निष्पक्ष पत्रकारिता नाम की कोई चीज़ नहीं होती

आज सुबह जो कुछ लिखा उस पर आई प्रतिक्रियाओं को पढ़कर लगा कि बात दो लाइन में समझाई नहीं जा सकेगी.

इससे पहले कि आगे कुछ कहूं, एक नज़र उस पर जो सुबह लिखा था –

क्या इंदौर भाजपा बता सकती है कि उनके खेमे में कितने राष्ट्रवादी पत्रकार हैं? एक भी नहीं. भाजपा नेताओं के कुनबे में सारे कांग्रेसी और वामपंथी विचारधारा के पत्रकार ठूंस-ठूंस कर भरे गए हैं. पार्टी कार्यक्रमों में भी यहीं वामपंथी खींसे निपोरते दिख जाते हैं.

एक ‘स्वदेश’ अखबार को छोड़ दे तो शहर में राष्ट्रवादी पत्रकार हैं ही नहीं. और फिर एक खासमखास से आपत्ति जताई तो कुछ जवाब न देकर जय श्री कृष्णा बोलकर खिसक लिए.

चुनावी साल है. अब कुछ दिनों में भाजपा के चहेते वामपंथी पत्रकार इनके खिलाफ खबरें छापना शुरू कर देंगे. फिर भाजपाई उन पत्रकारों को हार-फूल डालकर मनाएंगे.

विडंबना है कि जो राष्ट्रवादी पत्रकार इस राष्ट्रवादी पार्टी के लिए निष्ठा से कार्य करते हैं, उन्हें भाजपा की स्थानीय इकाई सामान्य कार्यक्रमों तक मे नहीं बुलाती.

कल देश मे वामपंथ का आखिरी किला भले ही ढह गया हो लेकिन भाजपा की ‘गुड लिस्ट’ में तो सारे वामपंथी भरे पड़े हैं. चुनावी साल है. भूल सुधारो. अपने कुनबे में सही लोगों को लेकर आओ.

आब बात आगे –

एक बात थी राष्ट्रवाद की परिभाषा की और दूसरी निष्पक्ष पत्रकारिता की. राष्ट्रवाद, छद्म राष्ट्रवाद की बातें खूब हो रही हैं. अपनी दो लाइन की पोस्ट में आधे शब्द अश्लील गालियां लिखने वाले हेकड़ी से खुद को राष्ट्रवादी बताते फिर रहे हैं.

आज एक मित्र ने पूछा ‘क्या मोदी या भाजपा का समर्थन, राष्ट्रवादी पत्रकारिता है?’ सवाल बहुत वाजिब है और इसका उत्तर देना भी चाहिए.

मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी किताब ‘प्रासंगिकता के अन्तःसूत्र’ में लिखा है, राष्ट्रवाद का सीधा अर्थ देशभक्ति से रहा है. गुप्त जी के मुताबिक इस राष्ट्रवाद पर ब्रिटिशवाद की छाया पड़ी और बदलाव हुआ.

फिर हमारे सामने दो राष्ट्रवाद उपस्थित हो गए थे. एक विशुद्ध राष्ट्रवाद और दूसरा ब्रिटिश संक्रमित राष्ट्रवाद. इस वाले में वसुधैव कुटुंबकम की भावना नहीं थी.

गुप्त जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि हमने मान लिया कि ‘राष्ट्रवाद उदार चरित्र की शक्ति नहीं है’. इसी शक्ति से जातीय अस्मिता अपना तेज देशभक्ति के रूप में प्रकट करती रही है.

देश हित, देश रक्षा, देश संगठन और जातीय क्रांति की सभी चेष्टाएँ, इच्छाएं-आकांक्षाएं, विचार धाराएं भिन्न प्रकार की नदियां हैं जो अंततः देशभक्ति के महासागर में समा जाती है. इसी भावना को राष्ट्रवाद कहा जाना चाहिए.

अब आते हैं निष्पक्ष पत्रकारिता पर. ऐसी कोई चीज़ दुनिया में नहीं होती. ये शब्द ही गलत बनाया गया है.

समाज में हो रही बुराइयों के खिलाफ आप लिख रहे हैं यानी अच्छाई के पक्ष में लिख रहे हैं. कभी आप स्वच्छ सड़कों के लिए जनता के पक्ष में खड़े होते हैं तो कभी किसी मरते तालाब के पक्ष में खड़े होकर लिखते हैं.

घटना को जस का तस पेश करना रिपोर्ताज़ कहलाएगी न कि विषयगत पत्रकारिता. जब आप किसी मुद्दे को लेकर खबर बनाएँगे तो किसी के पक्ष में ही खड़े होंगे ना.

निर्भया के माता-पिता प्रेस को धन्यवाद कहते हैं कि मीडिया उनके पक्ष में खड़ा हुआ. कोई छेड़छाड़ का मामला आता है तो बिना दोनों पक्ष जाने आप फौरन पीड़िता के पक्ष में आ जाते हैं. निष्पक्ष पत्रकारिता कहाँ है, ऐसी कोई चीज ब्रम्हांड में नहीं होती.

दरअसल इस दुनिया में कोई निष्पक्ष नहीं हो सकता. आप जीवन भर एक विचारधारा का पालन करते हैं. आप अपनी विचारधारा से मिलता-जुलता चैनल ही देखते हैं. अपनी ही विचारधारा वाला अखबार पढ़ते हैं. अपने ही जैसे लोगों में चर्चा करते हैं. यहाँ कोई निष्पक्ष नहीं होता और न होना चाहिए.

जो राजनीतिक दल देश की जनता को राष्ट्रवाद के करीब लगता है, वे उसे प्राथमिकता देते हैं. कभी देश की जनता को कांग्रेस राष्ट्रवाद के करीब लगती थी और आज भाजपा लगती है.

ऐसा नहीं है कि संघ परिवार और भाजपा ने इस ‘राष्ट्रवाद’ को लाकर आप पर थोप दिया है. राष्ट्रवाद तो शाश्वत है. आज देश की जनता को मोदी राष्ट्रवाद के प्रतीक लगते हैं तो किसी ज़माने में ये पदवी इंदिरा गाँधी के पास थी.

हमारी पीढ़ी ने इंदिरा गाँधी के बाद कई प्रधानमंत्री देखे, लेकिन देश की जनता को गर्व से भर दे, ऐसा प्रधानमंत्री अटल जी और मोदी के रूप में ही देखा.

राष्ट्रगान के पक्ष में खड़ी हो तो भाजपा, पाकिस्तान और कश्मीर के मुद्दे पर बोले तो भाजपा, नोटबंदी जैसे साहसिक निर्णय ले तो भाजपा. क्यों ऐसे मुद्दे भाजपा उठाती है, कांग्रेस नहीं. राहुल राष्ट्रगान के पक्ष में नहीं बोलते, मुस्लिम तुष्टिकरण पर नहीं बोलते.

फिर मुझसे पूछा जाता है कि मोदी और भाजपा का समर्थन ही राष्ट्रवादी पत्रकारिता है क्या? जो पार्टी राष्ट्रहित में खड़ी होगी, उसके पक्ष में पत्रकारिता करना ही राष्ट्रवादी पत्रकारिता है.

आज राहुल इस सब मुद्दों को उठाने की ताकत रखे तो हमारी दृष्टि में वे भी राष्ट्रवादी कहलाएंगे. यही तो वह कारण है कि जनता कांग्रेस और मौजूदा मीडिया पर भरोसा नहीं करती.

उसे राष्ट्र के लिए बोलने वाले पत्रकार चाहिए. न चाहिए होते तो आज रोहित सरदाना के लाखों प्रशंसक न होते और पुण्य प्रसून वाजपेयी व रविश कुमार आम जनता की गालियां नहीं खा रहे होते. इस दुनिया में कोई निष्पक्ष नहीं होता. निष्पक्ष पत्रकारिता नाम की कोई चीज नहीं होती.

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