‘बहिरागत’ से ‘चोलो पलटई’ तक : क्षेत्रीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एकीकृत राष्ट्रवाद में स्थापन-काल

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद.. दो में सत्ता हासिल करने और मेघालय में अपनी सार्थक सत्तात्मक उपस्थिति के साथ सत्तारूढ़ कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाती दिख रही बीजेपी की यही भर उपलब्धि नहीं है.

त्रिपुरा में 25 सालों से सत्ता में रही वामपंथी विचारधारा पर राष्ट्रवाद की विजय, इस चुनावी जीत को दूसरे मुकाम और क्षितिज पर ले जाती है; जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाजपा ने चुनावी जीत के रूप में हासिल कर जनमत संग्रह के जरिये राष्ट्रवाद को स्थापित किया.

विपक्ष और खास तौर पर वामपंथी त्रिपुरा के चुनाव के दौरान भाजपा पर आरोप लगाते रहे कि उन्होंने इंडीजेनस पीपुल्स फ्रंट आफ त्रिपुरा (आईपीएफटी), इंडीजेनस नेशनलिस्ट पार्टी आफ त्रिपुरा (आईएनपीटी) से चुनावी गठजोड़ कर राज्य की पृथकतावादी सोच के लोगों से हाथ मिलाया है.

‘भारत तेरे टुकड़े होंगे.. भारत की बर्बादी.. हर राज्य मांगे आज़ादी’ के नारों की धनी रही वाम विचारधारा अगर आज पृथकतावादी सोच के खिलाफ मुंह खोलती नजर आ रही है, तो इससे बड़े अच्छे दिन भला क्या हो सकते हैं.

फिर भी इस आरोप को सहज टाला नहीं जा सकता, इस आरोप को गंभीरता से समझने की जरूरत है.

त्रिपुरा और पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में राष्ट्रवाद की स्थापना के इस स्वर्णिमकाल के मर्म को समझने की जरूरत है.

बेशक यह चुनावी जीत कुछ सालों की ज़मीनी मेहनत और बीजेपी के वर्तमान कुशल नेतृत्व, केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामर्थ्यवान व्यक्तित्व की जीत दिखती है, लेकिन इस खिलते कमल की ज़मीन दशकों पुरानी है.

आइये पूर्वोत्तर में राष्ट्रवाद की स्थापना के द्वार असम की ओर चलते हैं.

असमिया राष्ट्रवाद की उपज ‘बहिरागत’ आंदोलन के साथ सांस्कृतिक संगठन के तौर पर आरएसएस का शुरूआती दौर से जुड़ाव और राजनैतिक मोर्चे पर भाजपा के साथ… तीन दशकों के ज़मीनी काम ने असम के क्षेत्रीय सांस्कृतिक राष्ट्रवादी आंदोलन बहिरागत को असम में भारतीय राष्ट्रवाद के रूप में स्थापित किया.

सांस्कृतिक ज़मीन पर राजनैतिक सक्रियता के जरिये.. सकारात्मक और क्षेत्रीय असमिया सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को शासन-सत्ता का बल देने के काम में भाजपा ने खुद को तैयार किया और असम राजनैतिक सत्ता में राष्ट्रवादी सरकार देख रहा है.

इस सबके बीच जो बेहद महत्वपूर्ण बात है… कि क्षेत्रीय राष्ट्रवाद जैसे आंदोलन से निकली असम गण परिषद और आज़ादी से पहले से वजूद में रहे असम छात्र संगठन ‘आसू’ से निकले इसके नेता प्रफुल्ल कुमार मोहंती वैचारिक तौर पर इस सत्ता के साथ हैं.

यह कोई छोटा संकेत नहीं है. 1971 की जनगणना में जब असम में असमी मूल, असमी भाषी लोगों की जनसंख्या 49% रह गयी तब पहली बार असम का ध्यान इस क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान पर खड़े संकट पर गया.

जनसंख्या में होने वाले इस बदलाव ने मूलवासियों में भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा की भावना पैदा कर दी. इसने असम के लोगों, और ख़ास तौर पर वहाँ के युवाओं को भावनात्मक रूप से उद्वेलित किया.

असम के लोगों को लगने लगा कि बाहरी लोगों, ख़ास तौर पर बांग्लादेशियों के कारण वे अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन जाएँगे जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर उनकी कोई पकड़ नहीं रह जाएगी.

असम में बाहरी लोगों के खिलाफ शुरू हुआ ‘बहिरागत’ आंदोलन जिसे असम आंदोलन के रूप में जाना गया और केंद्र की राजीव गांधी की सरकार के साथ एक समझौते पर खत्म हुआ.

असमी क्षेत्रवाद के इस आंदोलन के विरोध के दायरे में बंगाली, बिहारी मूल के लोग भी रहे और सकारात्मक बात यह कि इस आंदोलन को गैर असमी लोगों का समर्थन भी मिला.

दमन और क्रूर चुनावी हिंसा के लंबे दौर को सहते हुए लोकतांत्रिक दायरे में बने रहे इस आंदोलन ने अपनी राजनैतिक जीत भी हासिल की और 1985 के असम विधानसभा चुनावों में असम गण परिषद की सरकार बनी.

कैसे एक क्षेत्रीय सांस्कृतिक अस्तित्व से जुड़ा आंदोलन, जो अपने मुकाम पर आकर भारतीय राष्ट्रवाद में स्थापित हुआ… वह एक अलगाववादी, देश तोड़क और राष्ट्रविरोधी आंदोलन भी हो सकता था इसे देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नही.

उदाहरण असम में ही मौजूद है, समकालीन है यानि लगभग एक ही समय का है, जिसे देखना बेहद जरूरी और दिलचस्प होगा.

सत्तर के दशक के अंतिम और अस्सी के दशक के शुरूआती सालों में इसी असम की ज़मीन से, असमी राष्ट्रीयता के ही नाम पर एक और आंदोलन और संगठन का उदय होता है : ‘उल्फा’.. पूरा नाम यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम.

उल्फा वैचारिक तौर पर वामपंथी दर्शन से करीबी रखता है. सैन्य संघर्ष के जरिए संप्रभु समाजवादी असम को स्थापित करने के मकसद से भीमकांत बुरागोहेन, राजीव राजकोन्वर उर्फ अरबिंद राजखोवा, गोलाप बारुहा उर्फ अनूप चेतिया, सामिरन गोगोई उर्फ प्रदीप गोगोई, भद्रेश्वर गोहेन और परेश बरुहा ने 7 अप्रैल 1979 में सिबसागर के रंग घर में उल्फा की स्थापना की.

1986 में उल्फा का संपर्क नैशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (एनएससीएन) और म्यांमार में सक्रिय संगठन काछिन रेबेल्स से हुआ. 1989 में इसे बांग्लादेश में कैंप लगाने की छूट मिल गई और 1990 के आते-आते उल्फा ने कई हिंसक वारदातों को अंजाम दिया.

आज उल्फा एक आतंकी संगठन के तौर पर स्थापित है और वाम दर्शन के सानिध्य में हिंसा, अलगाववाद की वैचारिक जुगाली खा-कमा रहा है… शेष सभ्य समाज से बहिष्कृत.

यह बेहद साफ़ और सीधा सा फर्क है कुम्हार के सलीकेदार हाथों में कच्ची मिट्टी के पड़ने और आबाद या बर्बाद होने का.

लगभग एक ही समयकाल में, एक ही राज्य और छोटी आबादी के बीच… क्षेत्रीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक ही ज़मीनी मिट्टी का.. एक आंदोलन जब तथाकथित ‘बदनाम’ आरएसएस नाम के संगठन का साथ और ज़मीनी सकारात्मक काम पाता है, तो अपने शुरुआत से लोकतांत्रिक रास्तों पर चलते हुए आज भारतीय राष्ट्रवाद को राजनैतिक सत्ता के तौर पर स्थापित कर रहा होता है.

तो वहीं दूसरी तरफ : क्षेत्रीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ही ज़मीन से उपजा राष्ट्रवाद का दूसरा आंदोलन जब क्षेत्रीय अस्मिता को राष्ट्र की अवधारणा के खिलाफ खड़ा करने के हुनरमंद… तथाकथित आज़ादी और भारत के एक राष्ट्र के रूप में बर्बादी के नारे ढोने वाले… वामपंथी दर्शन की गोद पाता है तो उल्फा के रूप में हत्या, हिंसा, अलगाववाद, आतंकवाद, विदेशी साज़िश की नकारात्मक ज़मीन पर उसी असम के लोगों की नफरत खा रहा होता है. लोकतांत्रिक वजूद और औकात से सस्ता होकर आतंकी की पहचान पाता है.

क्षेत्रीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तेवर का अलगाववादी रास्ते पर भटक सकने वाला क्रांतिकारी जनांदोलन ‘बहिरागत’ अगर असम की ज़मीन पर अपने उसी संकल्प को ले अपनी क्षेत्रीय अस्मिता के हक-हकूक के साथ अवैध बांग्लादेशी शरणार्थी अतिक्रमण के सामने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के तौर पर खड़ा हो सकता है, तो उम्मीद ही नहीं भरोसा रखने के लिए पर्याप्त अनुभव है… कि त्रिपुरा सहित पूर्वोत्तर के बाकी सभी राज्यों में क्षेत्रीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जमीन बना कर अस्तित्व में आये.. हर तरह के पृथकवादी ताकतों को एकीकृत राष्ट्रवाद में बदला जा सकता है, जिसकी शुरुआत असम से सफलतापूर्वक होते हुए… पूरे पूर्वोत्तर में पसर चुकी है.

“चोलो पलटई” (आओ बदलें) का नारा जो त्रिपुरा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने दिया… उसका आधार वही दशकों पुरानी वैचारिक मेहनत की ज़मीन है.. जिसनें अनेकता में एकता के गुण वाले राष्ट्र के क्षेत्रीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को एकीकृत राष्ट्रवाद के रूप में स्थापन का स्वर्णिमकाल देश को दिया है.

जब प्रधानमंत्री कहते रहे कि त्रिपुरा सहित पूर्वोत्तर को ‘हीरा चाहिए’ तब यह क्षेत्रीय राष्ट्रवाद का एकीकृत विस्तार ही था जिसका भौतिक मतलब था : H से हाईवे, I से आईवे (डिजिटल कनेक्टिविटी), R से रोडवेज़ और A यानी एयरवेज़.

प्रधानमंत्री ने त्रिपुरा को जब थ्री-टी का एजेंडा दिया तो उसका रास्ता… ट्रेड, टूरिज्म और ट्रेनिंग (युवाओं के लिए) से होकर जाता है जो त्रिपुरा सहित पूरे पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा मुद्दा भी है.

त्रिपुरा की 60 से 70 फ़ीसदी आबादी पर असर रखने वाले नाथ संप्रदाय की उर्वरक ज़मीन पर राष्ट्रवाद को उभरना ही था… बस उसे हठ योग की मुद्रा में आना भर था : जो अब पूरे पूर्वोत्तर में सर्वहारा हितों पर हठ के साथ खड़ा है, बोल रहा है, लोकतांत्रिक जनमत संग्रह दे रहा है.

‘दुनिया के मज़दूरों एक हो’… के नारे बेचने वाली, पूरे देश में श्रमिक अधिकारों की परंपरागत ठेकेदारी करने वाली वामपंथी विचारधारा जब अपने तीन से अधिक दशकों वाले कुर्सी राज्य बंगाल में कर्मचारियों को पांचवे वेतन आयोग तक रख छोड़ने का इतिहास रखती हो, त्रिपुरा में कर्मचारियों के लिए चौथा वेतन आयोग उसका कल तक वर्तमान रहा हो… उसे अब जल-जंगल-ज़मीन और सर्वहारा चिंतन के पन्ने अपनी आयातित दर्शनी किताबों से फाड़ देने चाहिए.

कह सकते हैं… असम के सांस्कृतिक अस्मिता वाले ‘बहिरागत’ जनांदोलन… को कांग्रेस के ‘फूट डालो और राज करो’ की कोख से सफलतापूर्वक बचा कर… भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में स्थापित करने के बाद … पूर्वोत्तर में एकीकृत राष्ट्रवाद की स्थापना अपने अगले और स्वर्णिम दौर में है.

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