मोदी-शाह की मेहनत और संघ प्रचारकों के रक्त से खिला त्रिपुरा में कमल

कुंडली में अगर किसी घर के आगे और पीछे पाप और क्रूर ग्रह बैठे हों तो उसे ‘पाप-कर्तरी’ दोष कहा जाता है और ये दोष उस बीच में घिरे घर का सत्यानाश कर देते हैं ऐसी ज्योतिषीय फलित मान्यता है. इसी दोष से पूर्वोत्तर का राज्य त्रिपुरा घिरा है.

कुंडली में तो किसी भाव को अधिक से अधिक दो घर ही अपने पाप प्रभाव में घेर सकते हैं पर त्रिपुरा की वेदना और भी अधिक है क्योंकि इसकी केवल एक संकरी सी पट्टी ही इसे भारत से जोड़ती है और इसके बाकी भागों को पापी, क्रूर और कट्टर मज़हबी देश बांग्लादेश ने घेर रखा है.

और इस कारण से आज़ादी के बाद से ही दुर्भाग्य त्रिपुरा की तकदीर बन चुकी है क्योंकि बांग्लादेश से त्रिपुरा में अनवरत घुसपैठ जारी रही जिसने वहां के जनजातीय समाज में विद्वेष की भावना भर दी और वामपंथी इसको आधार बनाकर वहां काबिज़ हो गये.

ये तो सर्वविदित है कि जो तीन विचारधाराएं पूरे विश्व में आपस में संघर्षरत हैं, उनमें भारत-भूमि के अंदर अद्भुत एकता दिखती है और इसका सबसे बेहतरीन रूप त्रिपुरा में दिखता है.

बांग्लादेश बनने के बाद वहां पूर्वी पाकिस्तान से हिन्दुओं का विस्थापन हुआ और लाखों की संख्या में बांग्लादेशी हिन्दू भी त्रिपुरा में बस गये और इस बात को वामपंथियों ने अपने लिये स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा.

उन्होंने तुरंत वहां की मूल जनजातियों को भड़काना शुरू किया कि ये लोग तुम्हारा हक मार लेंगे और इसके नतीजे में जनजातियों के बीच कई सारे संगठन खड़े हो गये जिनमें कई तो अत्यधिक हिंसक और बर्बर थे.

1975 में इन उग्रवादी जनजातीय संगठनों ने बर्बरतापूर्वक तीन हज़ार से अधिक बंगाली हिन्दुओं का क़त्ल कर दिया जिसके बाद ये खाई और भी चौड़ी होती चली गई जो वामपंथियों के लिये मुंहमांगी मुराद पूरा होने जैसा था. उन्होंने इन संघर्षों को अपने वोट बैंक में तब्दील कर दिया और सत्ता पर काबिज़ हो गये.

त्रिपुरा का जनजातीय समाज हिन्दू ही है पर उनके बीच जब ज़हर बोया गया तो इसका फायदा उठाकर मिशनरी भी वहां आ गये और धर्मांतरण के लिये चुन-चुनकर उन जनजातीय समाजों को आधार बनाना शुरू किया.

‘जमातिया’ नाम का जनजातीय समूह वहां सबसे प्रभावी था इसलिये चर्च ने सबसे अधिक मेहनत उस समुदाय के अंदर की और बड़े पैमाने पर उनका मतान्तरण कराया और उस जनजाति के अंदर ‘त्रिपुरा उपजाति परिषद’ नाम का एक चरमपंथी संगठन खड़ा कर दिया.

भारतीय खुफिया एजेंसियां बतातीं हैं कि 1975 में हुए बर्बर हिन्दू नरसंहार में इसी संगठन का हाथ था जो चर्च से पोषित था.

चर्च के वरदहस्त से ‘त्रिपुरा उपजाति परिषद’ जैसा ही एक और उग्रवादी संगठन ‘त्रिपुरा नेशनल वॉलेंटियर’ भी बनाया गया जिसने त्रिपुरा से बंगाली हिन्दुओं को बाहर निकालने की मानो कसम ही खा ली और खुलेआम चेतावनी देने लगा कि यहाँ न तो दुर्गा और काली पूजा होगी और न ही हम यहाँ मूर्ति-पूजा करने देंगे.

इसके बाद उन्होंने संघ, रामकृष्ण मिशन, वनवासी कल्याण आश्रम और विवेकानंद केंद्रम द्वारा चलाये जा रहे शिक्षण-संस्थानों को बंद करवाना शुरू किया और वहां के शांत वातावरण में नफरत और आतंक का ज़हर घोल दिया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस विपरीत परिस्थिति को चुनौती रूप में लिया और अपने कई श्रेष्ठ प्रचारक वहां भेजे जिन्होंने संघ के ही अलग-अलग संगठनों के माध्यम से त्रिपुरा में राष्ट्र-भक्ति की लौ जलाई…

इन्होंने घुसपैठ के खिलाफ जनजागरण चलाया, जमातिया और दूसरी अन्य जनजातियों में हो रहे अबाध धर्मांतरण की गति पर विराम लगाया और कई ऐसी योजनायें चलाईं जिनसे त्रिपुरा के मूल जनजातीय समूहों और बांग्लादेश से आये हिन्दुओं के बीच एकात्मता बढ़े.

ज़ाहिर है ये सारे काम विरोधियों को रास नहीं आ रहे थे, संघ के प्रचारक इनकी आँखों की किरकिरी बने हुये थे इसलिये राष्ट्र-भक्ति के ज्वार को थामने के लिये इन्होंने अपना चिर-परिचित तरीका अपनाया…

और संघ के चार वरिष्ठ प्रचारकों को अपहृत कर उनकी नृशंस हत्या कर दी जिनमें एक स्वर्गीय श्यामल कान्ति सेनगुप्ता तो करीब सत्तर वर्ष की उम्र के थे. बाकी तीनों के नाम थे स्वर्गीय शुभंकर चक्रवर्ती, स्वर्गीय सुधामय दत्त एवं स्वर्गीय दीनेन्द्र नाथ डे.

त्रिपुरा में आज ‘कमल’ बेशक मोदी जी और अमित शाह के मेहनत के बूते खिला है पर इस कमल को खिलने के लिये ज़मीन संघ के उन हुतात्मा प्रचारकों ने अपने रक्त से तैयार की है.

नये बदलते कलेवर में भाजपा उन बलिदानों को बस भूल न जाये और ये ज़रूर याद रखे कि उन तपस्वियों का बलिदान केवल सत्ता प्राप्ति के लिए ही नहीं था… हमारी उनसे अपेक्षा बस इतनी ही है. बाकी वन-संसाधन और उपजाऊ कृषि-भूमि से संपन्न त्रिपुरा अपना विकास तो कर ही लेगा.

त्रिपुरा-वासियों को उनके उज्जवल भविष्य के लिये बहुत-बहुत शुभकामनायें…

 

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