25 साल बाद ही सही लेकिन बहुत ज़रूरी है इस बंद मुट्ठी का खुलना

यूपी में फूलपुर व गोरखपुर संसदीय सीट पर अखिलेश यादव की सपा का समर्थन करने का ऐलान कर के मायावती ने अखिलेश यादव के साथ अपने सियासी गठबन्धन की नींव रख दी है.

राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा बहुत दिनों से हो रही थी. आज उन चर्चाओं पर मायावती ने विराम लगा दिया.

लोकसभा चुनावों के बाद, विशेषकर 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव के बाद यह चर्चा शुरू हुई थी कि यदि ये गठबंधन हो जाए तो ऐसा हो जाएगा… वैसा हो जाएगा. ये हो जाएगा… वो हो जाएगा.

क्या होगा, क्या नहीं होगा? यह सच जानने के लिए हमको-आपको ज्यादा इंतज़ार नहीं करना होगा.

इसी 12 मार्च को दोनों संसदीय सीटों पर उपचुनाव के लिए मतदान होना है. मतदान के साथ ही सच सामने आ जाएगा.

लेकिन इस सच का आंकलन-अनुमान लगाने के लिए आप मित्रों को एक और सच भी बताता हूं जिससे आपको अपना आंकलन-अनुमान लगाने में कोई परेशानी-कठिनाई नहीं होगी.

यूपी में सपा-बसपा का गठबंधन पहली बार नहीं हो रहा. 1993 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों का गठबन्धन लड़ा था.

नतीजे में उस समय यूपी की 425 सीटों में से 164 सीटों पर लड़ी बसपा को 67 और 256 सीटों पर लड़ी सपा को 109 सीटें मिली थीं. यानि गठबन्धन को कुल 176 सीटें मिली थीं.

जबकि भाजपा को इनसे एक सीट ज्यादा, कुल 177 सीटें मिली थीं.

सपा-बसपा गठबन्धन को तब 28.97% वोट मिले थे (बसपा को 11.03% तथा सपा को 17.94%) और भाजपा को मिले वोटों का प्रतिशत 33% था.

यहां उल्लेखनीय यह भी है कि 1993 में बसपा की कमान कांशीराम के पास थी जिनकी राजनीतिक-सांगठनिक क्षमता का दसवां हिस्सा भी मायावती के पास नहीं है. मायावती तब कांशीराम की राजनीतिक सहायक मात्र थी.

इसी तरह 1993 में सपा की कमान मुलायम सिंह यादव के हाथों में थी. यह कोई छुपा रहस्य नहीं है कि अखिलेश की अबतक की राजनीतिक जमापूंजी का कोष फिलहाल मुलायम के राजनीतिक कौशल, ज़मीनी पकड़ और लोकप्रियता का दशमांश भी नहीं है.

1993 में बसपा का प्रचार अभियान जितना आक्रामक अभद्र और उत्तेजक था, वैसा फिर कभी नहीं देखा गया. “….मारो जूते चार” का नारा पहली बार उसी समय सपा बसपा के सार्वजनिक चुनावी मंचों से ज़ोरशोर से लगाया गया था.

दूसरी तरफ भाजपाई खेमे की कमान कल्याण सिंह के पास थी. उस समय की उनकी लोकप्रियता, मतदाताओं पर ज़मीनी पकड़ और उनकी राजनीतिक क्षमता वर्तमान मुख्यमंत्री योगी अदित्यनाथ से अधिक थी. लेकिन साल भर में योगी आदित्यनाथ ने इस अंतर को कम करने का सफल प्रयास किया है.

राष्ट्रीय स्तर पर यूपी में उस समय भाजपा के पास अटल जी का चेहरा था. अटल जी की क्षमता लोकप्रियता के विषय में कुछ कहना व्यर्थ ही है, लेकिन क्योंकि दोनों राजनेताओं के दौर बहुत गहनता से देखे समझे हैं इसलिए मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि वर्तमान में नरेन्द्र मोदी की ज़मीनी पकड़ और लोकप्रियता अटल जी के उस दौर से ज्यादा भारी प्रभावी और निर्णायक है.

इसीलिए आज नहीं बल्कि हर चुनाव के बाद, विशेषकर जब-जब भाजपा किसी चुनाव में जीतती है तब-तब तथाकथित सेक्युलर पत्रकारों द्वारा सपा-बसपा गठबन्धन का राग अलापा जाता रहा है.

अतः क्योंकि मेरा अपना आंकलन-विश्लेषण यह है कि सपा-बसपा गठबन्धन की मुट्ठी जबतक बन्द है तब ही तक लाख की है, जिस दिन खुल गयी उस दिन…

लेकिन मायावती ने यह मुट्ठी खोलने का फैसला कर लिया है तो मुट्ठी खुलने का परिणाम (लाख या खाक़) सामने आ ही जाएगा. बस थोड़ी प्रतीक्षा करिये.

अपने निष्कर्ष का संकेत दे दिया है. विस्तृत व्याख्या फूलपुर गोरखपुर उपचुनाव के परिणाम वाले दिन…

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