असमंजस में छोड़ने वाला असमंजस बाबू – 2

बचपन में जब मदारी बन्दर को लेकर खेल दिखाने आता था तो मैं असमंजस में पड़ जाता था. समझ नहीं पाता था कि कलाकार कौन है? बन्दर या मदारी? बन्दर कलाकार है तो मदारी का क्या काम? मदारी कलाकार है तो क्या बन्दर मदारी की आहार्य सामग्री है?

लेकिन आज यह प्रश्न निरर्थक लगता है. आज महत्वपूर्ण यह लगता है कि हमारा दृष्टिकोण क्या है. आज लगता है कि न मदारी बन्दर को नचा रहा है और न बन्दर मदारी के इशारों पर नाच रहा है.

भूख और ज़रूरतें दोनों को नचा रही हैं और हमारी मानसिक भूख हमें मजबूर कर रही है कि इन्हें नाचते नचाते हुए देखें. हाँ जी, मनुष्य इतना असहाय है कि मजबूर हो ही जाता है और सच कहें तो भूख और मजबूरी एक दूजे की हमशक्ल होती हैं.

यह सब बातें पहले मुझे समझ में नहीं आती थीं. पहले मुझे लगता था कि विचार और व्यवहार में चिरंतन फ़ासला है. उतना ही फ़ासला जितना हमारी दृष्टि और क्षितिज में होता है. लेकिन जब पहली बार मैं रंगमंच की दुनिया से परिचित हुआ तो लगा कि व्यवहार अगर पृथ्वी है तो विचार गुरुत्वाकर्षण है.

विचार ही वो शक्ति है जो व्यवहार की दिशा में हमें खींचकर ले जाती है. और इसी व्यवहार ने मुझे असमंजस बाबू की विचार प्रक्रिया को समझने में, या यूँ कहें कि पूरी साफ़ग़ोई से समझने में मदद की.

असमंजस बाबू के मंचन की ये कहानी पढ़ने के बाद शायद लोग मुझ पर ये आरोप लगाएँगे कि मैंने मंचन की कहानी लिखने में भी असमंजस बाबू कहानी की शैली का ही प्रयोग किया है और उन लोगों से पहले ही मैं इस आरोप को सच मानने के लिए तैयार हूँ.

मैं आपको बताना चाहूँगा कि इस आरोप को स्वीकार करने का कारण भी यही है कि अगर असमंजस बाबू कहानी की शैली में इसके मंचन की कहानी लिखने का विचार, ज़्यादा व्यावहारिक लग रहा है तो क्यों न लिखूँ?

और मैं इस बात की औपचारिक घोषणा करता हूँ कि असमंजस बाबू के मंचन की यह कहानी तब तक मौलिक रहेगी जब तक हमारे अन्दर का असमंजस बाबू, हमारे मन में विचरण कर रही क्षुद्रताओं से ताल ठोककर मल्ल युद्ध करता रहेगा.

इस औपचारिक घोषणा के बाद आइये आपके साथ असमंजस बाबू की मंचन प्रक्रिया के थोड़े अनुभव बाँट लिये जायें क्योंकि तभी हम ज़िम्मेदार कहलाएँगे और अपनी ज़िम्मेदारी निभाना और पूरी निष्ठा के साथ निभाना ही असमंजस बाबू की लोगों से पहली और आख़िरी बार शर्त हुआ करती है.

जब मैं रंगमंच के क्षेत्र में उतरा तो सबसे पहली मुलाकात हुई समानान्तर के भौमिक दादा (श्री अनिल रंजन भौमिक, वरिष्ठ रंगकर्मी इलाहाबाद) से. उनके साथ जहाँ मैंने इलाहाबाद के रंगकर्म की बारीकियाँ जानीं, वहीं दूसरी तरफ़ भौमिक दादा के सानिध्य में हिन्दी रंगमंच और विश्व रंगमंच के विषय में भी बहुत कम समय में बहुत ज़्यादा जानने को मिला.

साथ ही साथ रंगकर्म के जीवन और जीवन के रंगकर्म को गूढ़ता से समझने और रंगकर्म के बरक्स जीवन की विचारधारा को स्वयं के लिए विकसित करने की पगडंडियाँ ढूँढ़ने में मैं व्यस्त हो चला था कि इसी बीच एक ऐसा पड़ाव आया जिसने मुझे झिंझोड़कर रख दिया. वो पड़ाव था असमंजस बाबू कहानी.

इससे पहले डॉ. राही मासूम रज़ा की चर्चित कृति टोपी शुक्ला जिसे भौमिक दादा निर्देशित कर रहे थे, उसका एक हिस्सा मैं भी हुआ करता था. इस बीच दादा ने हम कई लोगों से विचार विमर्श के दौरान यह बात सामने रखी कि उन्हें एक एकल प्रस्तुति तैयार करवानी है.

इसके लिए एक सही कृति की तलाश शुरु की गयी. कई अतुलनीय कृतियों से गुज़रते हुए हम सत्यजित रे की कहानी असमंजस बाबू जिसे अख़्तर अली द्वारा नाट्यान्तरण किया गया था, पर आकर ठहर गये थे.

सह-कलाकारों का ऐसा भी कहना था कि हम और भी खोजबीन कर सकते हैं लेकिन मुझे इस कहानी को पढ़कर ऐसा लगने लगा था कि यही करना उचित होगा. उधर भौमिक दादा के चेहरे के भाव देखकर भी मुझे अहसास होने लगा था कि उनकी तलाश पूरी हो चुकी है.

इस बीच मैंने चुपके से एक दिन उनसे पूछ लिया था कि यह नाटक आपको मिला कहाँ से? दादा ने मुझे बताया कि जब मैं अंकुर जी (श्री देवेन्द्र राज’अंकुर’ पूर्व निदेशक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) के पास जाता था तो वो अक्सर अपने किताबों के रैक की तरफ़ इशारा करके कहते थे कि इसमें से जो अच्छा लगे तुम ले लो.

उस असमंजस बाबू नाम ने मुझे बहुत आकर्षित किया था इसीलिए मैंने यह स्क्रिप्ट उठा ली थी. बहरहाल, असमंजस बाबू की मंचन प्रक्रिया की आगे की कहानी कहने से पहले मुझे लगता है कि जिन लोगों ने यह प्रस्तुति नहीं देखी है अथवा जिन लोगों ने इस कहानी को नहीं पढ़ा है, उन्हें इस कहानी की एक अति संक्षिप्त व्याख्या करना अच्छा होगा.

असमंजस बाबू का नाम असमंजस था लेकिन वो अपने विचारों में पूर्णतया स्पष्ट थे.क्या होता है से इतर क्या होना चाहिए पर वो इतने अडिग थे कि लोग उनसे कतराने लगे और वह घर-परिवार- समाज से पूरी तरह कट गये.

गृहस्थ जीवन के लिए कोई न मिला तो उन्होंने अपना अकेलापन भरने के लिए एक कुत्ता पाला. कुत्ता उनसे भी विलक्षण था क्योंकि वो हँस सकता था लेकिन वाजिब बात पर. ख़बर फैली तो विलक्षण चीज़ों का संग्रहण करने वाले एक व्यक्ति ने उसे कुत्ते के बदले बीस लाख की रक़म देने की पेशकश की और जीवन में पहली बार अडिग असमंजस बाबू का ईमान डिग गया.

बहुत कोशिशों के बाद भी ग्राहक के सामने कुत्ता नहीं हँसा. फिर भी ग्राहक ने बीस लाख का चेक असमंजस बाबू को थमाया और अभिभूत असमंजस बाबू चेक को सीने से लगाकर चूमने लगे और कुत्ता हँस पड़ा. तब असमंजस बाबू को समझ में आया कि कुत्ता उनके चारित्रिक पतन को देख हँस पड़ा है और उन्होंने कुत्ता बेचने से इन्कार कर दिया.

सुख और खुशी के भेद तथा चारित्रिक पतन और सामाजिक पतन की सीमारेखा को बारीकी से समझाने वाली इस कहानी पर अब भौमिक दादा ने काम करने का निश्चय कर लिया था और सौभाग्यवश उन्होंने मुझे और मेरे एक सहकलाकार नयनीश मिश्रा को असमंजस बाबू के नाट्यान्तरण को कंठस्थ करने को कहा और साथ में यह चुनौती दी कि जो भी इसे अच्छी तरीके से तैयार करेगा,वही इसके मंचन का हक़दार होगा.

यह वही समय था जब मैं प्रयाग संगीत समिति से कथक नृत्य में प्रभाकर कर रहा था. इस बीच दादा के निर्देशानुसार मैंने श्री देवेन्द्रराज अंकुर द्वारा शुरु की गयी कहानी के रंगमंच की परम्परा और उसकी शैली पर काफ़ी अध्ययन किया. हालाँकि अख़्तर अली द्वारा इसका नाट्यान्तरण ही हमारी प्रस्तुति का आधार होने वाला था लेकिन स्क्रिप्ट में बहुत कुछ ऐसा था जो कहानी के रंगमंचके काफ़ी करीब था.

नयनीश और मैंने अब असमंजस बाबू की स्क्रिप्ट को बहुत सधे हुए ढंग से कंठस्थ कर लिया था. जिन्होंने भी रंगमंच की दुनिया से थोड़ा भी वास्ता रखा है उन्हें पता ही होगा कि पूर्वाभ्यास के शुरुआती दिन कितने ऊबन भरे होते हैं लेकिन मैं ईमानदारी से कहना चाहूँगा कि असमंजस बाबू के पूर्वाभ्यास के शुरुआती दिन ऊबन भरे नहीं थे.

एक छ्टपटाहट थी, एक तड़प थी, एक बेचैनी थी, जो लगातार हमें मथ रही थीं. मैंने दादा के चेहरे पर ऐसा विचलन इससे पहले कभी नहीं देखा था. ख़ैर, पूर्वाभ्यास धीरे-धीरे गति पकड़ने लगा था.यह वही समय था जब मैंने अपने अन्दर परिवर्तन महसूस करना शुरु कर दिया था.

मुझे आज भी याद है कि मेरे दसवीं कक्षा के इतिहास के अध्यापक जब अतीत में हुई किसी बहुत बड़ी घटना का ज़िक्र करते थे तो उससे पहले एक स्लोगन बोलते थे कि परिवर्तन के सिवाय सबकुछ परिवर्तनशील है. लेकिन उस ख़ास समय में मैं अपने अन्दर हो रहे परिवर्तन को ठीक से इंगित नहीं कर पा रहा था.

मेरे रंगमंच के शुरुआती दिनों में एक बार दादा ने बोला था कि अक्सर हम जिस चरित्र को निभा रहे होते हैं उसकी बहुत सारी अच्छाइयों, बुराइयों और कभी-कभी तो उसकी स्थितियों-परिस्थितियों से ख़ुद भी प्रभावित हो जाते हैं. लेकिन पहली बार मुझे समझ में आया था कि हम जो चरित्र निभा रहे होते हैं कभी कभी उसकी विचारधारा को भी अपने अन्दर उतार लेते हैं और वही समय था जब बिल्कुल असमंजस बाबू की तरह लोग मुझसे कटने लगे थे क्योंकि मैं अपनी बेतक़ल्लुफ़ बेबाक विचारधारा लोगों के समक्ष रखने लगा था.

इससे उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को हानि पहुँचने लगी थी. यहाँ तक कि मुझसे सम्बन्धित ऐसे लोग जो अपनी ग़लत चीज़ों को तर्क के आवरण में सही साबित करते थे, मैं उन्हें सरेआम सच के कटघरे में खड़ा कर देता था. भौमिक दादा भी इस चीज़ को नोटिस कर चुके थे इसीलिए एक दिन पूर्वाभ्यास के समय नयनीश और मुझे उन्होंने समझाते-समझाते एक बात बोली कि असमंजस बाबू के चरित्र को समझना पड़ेगा.

व्यावहारिक जीवन में क्या हमें ऐसा हो जाना चाहिए, इस पर भी विमर्श करना होगा. यह भी सोचना होगा कि क्या कुत्ता बेचने का फ़ैसला करने से पहले असमंजस बाबू बिल्कुल सही और सटीक थे. घर-परिवार और समाज अगर किसी से कटते जा रहे हैं तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि पूरी तरह सही होते हुए भी वह व्यक्ति एक ऐसे पहलू से जुड़ गया है जिससे वह पूरी तरह ग़लत होता जा रहा है.

इसके बाद दादा ने फिर से पूर्वाभ्यास करवाना शुरु कर दिया लेकिन यह बात मेरे मन में घर कर गयी थी. पूर्वाभ्यास के बाद, सीधे-सीधे तो नहीं, लेकिन घुमा-फिराकर मैंने इस मुद्दे पर नयनीश से विचार-विमर्श किया. अगले दिन जब हम पूर्वाभ्यास स्थल पर पहुँचे तो दादा ने बात-बात में ही पूछ दिया कि कल मैंने जो बातें कही थीं, उस पर तुम दोनों ने कोई विचार-विमर्श किया है?

नयनीश और मैं दोनों ही इस बात से स्तब्ध रह गये थे कि दादा ने ऐसा क़यास कैसे लगा लिया भला? हम दोनों ने उन्हें अपने विचार विमर्श के बारे में बताया तो उन्होंने पूछ लिया कि तुम लोगों ने यह सब बातें सीधे- सीधे क्यों नहीं कीं. इतना घुमा-फिराकर क्यों?

हम दोनों कुछ कहते इससे पहले ही दादा फिर बोल पड़े कि इसी जगह पर असमंजस बाबू ग़लत थे. इस बात से असमंजस बाबू का क्या सम्बन्ध है यह हम दोनों को नहीं समझ में आया. भौमिक दादा ने अपनी बात थोड़ी और साफ़ करते हुए कहा कि शब्दों के अर्थ से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है उनका तात्पर्य. एक वाक्य के शब्दों के बीच जो अनकहा रह जाता है तात्पर्य वहीं से मिलता है.

कहानीकार ने असमंजस बाबू का जो चरित्र विकसित किया है उसमें साफ़तौर पर यह बताया है कि असमंजस बाबू हमेशा शब्दों के उस भाग को कहते थे जो सीधे तात्पर्य को सामने रखता था. अर्थ का भाग बीच से नदारद था.

बात सीधे सादे ढंग से कही ज़रूर जाती थी लेकिन लोगों के मन पर सीधे चोट करती थी और लोग उनसे कटे कटे रहने लगते थे. सपाट लहजे में कहें तो असमंजस बाबू की बात जितनी सही होती थी, उसके कहने का तरीक़ा उतना ही ग़लत होता था.

समाज अपने बने बनाये ढर्रे को धीरे-धीरे तोड़ता हुआ आगे बढ़ता है जिसे विकास कहते हैं. अगर हमें उसके चरित्र को बख़ूबी दिखाना है तो उसकी विचार प्रक्रिया से अर्थ को नदारद करके तात्पर्य को सामने रखना होगा लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारे जीवन से सम्बन्धित शब्दों और उनके तात्पर्यों के बीच बने हुए अर्थ के पुल टूट जायें. अगर पुल टूटेंगे तो सबसे पहले बात कहने वाला ही चोट खायेगा. दादा की इस बात से मुझे यह पता चला कि एक अभिनेता के लिए चरित्र एक वेषभूषा की तरह होना चाहिए. अगर चरित्र की आत्मा को हम अपनी आत्मा बना लेंगे तो दुर्घटना होने की पूरी संभावना है.

(क्रमशः)

– राकेश यादव

असमंजस में छोड़ने वाला असमंजस बाबू – 1

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