हम फिर से जन्मेंगे, मिलने के लिए

जब वक़्त हमसे प्रेम में
थोड़ी और मोहलत मांग सकता था
घड़ी अपने चौबीसवें चक्कर के बाद
सुस्ताने का नाटक कर सकती थी

हम छह जन्मों की दूरी लिए अगल बगल
ग्यारह क़दम बेजा और टहल सकते थे
शहर की ढलती शामों पी सकते थे
ढाई फूंक में एक साथ

जिस वक़्त में हम गुलमोहर की पंखुड़ियां तोड़ते हुए
खेल सकते थे लव्स मी एंड लव्स मी नॉट

उस वक़्त में हम हैरान थे सिमोन की कहानियों से
स्वीकार रहे थे अपने रक़ीबों को अपने हिस्से की तरह

गोदांग गरम उँगलियों में फंसाये
प्रीतम इमरोज़ घुलते थे नसों में

उस वक़्त में तुमने मेरे तलुवों में
न चुकने वाली यात्राएं लिख दीं
घाटियां उगाईं और पहाड़ बूढ़े किये

इनमें कई शहरों के सूरज ढले
उनके चाँद लुढ़के
काशी के घाट लिखे
ये अँधेरे में घर से निकलते बुद्ध की पीठ भी बने

हाईवे इनकी रेखाएं बनकर जवान हुए
और समंदर सप्तपदी हो गए

जैसे दायें तलुवे में मरघट स्थापित कर
दिखा दी हो कि मोक्ष की लक़ीर बाएं से ही गुज़रेगी

हम अपनी अपनी शव यात्राएं तय कर चुकने के बाद
तुम्हारे मेरे हिस्से के मील के पत्थर
कन्धों पर उठाये
फिर से जन्मेंगे
मिलने के लिए

तुमने मेरे तलुवों में
अनंत यात्राएं लिख दीं
जबकि उस वक़्त में तुम मेरी स्थिरता
मेरे पड़ाव हो सकते थे

– मृग तृष्णा

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY