ओशो और मेहर बाबा : भीतर ही प्रगटेगा स्वधर्म

भारत में एक व्यक्ति थे, जो अभी चल बसे हैं. आप उनसे भलीभांति परिचित हैं, मेहर बाबा. उन्होंने पिछले जीवन के अपने तीस वर्ष अंतर की आवाज को सुनने में ही लगाए. और अंतर की आवाज को सुनने के लिए उन्होंने बाहर की सारी आवाज बंद कर दी. मौन हो रहे, बोलना बंद कर दिया. क्योंकि बोलें, तो बाहर की वाणी का लेन-देन जारी रहता है. तो सब बंद कर दिया.

अंतर्वाणी के सुनने के लिए मेहर बाबा ने इस सदी में जितना श्रम किया, उतना किसी दूसरे व्यक्ति ने नहीं किया है. और अंतर्वाणी को सुनने के लिए, स्वधर्म की आवाज को सुनने के लिए जो गहरे से गहरा तप किया जा सकता था, वह यह था कि वाणी ही उन्होंने छोड़ दी, शब्द ही छोड़ दिए; मौन हो रहे बाहर से, ताकि शब्द का लेन-देन बंद हो जाए.

ताकि अंततः कभी जरा-सी भी भूल न हो, कि भीतर की आवाज और बाहर की आवाज में कहीं भी कोई संदेह और संभ्रम, कोई कनफ्यूजन पैदा न हो. बाहर की आवाज ही बंद कर दी, ताकि निपट भीतर की आवाज से जीया जा सके.

फिर बहुत-सी घटनाएं उनके जीवन में हैं, एक-दो मैं कहूं, जिससे खयाल आ सके कि अंतर की आवाज….

हैदराबाद के पास उन्होंने एक छोटा-सा आश्रम बनाया था. बनकर तैयार हुआ. बड़ी प्रतीक्षा से बनाया था. फिर उसके द्वार तक गए–प्रवेश का दिन था– और ठीक दरवाजे पर खड़े होकर वापस लौट आए और इशारा कर दिया कि उस मकान में वे प्रवेश नहीं करेंगे. रात वह मकान गिर गया.

हिंदुस्तान से वे यूरोप जा रहे थे. हवाई जहाज से यात्रा. बीच में हवाई जहाज सिर्फ फ्यूल भरने के लिए किसी एअरपोर्ट पर उतरा. फिर हवाई जहाज उड़ने को हुआ. यात्रियों को खबर की गई. मेहर बाबा ने इनकार कर दिया कि वे उस पर सवार नहीं होंगे.

साथी उनके बड़ी परेशानी में पड़ते थे. शिष्य बड़ी मुश्किल में पड़ जाते थे. अब यह बड़ी बेहूदगी हो गई! चलती यात्रा में, बीच हवाई जहाज से उतर जाना, फिर कह देना कि नहीं जाएंगे! वह हवाई जहाज पंद्रह मिनट बाद उड़ा और गिर गया और सब यात्री समाप्त हो गए.

ऐसा बहुत बार हुआ. मेहर बाबा कब रुक जाएंगे किस काम को करने से ऐन बीच में, नहीं कहा जा सकता था; अनप्रेडिक्टेबल था. वे खुद भी नहीं कह सकते थे, क्योंकि उनको खुद भी पता नहीं था. कब अंतर की आवाज क्या कहेगी, उन्हें भी पता नहीं. जो कहेगी, वही वे करेंगे, जो भी हो. यह भी पता नहीं कि क्या परिणाम होगा. हवाई जहाज से क्यों रोक रहा है अंतर-मन? लेकिन अंतर-मन कहता है, नहीं, तो फिर नहीं. हां, तो हां.

मेहर बाबा की जिंदगी स्वधर्म की तलाश की जिंदगी है. भीतर के स्वर की खोज की जिंदगी है. वह भीतर का स्वर क्या कहता है, उससे ही चलेंगे.

कोई भी व्यक्ति अगर तेईस घंटे काम की दुनिया से हटाकर एक घंटा अपने लिए निकाल ले–ज्यादा निकाल सकें, और अच्छा. कभी वर्ष में पंद्रह दिन, तीन सप्ताह निकाल सकें इकट्ठे, तो और भी अच्छा. धीरे-धीरे भीतर की आवाज साफ होने लगे, तो आपकी जिंदगी में भूल-चूक बंद हो जाएगी. क्योंकि तब जिंदगी परमात्मा से चलने लगती है, आपसे नहीं चलती.

स्वधर्म की खोज करनी हो, उसे बाहर की दुनिया से कम से कम चौबीस घंटे में घंटेभर के लिए बिलकुल छुट्टी ले लेनी चाहिए, और भीतर की दुनिया में डूब जाना चाहिए. कर देने चाहिए द्वार बंद बाहर के. कर देना चाहिए बाहर के जगत को बाहर, और अब मैं होता भीतर.

सब इंद्रियों के द्वार बंद करके भीतर घंटेभर के लिए डूब जाना चाहिए. वहीं पता चलेगा उस रहस्य का जो स्व है, जो निजता है. वहीं से सूत्र मिलेंगे, ध्वनि सुनाई पड़ेगी, वहीं से इशारे मिलेंगे. और धीरे-धीरे इशारे गहरे होते चले जाते हैं.

स्वधर्म का पता अंतर की वाणी के अतिरिक्त और कहीं से नहीं चलता है. इससे आप पता लगा लेना कि जिंदगी ठीक मार्गों से जा रही है या नहीं. घंटेभर के लिए चौबीस घंटे में, बंद कर देना बाहर की दुनिया को, भूल जाना; छोड़ देना सब बाहर का बाहर; अपने भीतर डुबकी लगा जाना.

उस डुबकी में धीरे-धीरे भीतर की अंतर्वाणी सुनाई पड़नी शुरू होगी. सबके भीतर छिपा है वह. दि स्टिल स्माल वॉइस, छोटी है आवाज–धीमी, नाजुक, सूक्ष्म. केवल वे ही सुन सकते हैं, जो उतनी सूक्ष्म आवाज को सुनने के लिए अपने को ट्रेन करते हैं, प्रशिक्षित करते हैं.

इसलिए आज आप आंख बंद करके बैठ जाएंगे, तो भीतर की आवाज नहीं सुनाई पड़ेगी. आंख बंद करके भी बाहर की ही आवाज सुनाई पड़ती रहेगी. कल, परसों–बैठते रहें, बैठते रहें, जल्दी न करें, घबड़ाएं न. तेईस घंटे बाहर की दुनिया को दे दें, एक घंटा अपने को दे दें. बस, आंख बंद करें और सुनने की कोशिश करें भीतर. सुनने की कोशिश, जैसे भीतर कोई बोल रहा है, उसे सुन रहे हैं.

जैसे कि इतनी भीड़ है. यहां बहुत लोग बातचीत कर रहे हैं और आपको किसी की बात सुननी है, तो आप सबकी बातों को छोड़कर अपनी पूरी चेतना और एकाग्रता को उस आदमी के ओठों के पास लगा देते हैं. वह फुसफुसाकर भी बोलता हो, विस्पर भी करता हो, तो भी आप सुनने की कोशिश करते हैं–और सुन पाते हैं. चेतना सिकुड़कर सुनती है, तो सुन पाती है. एकाग्र हो जाती है, तो सुन पाती है.

जल्दी न करें. एक घंटा तय कर लें स्वधर्म की खोज के लिए. आपको पता नहीं, लेकिन आपकी अंतरात्मा को पता है कि क्या है आपका स्वधर्म. आंख बंद करें. मौन हो जाएं. चुप बैठकर सुनें. मौन, सिर्फ भीतर ध्यान को करके, सुनने की कोशिश करें कि भीतर कोई बोलता है! कोई आवाज!

बहुत-सी आवाजें सुनाई पड़ेंगी. पहचानने में कठिनाई न होगी कि ये बाहर की आवाजें हैं. मित्रों के शब्द याद आएंगे, शत्रुओं के शब्द; दुकान, बाजार, मंदिर, शास्त्र–सब शब्द याद आएंगे. पहचान सकेंगे भलीभांति, बाहर के सुने हुए हैं. छोड़ दें. उन पर ध्यान न दे. और भीतर! और प्रतीक्षा करते रहें.

अगर तीन महीने कोई सिर्फ एक घंटा चुप बैठकर प्रतीक्षा कर सके धैर्य से, तो उसे भीतर की आवाज का पता चलना शुरू हो जाएगा. और एक बार भीतर का स्वर पकड़ लिया जाए, तो आपको फिर जिंदगी में किसी से सलाह लेने की जरूरत न पड़ेगी.

जब भी जरूरत हो, आंख बंद करें और भीतर से सलाह ले लें; पूछ लें भीतर से कि क्या करना है. और स्वधर्म की यात्रा पर आप चल पड़ेंगे. क्योंकि भीतर से स्वधर्म की ही आवाज आती है. भीतर से कभी परधर्म की आवाज नहीं आती. परधर्म की आवाज सदा बाहर से आती है.

जो व्यक्ति अपने भीतर की इनर वॉइस, अंतर्वाणी को नहीं सुन पाता, वह व्यक्ति कभी स्वधर्म के तप को पूरा नहीं कर पाएगा. यह जो स्वधर्मरूपी यज्ञ की बात कृष्ण ने कही है, यह वही व्यक्ति पूरी कर पाता है, जो अपने भीतर की अंतर्वाणी को सुनने में सक्षम हो जाता है.

लेकिन सब हो सकते हैं, सबके पास वह अंतर्वाणी का स्रोत है. जन्म के साथ ही वह स्रोत है, जीवन के साथ ही वह स्रोत है. बस, हमें उसका कोई स्मरण नहीं. हमने कभी उसे टैप भी नहीं किया; हमने कभी उसे खटकाया भी नहीं; हमने कभी उसे जगाया भी नहीं. हमने कभी कानों को प्रशिक्षित भी नहीं किया कि वे सूक्ष्म आवाज को पकड़ लें.

जीसस या बुद्ध या महावीर भीतर की आवाज से जीते हैं. भीतर की आवाज जो कह देती है वही….

इसमें एक बात और आपको खयाल दिला दूं कि भीतर की आवाज एक बार सुनाई पड़नी शुरू हो जाए, तो आपको अपना गुरु मिल गया. वह गुरु भीतर बैठा हुआ है. लेकिन हम सब बाहर गुरु को खोजते फिरते हैं. गुरु भीतर बैठा हुआ है.

परमात्मा ने प्रत्येक को वह विवेक, वह अंतःकरण, वह कांसिएंस, वह अंतर की वाणी दी है, जिससे अगर हम पूछना शुरू कर दें, तो उत्तर मिलने शुरू हो जाते हैं. और वे उत्तर कभी भी गलत नहीं होते. फिर वह रास्ता बनाने लगता है भीतर का ही स्वर, और तब हम स्वधर्म की यात्रा पर निकल जाते हैं.

अंतर्वाणी को सुनने की क्षमता ही स्वधर्मरूपी यज्ञ का मूल आधार है. इसलिए कृष्ण ने अर्जुन को कहा कि स्वधर्मरूपी यज्ञ को भी यदि कोई पूरा कर ले, तो प्रभु के मंदिर में उसकी पहुंच, सुनवाई हो जाती है; द्वार खुल जाते हैं; वह प्रवेश कर जाता है.

गीतादर्शन – ओशो

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