चार दशकों से संघ कार्यकर्ताओं के रक्त से भीगे पूर्वोत्तर भारत की गुरुदक्षिणा

मैं बहुत पहले से लिख रहा हूं कि हिंदुत्व के पुरोधाओं और राष्ट्रवादिता के शूरवीरों को अपनी शुचिता और आदर्श के अहंकार को तज देना चाहिये क्योंकि यह अहंकार लोकत्रांतिक व्यवस्था में एक अभिशाप होता है.

आप सत्य हैं, आप अमरत्व के भागीदार हैं, लेकिन यह आपको अपने शत्रुओं के ऊपर विजय पाने का अधिकारी नहीं बनाता है.

यह अधिकार तो आप सिर्फ परिवर्तन के होने वाले यज्ञ की आहुति बनकर भी नहीं प्राप्त कर सकते हैं, उसके लिये आपको शत्रुओं की सीमाओं को पार करना पड़ता है.

आपको उस यज्ञ में अपने आदर्शो और शुचिता की कष्टदायक आहुति देनी ही पड़ती है क्योंकि निकृष्ट प्रतिद्वंदी के समूल को नष्ट करने के लिये कम से कम दो दशकों तक सत्ता पर बने रहना पड़ता है ताकि वर्तमान पीढ़ी को एक दूसरा पक्ष दिखा सकें और एक नई पीढ़ी पैदा कर सकें जो आपके शत्रुओं के विष से परे हो.

आपका आदर्श और शुचिता सिर्फ खेत बना सकता है और बीज डाल सकता है लेकिन आधा ज़िंदा आधा कुचला हुआ लोकतंत्र आपको फसल बचाने के लिये न पानी दे सकता है और न उसको जानवरो से चरने से बचाने के लिये पहरेदारी कर सकता है.

यह काम सिर्फ लट्ठ से हो सकता है. वह चाहे, केस के दर्ज होने की परवाह किये बिना, पानी की नाली काटने वाले पर लट्ठ हो, या खेत मे घुसने वाले जानवरों पर, चाहे गाय हो या सांड पर लट्ठ हो, वो ही फसल काट पाने का अधिकारी होता है.

यह आज इस बात को इस लिये कह रहा हूं क्योंकि बीजेपी ने आरएसएस के पूरे समर्थन से मेघालय में 2 सीट जीतकर जो सरकार बनायी है, वो नैतिकता, शुचिता और आदर्शो से परे हो कर बनायी है.

मैं इस लिये भी प्रसन्न हूँ क्योंकि जहां मोदी-शाह ने बाजपेयी जी और आडवाणी जी के युग की गलतियों से सीखा है, वही आरएसएस ने भी 2004 के चुनाव में तत्कालीन बाजपेयी सरकार से कुपित हो कर चुनाव के दौरान जो ठंड दिखायी थी, उससे हुये अगले 10 वर्षो के दुष्परिणामों से भी सीखा है.

विचारधारा सर्वश्रेठ है यह सत्य है, लेकिन उसको अगली पीढ़ियों में उतारने के लिये सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के लिये समझौतों का विष भी पीना पड़ेगा, यह भी सत्य है.

आज अमित शाह की नागपुर यात्रा, सरसंघ चालक भागवत जी को गुरुदक्षिणा में पूर्वोत्तर भारत देने की यात्रा थी, जहां की माटी 4 दशकों से संघ के कार्यकर्ताओं के रक्त से भीगी हुई है.

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