ञान नहीं मिलता…. तुम्हारे बाप माई यदि नम्बर के चक्कर मे हंगामा किया हुए हैं तो ये दुनिया छोड़कर मत जाओ… इत्ती सी टेंशन भी मत लेना… मेरे को मैसेज करने का और बाकी मैं सम्हाल लूंगा.

यदि लड़की या किसी लड़के की वजह से पढ़ाई में मन नहीं लगता तो एक और बात नोट करके रख लो, जोड़ियां ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन में बनती हैं, बहुत टाइम है अभी. अभी जिस पर टाइम खरच करोगे वो नहीं मिलेगी/मिलेगा तुमको.

बोर्ड के कम नम्बरों से ज़िंदगी के नम्बर कम नहीं होते. इन नम्बरों से कोई जीवन की खुशियां नहीं खरीद पाया.

(बाकी मित्र भी अपने रिश्तेदारों और मित्रों के बच्चों को भरोसा दिलाएं कि उनका एक और घर है जहां मरना नहीं पड़ेगा).

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