हम अपने भगवान से सीधे क्यों नहीं मिल सकते?

हम हतभाग्य हिंदुओं ने अपने मंदिरों का क्या हाल किया है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है. वैद्यनाथ धाम (देवघर) जब मैं तीन साल पहले गया था, तभी इस पर लिखा था.

हालांकि, मुझे लगता था कि यह बीमारी उत्तर भारत की ही है, लेकिन महाराष्ट्र ने भी मुझे निराश नहीं किया. देवघर हो या बनारस, काशी विश्वनाथ हो या बाबाधाम, इन मंदिरों को देखकर तो यही लगता है कि यहां बाक़ी जो कुछ भी हो, महादेव तो नहीं ही होंगे.

आप जैसे ही इन जगहों पर घुसेंगे, पंडों के नाम पर गुंडों का दल आपको चारों तरफ से घेरने की कोशिश करेगा, उनसे अगर बच गए तो पान-सुपारी, फूलवाले ऐसे आप पर लपकेंगे, जैसे आप जरायमपेशा हों और वो पुलिसवाले.

सबसे बचते-बचाते या उनका ‘गुंडा टैक्स’ देकर, भक्तों (?) की भारी भीड़ चीरकर जब आप मंदिर के गर्भगृह के पास पहुंचेंगे तब तक पैरों में दूध, मिठाई, पानी, बेलपत्र, चावल सब कुछ चिपक जाएगा, चिप-चिप से आपका मन घिना जाएगा और जब तक आप बाबा के पास पहुंच कर कुछ ध्यान में जाने की कोशिश करेंगे, तब तक पीछे से गुंडों का वही सरदार (जिसे पंडित या पंडा भी कहते हैं) चलो आगे, बढ़ो आगे का नारा बुलंद कर देगा.

हम हिंदुओं को दुनिया में सबकुछ देनेवाले भगवान को मिठाई चढ़ाना क्यों जरूरी है, यह मैं तो नहीं समझ पाया, भोलेनाथ समझें हों तो उनकी वो जानें.

त्र्यंबकेश्वर सफाई के मामले में ठीक है, लेकिन गुंडई यहां भी चरम पर है. ऑटो वालों का घेरा पहला होता है, उसे तोड़ने के बाद आपको मोबाइल रखनेवाले, फूल देनेवाले मिलेंगे, तीसरा घेरा पंडों का होता है.

एक और मज़े की बात है कि यहां वीआईपी पास 200 रुपए में मिलता है. वाह रे मेरे देश! भगवान को भी कब्जा लिया, उनका भी दाम लगा दिया. ऊपर से अगर आप कुछ और दे देंगे, तो आपको सीधे पश्चिमी दरवाज़े से ले जाकर सीधा गर्भगृह के सामने खड़ा भी कर देंगे, पूजा भी करवा देंगे.

गर्भगृह में महिलाएं नहीं जा सकतीं, लेकिन पुरुष चाहे तो सुबह 6 से 7 के बीच पीतांबरी पहनकर पूजा कर सकता है. हालांकि, भगवान और भक्त यहां भी सीधे नहीं मिलेंगे, दलाल (पंडा) होना ज़रूरी है, वरना यह भी संभव नहीं.

मैं देवघर मंदिर तक पहुंचकर खिन्न होकर अंदर नहीं गया था. तुंगनाथ के आधे रास्ते से महादेव ने लौटा दिया, लेकिन इस बार शायद वह यही सब दिखाना चाहते थे. अस्तु, यह व्यवस्था सरकारी है.

कांग्रेसियों-कम्युनिस्टों ने इस देश की आत्मा तक के साथ बलात्कार किया है. सभी हिंदू मंदिरों पर इन्होंने सरकारी कब्ज़ा कर दिया है. ये सारे Rates भी सरकारी हैं. हम जब पूजा में लीन थे, तो अचानक 10 मिनटों के लिए सारी पंक्तियों, सारे कर्मकांड को रोक दिया गया. वजह, सबसे बड़ा पंडा (यानी सरकार की तरफ से नियुक्त) पूजा करने आ रहा था.

हमारे मंदिर हमारे कब्जें में क्यों नहीं हैं? हमें क्यों सरकार या पंडों की दलाली झेलनी पड़ती है? हम अपने भगवान से सीधे क्यों नहीं मिल सकते हैं? सरकारों ने क्या मस्जिदों और चर्चों की व्यवस्था की है? तो फिर…….

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