पाकिस्तानी पत्रकार की टिप्पणी को चरितार्थ कर रहा है कांग्रेस का आचरण

पाकिस्तान के एक मशहूर पत्रकार हैं हसन निसार. अपने टीवी कार्यक्रमों में वो पाकिस्तान के सन्दर्भ में एक बात लगातार दोहराते रहते हैं.

वो कहते हैं कि “पाकिस्तान एक मुल्क नहीं रह गया है. इसके बजाय यह एक ऐसे हुजूम में तब्दील हो गया है जिसमें भगदड़ मची हुई है और उस भगदड़ से बदहवास हुजूम में किसी ने सांप छोड़ दिये हैं.”

पाकिस्तान के सन्दर्भ में हसन निसार की उपरोक्त टिप्पणी का कारण वो ही जानते होंगे. लेकिन उनकी उपरोक्त टिप्पणी भारत में कांग्रेस की वर्तमान हालत पर बिल्कुल सटीक बैठती है.

इसके कई उदाहरण हैं लेकिन सबसे सटीक उदाहरण है कल त्रिपुरा में जनता द्वारा गिराई गयी लेनिन की प्रतिमा पर आज सवेरे से न्यूज़ चैनलों पर कांग्रेसी नेताओ/ प्रवक्ताओं द्वारा मनाया जा रहा मातम है.

सबसे पहले कांग्रेस और न्यूज़ चैनली/ कम्युनिस्टी रुदालियां यह सच जान लें कि रूस के सैकड़ों वर्ष पुराने ऐतिहासिक शहर सेंट पीटर्सबर्ग का नाम रूस पर कम्युनिस्टों के कब्ज़े के तत्काल बाद 1924 में बदल कर कम्युनिस्टों ने लेनिनग्राद रख दिया था और उसके मुख्य चौराहे पर लेनिन की विशालकाय प्रतिमा स्थापित की थी.

लेकिन 1991 में किसी विदेशी ताक़त ने नहीं, बल्कि स्वयं रूस की जनता ने लेनिन की उस मूर्ति को उखाड़कर फेंक दिया था. लेनिनग्राद शहर का नाम बदलकर उसे उसका ऐतिहासिक प्राचीन नाम “सेंट पीटर्सबर्ग” वापस दे दिया था.

इससे पहले 1961 में रूस की जनता ने त्सारित्सा और वोल्गा नदी के संगम स्थल पर स्थित रूस के मुख्य औद्योगिक नगर स्टैलिनग्राद का नाम बदल कर उसका नाम वोल्गोग्राद कर दिया था और उस शहर में लगी स्टैलिन की सभी प्रतिमाओं को उखाड़कर वोल्गा नदी में प्रवाहित कर दिया था दिया था.

यहां उल्लेख आवश्यक है कि 1917 में रूस पर अपने कब्जे की शुरुआत के साथ ही कम्युनिस्टों ने त्सारित्सा नदी के नाम पर बसे ऐतिहासिक प्राचीन नगर त्सारितसिन का ही नाम बदलकर स्टैलिनग्राद कर दिया था.

अतः जिस रूस की जनता ने कम्युनिस्टों द्वारा उन पर जबरन थोपे गए तथाकथित कम्युनिस्टी महानायकों की मूर्तियों को बरसों पहले उखाड़कर फेंक दिया. उनके नाम पर जबरिया बनाए गए नगरों के नाम बदलकर उन नगरों के ऐतिहासिक प्राचीन नामों की विरासत उनको वापस सौंप दी थी. उन्हीं रूसी नेताओं में से एक लेनिन की मूर्ति, जनता द्वारा त्रिपुरा में उखाड़कर फेंक देने पर भारत में हंगामा/ हुड़दंग/ विलाप/ मातम क्यों कर रही है कांग्रेस तथा कम्युनिस्टी फौज?

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति उखाड़े जाने पर आगबबूला हो रही कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि जनवरी 2004 में तत्कालीन अटलबिहारी बाजपेयी सरकार ने अंडमान की सेल्युलर जेल में अमर क्रांतिकारी वीर सावरकर के उद्धरणों वाली जो पट्टिका लगवाई थी, उसको मई 2004 में सत्ता में आते ही कांग्रेसी यूपीए की सरकार के पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने उखड़वा कर क्यों फिंकवा दिया था?

उस समय मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि… “मैंने मंत्री की हैसियत से सेलुलर जेल में सावरकर के उद्धरणों से युक्त पट्टिका को हटाने के आदेश दिए हैं. मेरे मंत्री बने रहने तक इस पट्टिका को वापस जेल में लगाने का सवाल ही पैदा नहीं होता. मैं इस मुद्दे पर कभी माफ़ी नहीं मांगूगा.”

मणिशंकर का दावा सही साबित हुआ था. मई 2014 में कांग्रेसी यूपीए की सत्ता से विदाई के बाद ही वह 2015 में मोदी सरकार ने वह पट्टिका लगवायी थी.

अतः त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति उखाड़े जाने पर मातम कर रही कांग्रेस का इतिहास बोध सम्भवतः शून्य हो चुका है. तथ्यों साक्ष्यों सन्दर्भों से उसका नाता पूरी तरह टूट चुका है.

कांग्रेस की यह हालत उसकी राजनीतिक बदहवासी को बयान कर रही है और उसकी यह बदहवासी पाकिस्तान के पत्रकार हसन निसार की उस टिप्पणी को ही चरितार्थ कर रही है कि… “…हुजूम जिसमें सांप छोड़ दिये गए हैं.”

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