विदेशियों के सामने ताजमहल यात्रा का शर्मनाक अनुभव

एक मित्र ने मेरी ताजमहल यात्रा के दौरान हुए अनुभवों को जानने की जिज्ञासा ज़ाहिर की.

मैं अपनी हकीकत बयान करने के पहले सोचता विचारता रहा, पर मुझे लगता है कि इस एक अनुभव को सबसे शेयर करना ज़रूरी है, जिससे दूसरे विज़िटर्स इन ठगों के चंगुल में न फंसें.

दिल्ली से आगरा आने के लिये हमने टैक्सी की और सीधे ताजमहल पहुंचे. कार पार्किंग पर ही बिजली से चलने वाले रिक्शे बालों ने आकर घेर लिया. इनमें परस्पर बहुत गहरी सांठगांठ रहती है. पीछा ही नहीं छोड़ते.

आप किसी दूसरे बिजली रिक्शा वाले से बात करना चाहें, वह बात कर लेगा, 500 मीटर चलने के आप से 10 रूपये सवारी चार्ज करेगा, पर जाना उसी रिक्शे से पड़ेगा जिसने आपसे सबसे पहले बात की है.

हम लोग अपने साथ ट्रेव्हलिंग लंच लेकर आए थे, कार में ही बैठकर खान पान किया. फिर चलने के पूर्व पास ही बने सुलभ शौचालय की ओर गए. वहाँ पर लघुशंका निवारण के 3 रूपये, शौच के 5 रूपये और नहाने के प्रति व्यक्ति 10 रूपये देने का कानून है.

पर भीतर गंदगी का इतना भीषण माहौल है कि उसे कोलकाता के हावड़ा स्टेशन का पब्लिक टॉयलेट से भी ज्यादा गंदा और बदबूदार कहा जा सकता है.

पेशाब फ्लोर पर बह रही है, पॉटी फ्लश करने पानी नहीं है, लिक्विड सोप तो दूर की बात है. जैसे तैसे निवृत्त होकर बिजली के रिक्शे में बैठ कर आगे बढ़े तो रिक्शा चालक के साथ ही एक और हजरत आकर बैठ गए.

बताया गया कि रिक्शा उत्तरप्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा चलाये जाते हैं, ड्राईवर और सहायक व्यक्ति को 9600 रूपये प्रतिमाह का वेतन मिलता है. किराये की राशि उन्हें पर्यटन विभाग में जमा कराना पड़ती है.

आगे चलकर सहायक ने बताया कि “दाहिने हाथ की तरफ जो जंगल सा दिख रहा है यह किसी जमाने में बादशाह शाहजहां का बगीचा था. यहां पर केले के पेड़ों का बगीचा था.

सरकार ने यहां बांस के जंगल लगा दिये. इन बांसों को पीछे यमुना नदी में शाहजहां के ज़माने से गलाया जाता है, वहीं पर केलों के रेशे निकाल कर धागा बनाया जाता है.

बांस और केले के रेशे से बने धागे से कपड़ा यूपी की सरकार हाथ करघे से तैयार कराती है. इस कपडे की खासियत है कि बांस और केले के रेशे से बने चादर पर किसी भी तरह का मच्छर अगले पांच साल तक नहीं बैठ सकता है. अगर यह चादर फट जाये तो आप पांच साल के बाद भी आधी कीमत पर लौटा सकते हैं.”

अभी रिक्शे वाले के साथ चल रहे सहायक का प्रवचन खत्म नहीं हुआ कि रिक्शा चालक ताजमहल की ओर न ले जाते हुए ‘यू पी हैण्डलूम’ की दुकान के पास लाकर रूक गया.

फिर बोला कि अभी 12 बजे से 1 बजे तक ताज महल में साफ सफाई हो रही है. आपको भीतर जाने के लिए एक घंटा इन्तज़ार करना पड़ेगा. तब तक आप इन दुकानों में सामान देख लीजिये, खरीदना हो तो खरीदिये, नहीं तो सामने जाकर टिकिट लेकर ताज महल देख लीजिये.

दुकान पर जब जाकर देखा तो सिवा “ला हौल विला कूवत” के और कुछ न बोलते बना.

एक वैज्ञानिक होने के नाते मैं भली भांति जानता हूं कि आज की तारीख में दुनिया में कहीं पर भी ऐसा कोई कपड़ा नहीं बना है जो पांच साल तक ‘मस्किटो रिपेलेन्ट’ हो.

विदेशों मे केमिकली कोटेड कपड़ा बनाया गया है पर वह भी अभी मार्केट में नहीं आया है. और पांच साल तक मच्छर उससे भागे, यह असम्भव है.

असल में रिक्शे वालों को दुकानदार कमीशन देते हैं. दुकानदार झूठ बोल बोल कर ग्राहकों को फंसा कर औने पौने दामों शुद्ध सिन्थेटिक माल टिका रहे हैं.

इस माल का हैण्डलूम से कोई लेना देना नहीं है. रजाई, चादर, साड़ियां सौ टका झूठे वायदे करके, ताजमहल देखने आए पर्यटकों को बेच दी जाती है.

ऐसे ही एक सज्जन डॉ पुष्कर मोहन जी, जो कोटद्वार उत्तराखण्ड के निवासी हैं, को हजारों रूपयों मे टिका दिया गया. मैंने पुष्कर मोहन जी के फोन पर बात करके तथ्य की प्रामाणिक जानकारी प्राप्त की. पर उनके दिये गए केश मेमो पर कहीं पर भी रजिस्ट्रेशन नम्बर प्रिन्टेड नहीं है.

दुकानदार को नियमानुसार केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार को देय ‘जी एस टी’ का उल्लेख करना कानूनी तौर पर अनिवार्य है, पर दुकानदार ने कहीं पर भी इस टैक्स का उल्लेख नहीं किया है.

ताज्जुब की बात तो यह है कि पुष्कर मोहन जी को माल बेचा गया है, उसके बिल पर या पार्ट पेमेन्ट केश मेमो बिल पर छ: हजार रूपयों का उल्लेख है, पर ‘जी एस टी’ का कहीं उल्लेख नहीं है.

फिर मैंने फोन नम्बर 0562-2330017 पर इस ठगने वाली दुकान के मैनेजर से चर्चा करके अनुरोध किया कि इस तरह की धोखाधड़ी और झूठ बोलकर लोगों को लूटने का धन्धा बन्द करो.

अभी तक तो ‘बन्टी बबली’ पिक्चर देखने के बाद लगता था कि आगरे का ताजमहल बेचने का काम विदेशियों को मूर्ख बनाकर लूटने वाले सिर्फ फिल्म में ही होते हैं, पर अब तो लगने लगा कि आगरा में हकीकतन भी ऐसा सकता है.

इस झूठी सरकारी कहे जाने बाली दुकान के आसपास इतनी गन्दगी फैली है जिसे देखकर किसी को भी शर्म आना चाहिये.

और ताज्जुब की बात तो यह है कि महज तीन रूपयों की बचत करने के लिये रिक्शे वाले, लोगों को गाईड बनकर लूटने वाले लोग यहां-वहां खड़े होकर पेशाब करते दिख जाएंगे. इन्हें देखकर विदेशी पर्यटक कौन से ‘स्वच्छ भारत’ की छवि लेकर अपने देश जाते होंगे?

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