ये सूट-बूट और पकौड़े जैसे मुद्दों में दम नहीं, कुछ सॉलिड लाओ यार

बड़ा सूना सूना सा लग रहा है. कल से फेसबुक से सारे काँग्रेसी मित्र गायब हैं. उनसे कहना चाहूंगा कि ऐसी भी क्या नाराजगी दोस्तों, हार की आदत डाल लो फिर कष्ट नहीं होगा.

चलो एक अनुभव बताता हूँ. 1977 में मैं पहली बार वोट काउंटिंग में गया था.

यदि आप ने ना देखा हो तो बता दूँ कि बांस बल्लियों का एक बाड़ा सा बनाया जाता है, उसके भीतर चरों तरफ काउंटिंग की टेबल होती हैं और बाहर सभी पार्टियों के एजेंट देख पाने जितनी दूरी पर बैठते हैं.

सभी पार्टियों के एजेंट्स को पास दिए जाते हैं और उन्हें किसी भी प्रकार का ऐतराज़ या शंका जाहिर करने का अधिकार होता है.

आजकल वोटिंग मशीन के चलते एक दिन में काउंटिंग समाप्त हो जाती है किन्तु उस समय पहले सारी पेटियां खोली जाती. फिर 25-25 के बण्डल बनाकर एक बड़े बक्से में भरे जाते.

इस काम में रात के 11-12 बज जाते थे. यानि सुबह शुरू हुई काउंटिंग में अक्सर आधी रात को टेबल पर वोट खुलनी शुरू होती थीं. अक्सर अंतिम परिणाम आने में 48 से 60 घंटे लगते थे.

खैर, 1977 की काउंटिंग शुरू हुई तो आगे की कुर्सियों पर कांग्रेस के उम्मीदवार बी पी मौर्य और उसके डमी के एजेंट्स ने कब्ज़ा कर रखा था.

मैंने विनम्रता से कहा कि हमें कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. प्लीज़ हमारा भी एक आदमी आगे आने दो तो उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया.

आप उस काल की कल्पना कीजिये कि ताज़ा ताज़ा इमरजेंसी ख़त्म हुई थी. कांग्रेस के लोगों का आत्मविश्वास चरम पर था. लगातार सत्ता में रहते वो हार की कल्पना भी नहीं कर सकते थे.

मैंने दोबारा कहा तो मुरादनगर की एक महिला नेता बिफर गईं. कहने लगी “अरे क्या करोगे देखकर. हर बार मुँह पिटवाकर जाते हो. आप लोगों को शर्म तो आती नहीं है. मुँह उठाये चले आते हो रिज़ल्ट देखने. अरे ये देश इंदिरा जी का है और उनका ही रहेगा. आदत डाल लो हारने की.”

मुझसे उम्र में दुगनी थीं और कई झक सफ़ेद खद्दरधारी उनके साथ थे तो हम मन मसोस कर रह गए और धीरे से कहा “हमें तो आदत है हारने की, मगर बहन आप हार गए तो आप का क्या होगा.”

रात 12 बजे देश भर से परिणाम आने शुरू हुए. डिब्बों में से तूफ़ान निकला था. पूरे देश में जनता पार्टी का परचम लहरा गया था. इंदिरा गाँधी खुद हार गईं.

अब मैं उन महिला और खद्दरधारी नेताओं को ढूंढने लगा और बाहर तक गया. कहीं नहीं मिलीं. रात के 2 बजे कई हज़ार आदमी काउंटिंग स्थल के बाहर नारे लगा रहे थे “एक काँग्रेसी बताओ, सौ रुपये पाओ.” किन्तु… किन्तु…

मात्र 29 महीने में जनता पार्टी टूट गयी और दोबारा कांग्रेस सत्ता पर विराजित हो गई थी.

सो भैया, हमें तो जीत हार दोनों सहज ही सुपाच्य हैं. आप राजस्थान और मध्यप्रदेश का उपचुनाव जीतकर उत्सव मन रहे थे तब भी हम सामान्य थे और आज भाजपा के मुकट में पूर्वोत्तर के दो हीरे और जड़ गए हैं तब भी सामान्य हैं.

हाँ अंत में एक बात और, ये सूट बूट और पकौड़े जैसे मुद्दों में दम नहीं है. कुछ सॉलिड लाओ यार.

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