असमंजस में छोड़ने वाला असमंजस बाबू – 3

असमंजस बाबू का पूर्वाभ्यास लय में आ चुका था. नयनीश ने बेजोड़ मेहनत की थी. इस प्रतिस्पर्धा में मैं भी थोड़ा बहुत अच्छा करने लग गया था. भौमिक दादा ने हम दोनों के दृश्यबन्धों में कोई भी समानता नहीं रखी थी. मैं और नयनीश दोनों उनकी इस अदा से लगभग परेशान हो गये थे कि वो दृश्यबन्ध में रोज़ कुछ न कुछ बदलाव क्यों ले आते हैं?

एक दिन जब हमने बहुत आग्रहपूर्वक उनसे पूछा कि वो ऐसा क्यों करते हैं तो उन्होंने जो बात हमें बतायी वो आज भी याद है. उन्होंने कहा था हमारी आँखे एक कैमरे की तरह काम करती हैं और इन आँखों का स्टोरेज बुद्धि होती है लेकिन कैमरे के स्टोरेज की तरह हम इसे किसी को दिखा नहीं सकते.

अगर हम इसे किसी को दिखा सकते तो अवश्य कई बार दृश्यबन्ध बदल कर मैं इसे ठीक से देखता दिखाता और फिर इसके कई मंचन न होते. केवल एक मंचन काफ़ी था. चूँकि रंगमंच में कोई भी मंचन सटीक पिछले मंचन की तरह नहीं होता है और इन्सान की चेतना लगातार विकसित होती है इसीलिए रंगमंच जीवंत कला है.

आज हमारी विचार प्रक्रिया में जो प्रतिमान बनते हैं वो कल टूट जाते हैं. उन्होंने कहा कि अगर मैंने कोई दृश्यबन्ध बदला है तो अवश्य ही बीच के दिनों में मेरा कोई प्रतिमान टूटा होगा और परिणामत: मैंने दृश्यबन्ध बदल दिया है. इस बीच उन्होंने मुझसे कहा कि अपनी भाव-भंगिमा में कथक नृत्य का पुट डालो और इससे दृश्य की गहराई बढ़ सके तो बढ़ा लो.

मैंने वैसा ही किया और सचमुच मेरे पूर्वाभ्यास में निखार आ गया. अब मैंने मंच पर हर क़दम ठीक से रखना शुरु कर दिया था. अब लगने लगा था कि कहानी मेरी ताल और थिरकन के साथ अपने आप को गा रही है. उधर नयनीश ने असमंजस बाबू की ऐसी चाल पकड़ी थी कि कभी कभी धोखे में टीम के बाकी लोग उसे असमंजस बाबू ही कह बैठते थे. हमारा पूर्वाभ्यास रवानगी पकड़ चुका था और लगने लगा था कि नाटक असमंजस बाबू की जवानी अपने शबाब पर है.

सचमुच मुझे और नयनीश को बहुत बाद में दादा की एक गुप्त मंशा का पता चला. वो हम दोनों के काम से काफ़ी हद तक खुश थे और उन्होंने हम दोनों द्वारा अभिनीत असमंजस बाबू के मंचन का फ़ैसला कर लिया था और फिर वह दिन भी आ गया जब उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र का प्रेक्षागृह असमंजस बाबू के लिए बुक कर दिया गया.

रंगदीपन की रूपरेखा ख़ुद दादा ने पहले से तैयार कर रखी थी. वेश-भूषा के लिए जब हमने भौमिक दादा से विचार विमर्श किया तो पता चला कि उनका इरादा एक अति साधारण वेश-भूषा का है तो पहले बड़ी निराशा हुई लेकिन जब उन्होंने बताया कि एकल प्रस्तुति है साथ ही साथ हमारे नाटक का विचार अति गहन है इसीलिए एकदम साधारण वेश-भूषा ही उचित होगी तो हमे उनकी बात बिल्कुल सही लगी.

उनका मानना था कि आहार्य सामग्री या प्रॉपर्टी को कम से कम इस्तेमाल किया जाये और भावों-भंगिमाओं से ही दर्शकों तक असली बात पहुँचायी जाये जिससे उनका मोहभंग न हो और कहानी में आयी हुई गूढ़ बातों का खुलकर वो आनन्द उठा सकें.

आनन्द से याद आया, कहानी में एक जगह ऐसा भी आया है कि आनन्द, शब्द कोष का सबसे रस भरा शब्द. एक ऐसा क्षण, जिसे निर्मित करना होता है………. कष्ट के ढेर में आनन्द सबसे नीचे दबा रहता है. तकलीफ़ों की भीड़ में आनन्द सबसे अलग-थलग कोने में दुबका खड़ा रहता है……. ज़िन्दगी में बहुत बड़ा आनन्द जैसी कोई चीज़ नहीं होती, आनन्द के तो छोटे-मोटे अवसर होते हैं, नन्हें मुन्ने पल, उन्हें अपनी ज़िन्दगी से मत निकलने दो. यह तुम्हारी ज़िन्दगी को खुशमय बना देंगे.

जब यह बात दादा ने पहली बार समझायी थी तो इसके अर्थ अलग थे और मंचन से पाँच दिन पूर्व जब आख़िरी बार उन्होंने यह बात समझायी थी तो इसके अर्थ बहुत ज़्यादा बदल चुके थे. पहली बार उन्होंने कहा था इस आनन्द के चक्कर में मत पड़ना. सुनने में यह जितना हल्का लगता है, कभी कभी इन्सान की ज़िन्दगी में उतना ही भारी पड़ जाता है. आनन्द उठाने की बजाय तकलीफ़ उठाओगे तो अवश्य ही कुछ अर्जित करोगे.

और मंचन से पाँच दिन पूर्व जब उन्होंने बात बोली तो कहा कि स्टेज पर उतरोगे और जैसे ही इस आनन्द की व्याख्या करोगे, लोग इसमें डूब जायेंगे और तुम्हारा काम आसान हो जायेगा. लेकिन अगर तुम भी लोगों के साथ ही इस आनन्द में गोते लगाने लगे तो दर्शक और तुम दोनों एक साथ बहते रहोगे और शायद रंगकर्म करते हुए मोक्ष ऐसे ही मिलता है.

उस दिन तो लगा था परिभाषा की भी परिभाषा बदल गयी है क्योंकि जीवन का हर क्षण नया होता है जो अपनी परिभाषा ख़ुद गढ़ता है. उसी दिन मुझे पता चल गया था कि अब नाटक को आगे लेकर जाना, उसे लगातार विकसित करते जाना और उसके विकास के नये अर्थ तलाशना हमारी ज़िम्मेदारी बन गयी है ठीक वैसे ही जैसे कोई दौड़ना सिखा तो सकता है लेकिन दौड़ना ख़ुद ही पड़ता है.

नाटक पहले सीधे सादे ढंग से ही शुरु हो रहा था लेकिन भौमिक दादा ने बाद में कहा कि सबसे आख़िरी भाग से नाटक शुरु करते हैं. हम थोड़ा कन्फ़्यूज़ हो गये थे कि यह क्या बात हुई भला? लेकिन जब उनके बताये हुए तरीके से हमने नाटक शुरु किया तो वही ज़्यादा उचित लगने लगा. कुल मिलाकर अब पूरा नाटक फ़्लैश बैक में असमंजस बाबू की ज़ुबानी दर्शकों के सामने आने वाला था.

मंचन का दिन आ चुका था. विचारों का एक पुलिन्दा मन के ऊपर हावी था और व्यवहारिक रूप में दुनिया हमारे सामने थी. दुनिया को आज लेखक से लेकर निर्देशक तक के विचारों से अवगत कराना हमारा काम था. सामने से आने वाली तालियों और गालियों की गूँज से बेफ़िक्र था ऐसा कहना, जीवन से इतर होकर अपने आप में गुम हो जाने जैसी बात होगी.

शंका,डर और उत्तेजना एक साथ में मेरे ऊपर सवार थी. इसका एक कारण यह भी था कि पहले मुझे ही मंच पर उतरना था. नयनीश का मंचन मेरे बाद होने वाला था और इसी वजह मेरा रक्तचाप बढ़ता हुआ सा महसूस हो रहा था. यहाँ मैं थोड़ा स्वार्थी हो रहा हूँ. नयनीश की अनुभूतियों को सच कहूँ तो मैं नहीं जान सकता हूँ. मुझे अपनी अनुभूतियाँ भी धुँधली सी ही नज़र आ रही थीं क्योंकि सच यही है कि परीक्षा के समय सब केवल अपनी ही उत्तर पुस्तिका में लिखते हैं.

मंचन का समय आ गया. आज भी भौमिक दादा द्वारा मंचन से ठीक पहले पीठ ठोंककर आशीर्वाद देना याद है. मैं अपनी सारी उत्तेजना को दबाकर असमंजस बाबू में ही खो चला था. पहली बेल बजी तो मैं ग्रीन रूम से निकलकर विंग में खड़ा हो गया. आसपास सहकलाकार थे. नयनीश भी था. मैं उससे ज़ोर से गले मिला और सच कहूँ तो अन्दर ही अन्दर हँस पड़ा था. मुझे याद आया कि क्या विडम्बना है? एक असमंजस बाबू दूसरे असमंजस बाबू से गले मिल रहा है. दूसरी बेल बजी तो मैं सभी से अलग हुआ और मंच पर क़दम रखने को तैयार हो गया.

और फिर वह समय आ ही गया जब तीसरी बेल बजी. मैं चुपचाप मंच के बीचोबीच जाकर बैठ गया ठीक वहीं जहाँ मार्किंग की गयी थी. मेरे ऊपर एक स्पॉट लाइट ऑन हुई और मैंने अपनी पूरी ऊर्जा के साथ चिल्लाकर कहा कि मैं कुत्ता नहीं बेच सकता . और नाटक शुरु हो गया. और तब से लेकर आज तक मैं असमंजस बाबू के मंचन की नहीं बल्कि मंचनों की प्रक्रिया में हूँ.

आज असमंजस बाबू के शोज़ के दौरान यादगार लम्हों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है लेकिन कुछ ऐसी बातें हैं या घुमा फिराकर हम तक पहुँची ऐसी बातें हैं जो याद आते ही मन को गुदगुदा जाती हैं.

रायपुर छत्तीसगढ़ में सुभाष मिश्रा द्वारा आयोजित किये जाने वाले मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह में हम असमंजस बाबू का मंचन करने पहुँचे थे. पिछले सालों में उस समारोह में हमारी संस्था समानान्तर इलाहाबाद से वहाँ पहले भी दो नाटक नन्हें कन्धे-नन्हें पैर और सुशीला मंचित किये जा चुके थे.

शो से पहले भौमिक दादा ने मुझसे कहा कि अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी बढ़ गयी है क्योंकि तुम्हें संस्था के पिछले प्रतिमानों को नया एवं विकसित स्वरूप देना है. दूसरी तरफ़ उसी समारोह के दौरान हमारी अख़्तर अली से पहली मुलाक़ात हुई जिन्होंने असमंजस बाबू का नाट्य रूपान्तरण किया है.

इससे पहले उनसे केवल टेलीफ़ोन पर बात हुई थी. नाटक देखने के बाद उनकी यही प्रतिक्रिया थी कि इससे पहले भी लोगों ने असमंजस बाबू का मंचन किया है. लेकिन यह मंचन न केवल सबसे अलग हटकर है बल्कि सबसे अदभुत है. असमंजस बाबू का ऐसा फ़ॉर्म भी हो सकता है, मैंने सोचा भी नहीं था. उसी समारोह में भारतेन्दु नाट्य अकादेमी, लखनऊ के प्रवक्ता श्री जुगल किशोर भी आये हुए थे. वो भी यह नाटक देखकर प्रसन्न हुए थे और उन्होंने कहा था कि इसे एक बार भारतेन्दु नाट्य अकादेमी के बच्चों को दिखाना है.

श्री जुगल किशोर ने जब लखनऊ में संवाद नामक कार्यक्रम आयोजित किया तो कार्यक्रम का पहला शो असमंजस बाबू ही था. इसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक राम गोपाल बजाज ने देखा तो अभिभूत हो गये. यह बात हम तक वाया वाया पहुँची थी. उन्होंने किसी कमल नाम के रंगकर्मी अथवा रंगप्रेमी से फ़ोन करके कहा था कि कमल, मैंने तुमसे कहा था न… अभिनेता की मंच पर वापसी होगी. आज असमंजस बाबू देखकर मुझे पता चल गया है. अभिनेता वापस आ गया है.

लेकिन फिर भी, आज जब असमंजस बाबू नाटक के देश-विदेश में चौसठ शोज़ हो चुके हैं और मैं पैंसठवें मंचन की तैयारी में हूँ, अगर कोई कहे कि अपने संस्मरणों के झरोखे में जाओ और देखो सुनो तो सबसे महत्वपूर्ण क्या मिलेगा? मैं सीधे सपाट तरीके से, बिना किसी झिझक या असमंजस के कह सकता हूँ कि मेरे नाटक असमंजस बाबू के मेरे पहले मंचन का वो ऊर्जावान पहला डॉयलॉग कि मैं कुत्ता नहीं बेच सकता की गूँज मुझे आज भी सबसे साफ़ और सबसे ज़्यादा सुनाई पड़ती है.

नोट – शायद मेरा यह अनुभव पढ़कर रंग जगत के बहुत सारे विशेषज्ञों की यह प्रतिक्रिया मिले कि मैने इसमें मंचन की कहानी से अधिक अपने मन में चल रही उठापटक को ज़्यादा पेश किया है तो मैं उन सभी महानुभावों से क्षमा माँगते हुए अपना यह विचार उनके समक्ष रखना चाहूँगा कि बाहरी आवरण या साज सज्जा या वेश-भूषा या रंगदीपन या आहार्य सामग्री या रंगसंगीत एक अभिनेता के सजग सहयोगी के रूप में होते हैं लेकिन असली रंगकर्म तो मन में चलता है.

इसीलिए मैंने मन में चल रही उठापटक को ज़्यादा रेखांकित किया है. पुन: एक बात ध्यान देने योग्य और है. इस आलेख के अन्तिम भाग में इसके मंचन के दौरान विशेषज्ञों द्वारा इस नाटक की जो प्रशंसा की गयी, उसे भी रेखांकित किया गया है. कृपया उसे आत्मप्रशंसा या आत्ममुग्धता के रूप में न लें क्योंकि यह बातें पूरी तरह से सच हैं. न इसमें कुछ छिपाया गया है और न जोड़ा गया है. मैंने केवल आप सभी के साथ अपने अनुभवों का साझा किया है, उससे इतर कुछ भी नहीं.

– राकेश यादव (असमंजस बाबू)

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