क्या संघ का गणवेश पहनना अपराध है?

ट्विटर पर एक चित्र घूम रहा है जिसमें विदेश राज्यमंत्री जनरल विजय कुमार सिंह (सेनि०) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी कार्यक्रम में गणवेश में दिखाई दे रहे हैं.

इस चित्र को देखकर सेक्युलर लिबरल चिंतकों के पेट में स्वाभाविक रूप से ऐंठन प्रारंभ हो गयी है. श्रीनाथ राघवन के अनुसार “इस व्यक्ति (जनरल सिंह) ने सेना की छवि को सर्वाधिक नुकसान पहुँचाया है, सेना में सर्विस करते हुए और सेवानिवृत्ति के बाद भी.” दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में कार्यरत श्रीनाथ राघवन इस समय देश के सबसे चहेते सैन्य इतिहासकारों में से हैं.

कुल जमा छः वर्ष भारतीय सेना में नौकरी करने के उपरांत इन्होंने किंग्स कॉलेज लन्दन में सैन्य तथा युद्ध रणनीति की उच्च शिक्षा ग्रहण की. राघवन ने तीन पुस्तकें लिखी हैं जो मैंने भी पढ़ी हैं.

सन् 2015 में राघवन को इनफ़ोसिस पुरस्कार भी प्रदान किया गया था. परन्तु राघवन की समस्त उपलब्धियाँ जनरल सिंह की 42 वर्षों की सैन्य सेवा तत्पश्चात विदेश राज्यमंत्री के रूप में 4 वर्ष के कार्यकाल के सम्मुख बौने हैं.

जनरल सिंह कर्मठ व्यक्ति हैं जो बुद्धिजीवियों की भाँति आरामकुर्सी पर बैठ कर विचारों की उधेड़बुन में कम और वास्तविक विषम परिस्थितियों में काम करने को अधिक महत्व देते हैं. यह उनके पूरे जीवनकाल से स्पष्ट परिलक्षित होता है.

विश्व की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक भारतीय सेना के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ रहने के पश्चात विदेश राज्यमंत्री रहते हुए जनरल सिंह ने उत्कृष्ट सेवा दी है चाहे वह ऑपरेशन राहत के अंतर्गत 4,000 भारतीयों को यमन से छुड़ाने का कार्य हो अथवा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के डिप्टी के रूप में अपने दक्षता सिद्ध करनी हो जनरल सिंह ने देश का मस्तक कभी झुकने नहीं दिया है.

जहाँ तक संघ का गणवेश पहनने का प्रश्न है तो इस विषय में हमें यह जानना आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गणवेश कोई आधिकारिक वर्दी अथवा यूनिफॉर्म नहीं है. संघ का कोई भी स्वयंसेवक यह बता सकता है कि गणवेश हर समय नहीं पहना जाता. संघ के कुछ विशेष कार्यक्रमों में ही गणवेश पहना जाता है.

गणवेश धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति संघ की ड्यूटी नहीं बजाता. गणवेश वैसा ही परिधान है जैसे कि हम पूजा पाठ के समय धोती पहन लेते हैं. संघ एक voluntary संगठन है जिससे व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से जुड़ता है वह भी बिना कोई वेतन लिए.

सेवानिवृत्ति के पश्चात कई प्रशासनिक एवं सैन्य अधिकारी संघ से जुड़े रहे हैं. जनरल सिंह भी किसी आयोजन में गए होंगे जहाँ उन्होंने परिस्थिति के अनुसार गणवेश पहन लिया होगा. हँसी आती है जब संघ को लोग रिलिजियस संगठन कहते हैं.

संघ हिन्दू समाज की बात करता है इसका अर्थ यह नहीं कि संघ रिलिजियस संगठन है. संघ को किसी रिलिजियस व्यक्ति अथवा धर्माचार्य ने स्थापित नहीं किया था. यह तो एक सामाजिक संगठन है और सरकारी नियमों के अनुसार कोई भी व्यक्ति सेवानिवृत्ति के पश्चात किसी भी सामाजिक संगठन से जुड़ सकता है.

मुझे याद आता है जब 1971 युद्ध के नायकों में से एक लेफ्टिनेंट जनरल हणुत सिंह राठौड़ (महावीर चक्र) जी ने 2015 में देह त्याग दी थी. जनरल राठौड़ सेवानिवृत्ति के पश्चात आध्यात्मिक सन्त हो गए थे. उनकी अंतिम यात्रा में उन्हें गेरुए वस्र पहना कर सन्यासी के रूप में ही ले जाया गया था. उन्हें ‘संत-जनरल’ कहा जाता था.

राघवन जैसे मूर्ख चिंतकों के अनुसार जनरल राठौड़ को कभी सन्यासी के गेरुए वस्त्र नहीं पहनने चाहिए थे क्योंकि वह भी एक विशेष परिधान है जो प्रायः सन्यासी ही पहनते हैं. वस्तुतः समस्या यह है कि सेक्युलर लिबरल बिरादरी के विचारक इस मुगालते में जीते हैं कि सेना के पंथनिरपेक्ष होने का अर्थ यह है कि सेना सभी पन्थों की आस्थाओं को ख़ारिज करती है जबकि वस्तुस्थिति ठीक इसके उलट है. सशस्त्र सेनाएं सभी पन्थों की आस्थाओं का अपनी परम्परा में समावेश करती हैं.

एक पूर्व थलसेनाध्यक्ष और सम्प्रति विदेश राज्यमंत्री को संघ का गणवेश पहनने पर कोसने वाले लोग शाम ढलने के पश्चात उन महंगे क्लबों और डांस बार में बैठते हैं जहाँ घुसने के लिए धन के अतिरिक्त ड्रेस कोड भी आवश्यक होता है. ऐसे परिवेश में पले बढ़े बुद्धिजीवी क्या जानें कि एक स्वयंसेवक गणवेश क्यों पहनता है.

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