हाथ में लैपटॉप लिया हुआ कट्टरपंथी ही 21वीं शताब्दी के विश्व के लिये चुनौती होगा

इस बार जब लखनऊ आया था तब यह सोच कर आया था कि इस बार डॉ रिजवान अहमद से मुलाकात करूँगा.

कुछ समय से टीवी पर उनको सुन रहा था और मुझे लगा कि इनसे व्यक्तिगत रूप से मिल कर बात करनी चाहिये.

खैर इनबॉक्स में संवाद हुआ और हम लोग उनके ही निवास पर मिले.

हमारी मुलाकात उतनी लम्बी नहीं हुई जितनी मुझे अपेक्षा थी लेकिन कुछ मेरे देरी से उनके घर पहुंचने और कुछ उनकी 2 बजे टीवी पर एक डिबेट में पहुँचने की मजबूरी ने निश्चित सोचे गये समय को कुछ कम कर दिया.

औपचारिकता के बाद हम लोगों ने सिर्फ बात की और यह समझने में मुझे कोई देर नहीं हुई कि जिनसे मैं वार्ता कर रहा हूं वो अपने में बेहद सुलझे हुये हैं.

वे किसी रूमानियत से दूर, धरातल पर वास्तविकता से रूबरू हो कर अपनी बात कह रहे थे.

हमारे बीच जो बातें हुई उसको तो मैं यहां अभी नहीं लिखूंगा लेकिन एक बात जो उन्होंने की उसका ज़िक्र जरूर करूँगा.

हुआ यह कि जब मैं उनके घर पहुंचा तब टीवी पर जॉर्डन के किंग और मोदी जी का भाषण खत्म हो चुका था और मुझे उनके भाषण के बारे में कुछ नहीं मालूम था.

बातों के बीच, रिज़वान साहब ने दिये गये भाषण का जिक्र छेड दिया और कहा,

मैंने आज जॉर्डन के शाह और मोदी जी के भाषण को सुना और बेहद कोफ्त हुई. 80% भाषण आतंकवाद पर था. अब समझिये कि यह आतंकवाद हमारी कितनी एनर्जी वेस्ट कर रहा है. हम कुछ नया या आगे बढ़ने की बात ही नहीं कर पा रहे हैं?

मोदी जी अभी भी ‘एक हाथ में कुरान और एक हाथ में कम्प्यूटर’ की बात पर अटके है? एक हाथ में कुरान क्यों हो? कुरान, इबादत के लिये है और घर में रखने के लिये है, धार्मिक किताब को हाथ में लेने की बात क्यों की जाए?

भारत पर सऊदी अरब में आ चुके, और आगे आने वाले परिवर्तन का असर पड़ेगा क्योंकि अभी तक सऊदी अरब का असर है.

वहां के प्रिंस एमबीएस (Mohammad bin Salman bin Abdulaziz Al Saud) के विज़न 2030, जिसमें रिलीजन शब्द का प्रयोग नहीं है मुझे बड़ी आशा देता है, अलबत्ता अगले 10/15 साल तक वो ज़िंदा रहे.

आज अरब का मुसलमान चिंता की बात नहीं है लेकिन मेरी चिंता योरप का मुसलमान है जो सऊदी अरब के प्रभाव में बिल्कुल भी नहीं है. वो एक अलग तरह का कट्टर है, जो कुरान से आगे जाकर, आईफोन, लैपटॉप और कम्प्यूटर हाथ में लिये हुये है.

यदि एक हाथ कम्प्यूटर और एक हाथ में कुरान इतना ही कारगर है तो फिर योरप, अमेरिका से 25-30 हज़ार मुसलमान आईएसआईएस के लिये लड़ने सीरिया क्यों पहुंचा? टेक्नोलॉजी क्या मानसिकता बदल सकती है?

योरप ने जो सीरिया और अरब से गये मुसलमानों को शरण दी है, उसको योरप को झेलना होगा. एक अलग संस्कृति और मानसिकता को पाश्चात्य की उदारवादी सँस्कृति से मिलाना, योरप को भारी पड़ेगा.

मेरी परेशानी, अरब के कट्टरपंथी प्रभाव से ज्यादा यह लैपटॉप के कट्टरपंथी है.”

मैं नहीं जानता कि कट्टरपंथी हिंदुओं की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी लेकिन हकीकत यही समझ में आती है कि हाथ में लैपटॉप लिया हुआ कट्टरपंथी ही 21वीं शताब्दी के विश्व के लिये चुनौती होगा.

मोदी जी को 2014 से आगे जाकर, यह ‘एक हाथ में कम्प्यूटर और एक हाथ में कुरान’ की अनर्गल बात से आगे बढ़ना होगा.

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